करीब दो साल पहले तक फिल्म क्रिटिक्स इस पर चिंता जताते नजर आ रहे थे कि आखिर इमरजेंसी के दौर पर फिल्में क्यों नहीं बनतीं. अब अचानक ऐसा हुआ है कि इमरजेंसी पर बनने वाली फिल्मों की बाढ़ सी आ गई है. बीते साल नवनीत बहल निर्देशित ‘सन पचहत्तर’ से शुरू हुआ यह सिलसिला निर्देशक मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ तक जारी है जिसका ट्रेलर बीते शुक्रवार को रिलीज किया गया है. इसके चार दिन बाद ही मिलन लूथरिया ने अपनी अगली फिल्म ‘बादशाहो’ का टीजर जारी किया है और इस फिल्म की पृष्ठभूमि भी आपातकाल की है.

बेशक, ये फिल्में बीते 40 सालों की शिकायत दूर करने वाली साबित हो सकती हैं अगर ये उस दौर की सच्चाई को ईमानदारी से दिखा पाएं. लेकिन इन दिनों बन रही पीरियड फिल्में सच की उम्मीद जगाने की बजाय डर पैदा करती सी नजर आ रही हैं. डर यह कि एक सेट एजेंडे पर काम करने के जो इल्जाम अब तक न्यूज चैनलों पर लग रहे थे, कहीं अब फिल्मों पर भी न लगने लग जाएं. अगर ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा नुकसान सिनेमा का होगा. इसमें यह भी जोड़ लिया जाना चाहिए कि इमरजेंसी के मनचाहे सच के साथ टॉयलेट–एक प्रेम कथा जैसी सरकारी विज्ञापननुमा फिल्में भी कतार में हैं.

चिंताओं को किनारे करते हुए इन फिल्मों के ट्रेलर की बात करें तो फिल्म इंदु सरकार का ट्रेलर इमरजेंसी के अत्याचार से पीड़ित एक लड़की की काल्पनिक कहानी बताता है जो कुछ वास्तविक घटनाओं और असली पात्रों के आस-पास बुनी गई लगती है. ट्रेलर गांधी के मायने बदलने, संजय गांधी के तीखे तेवर और जेपी आंदोलन की झलकियां दिखाता है. फिल्म में कीर्ति कुल्हारी एक हकलाने वाली लड़की की और नील नितिन मुकेश, संजय गांधी की भूमिका में नजर आ रहे हैं. झलकियों से साफ पता चलता है कि दोनों ही बढ़िया अभिनय करने वाले हैं, नील नितिन खास तौर पर देखने लायक होंगे.

फिल्म के ज्यादातर पात्र बहुत लाउड नजर आ रहे हैं. ट्रेलर में शामिल दृश्य सरकार की वही जड़ता और ज्यादती दिखा रहे हैं जो हमें पहले से पता है. इन झलकियों में शामिल संवादों में भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जो फिल्म के प्रति उत्सुकता का कारण बन सके. सरकार की कोरी आलोचना करता हुआ यह ट्रेलर अगर आपातकाल का जिक्र न करता तो फिल्म से नाउम्मीद होने की एक बड़ी वजह कम होती.

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बादशाहो का टीजर कहानी के बारे में ज्यादा नहीं बताता. यह सिर्फ पात्रों से आपकी पहली मुलाकात करवाता है. फिल्म छह बदमाशों – अजय देवगन, इमरान हाशमी, इलियाना डीक्रूज, ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा और विद्युत जामवाल की कहानी कहेगी. टीजर की झलकियां ढेर सारे एक्शन से भरपूर हैं.

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चर्चाओं के मुताबिक फिल्म आपातकाल के दौरान एक राजघराने में पड़े छापे और लूट की कहानी है. संभवतः इस कथा के तार उस ऐतिहासिक घटना से जुड़े हुए हैं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयगढ़ के किले में खुदाई के आदेश दिए थे. कहा जाता है कि उन्होंने यह आदेश उस किले में छिपे खजाने की खोज में करने के लिए दिए थे. इस घटना का जिक्र अब तक किताबों में ही पढ़ने को मिला है. पहली बार इस किस्से का जिक्र स्क्रीन पर देखने को मिलेगा. अगर फिल्म थोड़ी सावधानी और ईमानदारी बरतती है तो आपातकाल के बारे में कुछ नया जानने को मिल सकता है. हालांकि टीजर देखने के बाद इसकी संभावना कम ही नजर आती है.