बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद भारत के अगले राष्ट्रपति होंगे. हालांकि, अभी चुनाव की प्रक्रिया बाकी है लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने उनकी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी है. संख्या बल भाजपा के पक्ष में है, इसलिए यह तय है कि कोविंद ही भारत के 14वें राष्ट्रपति होंगे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा उनकी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद बहुत सारे लोग यह पूछ रहे हैं कि रामनाथ कोविंद कौन हैं?

एक अक्टूबर, 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे रामनाथ कोविंद अभी बिहार के राज्यपाल हैं. इसके पहले वे भारतीय जनता पार्टी में कई सांगठनिक पदों पर रहे हैं. वे पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे हैं. इसके अलावा उन्होंने पार्टी के दलित मोर्चे के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली है. 1998 से 2002 तक वे इस पद पर रहे हैं. जब भी भाजपा पर अगड़ी जातियों की पार्टी होने का आरोप लगा है, पार्टी ने रामनाथ कोविंद का नाम अपने दलित चेहरे के तौर पर आगे किया है.

वकालत की पढ़ाई करने वाले और बतौर वकील लंबे समय तक काम करने वाले रामनाथ कोविंद राज्यसभा सांसद भी रहे हैं. पहली बार वे राज्यसभा के लिए 1994 में चुने गए थे. इसके बाद 2000 में पार्टी ने उन्हें एक बार फिर राज्यसभा भेजा. राज्यसभा में रहने के दौरान वे अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए संसद की स्थायी समिति में भी रहे हैं. रामनाथ कोविंद अखिल भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष भी रहे हैं.

यह भी दिलचस्प ही है कि भारत के राष्ट्रपति के तौर पर रामनाथ कोविंद हर साल जिन 100 से अधिक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को नियुक्त करेंगे, कभी वे खुद उसी पद पर पहुंचना चाहते थे. कानपुर काॅलेज से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे आईएएस बनने का सपना लिए दिल्ली आए थे. लेकिन शुरुआती दो कोशिशों में उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी. तीसरी बार में उन्हें संघ लोक सेवा आयोग ने चुना तो लेकिन उन्हें आईएएस नहीं मिला. रामनाथ कोविंद इस पद पर काम नहीं करना चाह रहे थे इसलिए उन्होंने वकालत के क्षेत्र में ही आगे बढ़ने का निर्णय लिया.

1977 में उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय में भारत सरकार के वकील के तौर पर पक्ष रखने का मौका मिला. इसी बीच वे 1978 में सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट आॅन रिकाॅर्ड बन गए. एडवोकेट आॅन रिकाॅर्ड सर्वोच्च अदालत में वकीलों की वह श्रेणी होती है जिसके बिना बड़े से बड़ा वकील यहां अपना मामला नहीं दाखिल कर सकता. 1980 से 1993 तक वे सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के स्टैंडिंग काउंसल के तौर पर भी काम करते रहे. रामनाथ कोविंद के बारे में यह भी कहा जाता है कि अपने वकालत के दिनों में वे दलितों से जुड़े मुकदमे बगैर कोई फीस लिए लड़ते थे.

भाजपा में रामनाथ गोविंद 1991 में आए. उनके बारे में भले ही आम लोगों को बहुत कुछ नहीं मालूम हो लेकिन भाजपा को यह बहुत अच्छे से मालूम रहा है कि कोविंद कितने उपयोगी हैं. 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा ने रामनाथ कोविंद की कई सभाएं कराई थीं. कहा जाता है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने उनसे बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार कराने की योजना बनाई थी ताकि मायावती के दलित होने के प्रभाव को मतदाताओं के बीच थोड़ा कम किया जा सके.

जब रामनाथ कोविंद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाल रहे थे तो भी वे खबरिया चैनलों पर नहीं दिखते थे. मीडिया में उनकी मौजूदगी न के बराबर रही है. उस दौर में मीडिया में पार्टी के दूसरे प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर और शाहनवाज हुसैन जैसे नेता ही छाए रहते थे. पार्टी के अंदर उनकी गिनती वकालत और कानूनी मामलों की अच्छी समझ रखने वालों में होती रही है. लेकिन साथ ही साथ उनकी सादगी की चर्चा भी लगातार हुई है. पार्टी मुख्यालय और पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी वे बगैर किसी तामझाम के दिखते थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि रामनाथ कोविंद एक बेहतरीन राष्ट्रपति साबित होंगे. उन्होंने ट्वीट किया, ‘मुझे यकीन है कि कोविंद बेहतरीन राष्ट्रपति साबित होंगे और गरीबों एवं वंचित समुदायों की मजबूत आवाज बने रहेंगे. कानूनी क्षेत्र के उत्कृष्ट अनुभव के साथ संविधान को लेकर उनके ज्ञान और उनकी समझ से देश को लाभ होगा. किसान के बेटे कोविंद ने अपना पूरा जीवन गरीबों और वंचितों की सेवा में समर्पित कर दिया है.’