भारत के राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हो चुका है. टक्कर सत्ता पक्ष की तरफ से नामित किए गए रामनाथ कोविंद और विपक्ष की तरफ से उतारी गईं मीरा कुमार के बीच है. जानकारों का कहना है कि एनडीए प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का जीतना लगभग तय है.

यह तो हुई उन दो उम्मीदवारों की बात जिनके बीच आखिर में मुकाबला हुआ है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हर बार रण के इस मैदान में उतरकर ताल ठोकते हैं, भले ही उनकी कवायद सिर्फ ताल ठोकने तक ही रह जाए. वे ताल ठोकते हैं और रेफरी यानी चुनाव आयोग उन्हें लड़ने के लिए अयोग्य मानकर बाहर बिठा देता है.

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी किशनलाल वैद्य का ही उदाहरण लें. किशनलाल को स्थानीय लोग नामांकन भरने के लिए भैंसे और अर्थी पर बैठकर जाने जैसे अजीबोगरीब कारनामों के लिए जानते हैं. किशनलाल को पूरा भरोसा था कि इस राष्ट्रपति चुनाव में वे जरूर जीतेंगे. यह बात और है कि प्रस्तावना के लिए 50 सांसदों का मत नहीं मिलने से उनका नामांकन रद्द हो गया.

किशनलाल ऐसे इकलौते शख़्स नहीं जो अपने मन में भारत का राष्ट्रपति बनने का ख्वाब संजोये बैठे हैं. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में चाय बेचने वाले आनंद सिंह कुशवाहा का नाम भी इसी फेहरिस्त में शामिल है. कुशवाहा का कहना है कि जब एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो कोई दूसरा राष्ट्रपति क्यों नहीं? खबरें बताती हैं कि कुशवाहा इससे पहले भी अपने करीब 20 चुनावों में से तीन बार राष्ट्रपति और दो बार उपराष्ट्रपति का नामांकन भर चुके हैं.

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के हिसामुद्दीन का हाल भी कुछ-कुछ ऐसा है. वे अब तक 18 चुनाव हार चुके हैं और भारत के महामहिम बनने का सपना पाले हुए हैं. चार बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ चुके बनारस के नरेंद्र नाथ दुबे उर्फ अडिग के अलावा 83 बार चुनाव लड़ चुके आगरा के रामफेर उर्फ चुंटी भी ऐसे ही रणबांकुरों में शुमार हैं जो देश का प्रथम नागरिक बनने की ख्वाहिश मन में पाले बैठे हैं. चुंटी ने तो चुनाव लड़ने की लत के कारण अपनी पत्नी का बिछोह भी सह लिया.

चुनाव हारने के अलावा इन सभी में एक और बात समान है. इन सभी लोगों को अपने-अपने इलाकों में धरतीपकड़ नाम से जाना जाता है. वैसे तो धरतीपकड़ कुश्ती का दांव होता है जिसमें चित हो चुका पहलवान ज़मीन से ऐसे चिपक जाता है मानो उसने धरती को पकड़ लिया हो और इस तरह वह हारने से बच जाता है. लेकिन पिछले कुछ दशकों से यह शब्द राजनीति की दुनिया में उन लोगों के लिए इस्तेमाल होने लगा है जिन्होंने चुनाव भले ही बेहिसाब हारे हों, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने मानो धरती पकड़ रखी है जो डिगने का नाम ही नहीं लेता.

आइए जानते हैं देश की राजनीति के कुछ ऐसे ही तीन बड़े धरती पकड़ लोगों के बारे में. इन्होंने सैकड़ों चुनाव हारकर न सिर्फ अपने लिए पहचान और रिकॉर्ड कमाए बल्कि ये देशभर में होने वाले चुनावों के तरीकों में बदलाव का कारण भी बने.

काका जोगिंदर सिंह

पाकिस्तान के गुजरांवाला में पैदा हुए काका जोगिंदर सिंह वह शख्सियत थे जिसे देश की राजनीति में पहले धरती पकड़ के नाम से जाना जाता है. बंटवारे के बाद काका परिवार समेत उत्तर प्रदेश चले आए और 1962 से हर चुनाव में खड़े होने का मानो नियम बना लिया. बताया जाता है कि उत्तरप्रदेश के तीसरे विधानसभा चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू काका को बतौर कांग्रेस के सिख उम्मीदवार की तरह मैदान में उतारना चाहते थे. लेकिन जोगिंदर सिंह ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे किसी पार्टी से चुनाव नहीं लड़ेंगे.

जानकारों के मुताबिक 1993 के यूपी विधानसभा चुनावों में काका जोगिंदर सिंह ने हरदोई चुनाव की सभी नौ सीटों से अपना नामांकन भर दिया था. इतना ही नहीं साइकिल पर घूम-घूमकर उन्होंने लोगों से खुद को वोट नहीं देने की अनोखी अपील भी की. काका कहा करते थे कि वे अपनी जमानत सिर्फ इसलिए जब्त करवाते थे ताकि उस राशि से देश को राजस्व की प्राप्ति हो सके. लेकिन काका की सरलता से प्रभावित होकर लोग उन्हें वोट डालने से खुद को नहीं रोक पाते थे.

जोगिंदर सिंह की एक खास आदत और थी कि वे हारने पर लोगों को सूखे मेवे और मिश्री खिलाकर उनका मुंह मीठा करते थे. कहा जाता है कि 36 सालों में काका ने 300 से ज्यादा चुनावों में अपना नामांकन दाखिल किया जिनमें से कुछ में उनका पर्चा खारिज हो गया और बाकियों में वे हार गए.

दिसंबर, 1998 में दुनिया से रुखसत होने से पहले तक काका जोगिंदर सिंह राजस्व भरने के इस अनूठे तरीके को निभाते गए जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. कहा जाता है कि काका और उनसे प्रभावित हुए दूसरे लोगों की चुनाव लड़ने की लत को देखते हुए ही चुनाव आयोग ने किसी प्रत्याशी के दो से ज्यादा सीटों से चुनाव लड़ने पर रोक लगाई थी.

नागरमल बाजौरिया

काका जोगिंदर सिंह की ही तरह बाजौरिया भी पाकिस्तान में ही पैदा हुए थे. बंटवारे के बाद बाजौरिया बिहार के भागलपुर चले आए. बाजौरिया अब तक करीब 284 चुनावों में अपना नामांकन भर चुके हैं जिनमें सभासद से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव शामिल है.

नागरमल बाजौरिया
नागरमल बाजौरिया

इस बारे में बाजौरिया कहते हैं, ‘मैं लोकतंत्र में एक आम आदमी की अहमियत को बताना और उसे साबित करना चाहता हूं. मेरे लिए जीत-हार कोई मायने नहीं रखती बल्कि मैं समाज को यह संदेश देना चाहता हूं कि देश और लोकतंत्र में सबकी अहमियत बराबर है.’

बताया जाता है कि बाजौरिया को सबसे पहले धरती पकड़ उपनाम राजनीति की वजह से नहीं बल्कि समाज सेवा की वजह से मिला था. जब बाजौरिया पाकिस्तान से भागलपुर आए तब वहां पानी की बेहद किल्लत थी. ऐसे में उन्होंने करीब 250 रुपए इकट्ठे किए और लोगों के लिए नलकूप लगवाए. चूंकि यह पानी धरती फाड़कर निकाला गया था तो बाजौरिया के नाम के साथ धरती पकड़ जुड़ गया. बाद में लगातार कई चुनावों में नामांकन भरने और राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाए रख बाजौरिया ने धरती पकड़ नाम को सार्थक किया.

बाजौरिया ने अब तक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के अलग-अलग हिस्सों के चुनावों में अपनी दावेदारी ठोकी है. वे 282 बार चुनाव लड़ चुके हैं. 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी के खिलाफ भरा गया इनका नामांकन रद्द कर दिया गया था. इस बार भी ऐसा ही हुआ. इतना ही नहीं, बाजौरिया ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ भी रायबरेली और अमेठी से चुनाव में हाथ आजमाया था. फिलहाल बाजौरिया समाजसेवा के काम में सक्रिय हैं.

के पद्मराजन

तमिलनाडु के मेट्टर नगर के के पद्मराजन भी धरती पकड़ की सूची में शामिल हैं. वे अब तक 177 बार चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार भी उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नामांकन भरा था जो 50 सांसदों का समर्थन न मिलने से रद्द हो गया.

बताया जाता है कि 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के खिलाफ पद्मराजन ने आंध्रप्रदेश के नाड्याल से पर्चा भरा था जिसके बाद उनका अपहरण हो गया. यही वह घटना थी जिसने पद्मराजन को आमजन के बीच लोकप्रिय बना दिया.

के पद्मराजन
के पद्मराजन

कभी साइकल का पंक्चर जोड़ने का काम करने वाले पद्मराजन कहते हैं कि शुरुआत में लोगों ने उनका जमकर मजाक बनाया, लेकिन बाद में उनका हौसला देखते हुए वे ही लोग उनके समर्थन में आ गए और अब वे पद्मराजन को ज्यादा से ज्यादा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं.

पद्मराजन का नाम सर्वाधिक चुनाव लड़ने वाले जीवित व्यक्ति के रूप में लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है. चुनाव प्रचार में एक भी रुपया खर्च न करने का दावा करने वाले पद्मराजन का कहना है कि वे पिछले 27 सालों में 12 लाख रुपए जमानत राशि के रूप में राजस्व जमा करवा चुके हैं.

बताया जाता है कि पद्मराजन तमिलनाडु के एम करुणानिधि, जे जयललिता, पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी और पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी तक के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोक चुके हैं. यही नहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव में पद्मराजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वड़ौदरा सीट से मैदान में उतरे थे. इसे लेकर पद्मराजन का कहना है कि उस समय उन्हें नरेंद्र मोदी से ज्यादा और कोई महत्वपूर्ण प्रतिद्वंदी नहीं मिला.

किसी ने सही कहा है, ‘मंजिल मिले न मिले इसका ग़म नहीं, मंज़िल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है...’