मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन शांत हो गया लेकिन उसका असर दूर तक जाने की क्षमता रखता है. और कुछ इस तरह कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी काे अशांत कर सकता है. जानकारों के मुताबिक यह सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार की बेचैनी बढ़ाने की भी पूरी संभावना अपने आप में समेटे हुए है. वहीं दूसरी तरफ 15 साल से राज्य की सत्ता से बाहर कांग्रेस और प्रदेश में उसका चेहरा-मोहरा बनने को तैयार ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह एक बड़े मौके की तरह सामने आया है. कैसे? महज़ तीन-चार उदाहरणों से ही तस्वीर साफ हो सकती है.

1. शिवराज आंदोलन की गंभीरता का अंदाज़ा नहीं लगा सके और सिंधिया ने मौका ताड़ लिया

मध्य प्रदेश में जून की शुरुआत से ही किसानों का आंदोलन चल रहा था. इस बार किसानों में गुस्सा ज़्यादा था. और आंदोलन की कमान भी मुख्य रूप से उन शिवकुमार शर्मा ‘कक्का जी’ के हाथ में थी जो 2011 में शिवराज के लिए मुश्किल खड़ी चुके थे. लेकिन इन तथ्यों के बावज़ूद शिवराज सरकार ने आंदोलन को हल्के में लिया. इसका नतीज़ा छह जून को देखने मिला जब तोड़फोड़ कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चला दीं और उसमें पांच किसानों की मौके पर और एक अन्य की बाद में मौत हो गई.

वर्तमान में मुरैना से सांसद और शिवराज की ही पिछली सरकार में मंत्री रहे अनूप मिश्रा इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में साफ कहते हैं, ‘राज्य का ख़ुफिया तंत्र पूरी तरह असफल रहा. शासन को अांदोलन की गंभीरता का अंदाज़ा होना चाहिए था. मुख्यमंत्री से कुछ किसान नेताओं की मुलाकात और उनसे मिले आश्वासन के बाद शासन ने यह भरोसा कर लिया कि आंदोलन ख़त्म हो गया. जबकि ऐसा नहीं था.’

दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस मौके को ताड़ लिया. पार्टी सूत्रों के मुताबिक सिंधिया मंदसौर की घटना के वक्त अपने पुत्र के इलाज़ के सिलसिले में विदेश में थे. लेकिन जैसे उन्हें इस घटना की ख़बर मिली वे तुरंत वापस लौट आए और कांग्रेस की तरफ से आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली. हालांकि वे घटना के छह दिन बाद सक्रिय हो पाए. लेकिन उनकी कवायद को ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ माना गया.

2. शिवराज के अफसरों ने उन्हें ग़ुमराह किया, सिंधिया के रणनीतिकारों ने सही सलाह दी

आंदोलन के शुरू से लेकर गोली चलने वाले दिन तक लगातार शिवराज को उनके अफसर ग़ुमराह करते रहे. या इसे यूं भी कह सकते हैं कि शिवराज ही अपने अफसरों पर आंख बंद कर भरोसा करते रहे. यहां तक कि जिस दिन किसानों पर गोली चलाई गई तब भी शुरू में गृह मंत्री और मुख्यमंत्री को यही बताया गया कि पुलिस ने गोलीबारी नहीं की है. इसके बाद गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने यही बयान मीडिया के सामने भी दे डाला. उनका कहना था,‘गोलियां पुलिस ने नहीं चलाई हैं. बल्कि कुछ असामाजिक तत्व आंदोलन की आड़ में हिंसा पर उतारू हैं.’

मुख्यमंत्री ने खुद भी अपने गृह मंत्री की बात ही दोहराई. हालांकि बाद में यह दावा झूठा साबित हुआ. सरकार को न सिर्फ मंदसौर के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक बल्कि प्रदेश की गृह सचिव को भी हटाना पड़ा. इतने से बात नहीं बनी तो पूरे हादसे की जांच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग भी बनाना पड़ा. अब उसने गोलीकांड के वक्त मंदसौर के कलेक्टर-एसपी रहे दोनों अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया है. लेकिन सरकार के यह सभी उपाय ‘सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने’ जैसे ही साबित हुए.

वहीं राजनीति के जानकारों के मुताबिक सिंधिया को उनके रणनीतिकारों ने काफी हद तक सही सलाह दी. इसलिए वे विदेश से लौटते ही सीधे मंदसौर, नीमच जैसे आंदोलनग्रस्त इलाकों में पहुंच गए. उनसे जुड़े एक सूत्र सत्याग्रह को बताते हैं, ‘हमने सिंधिया के आने से पहले ही उनके दौरे और धरना-प्रदर्शन आदि का पूरा कार्यक्रम तैयार कर लिया था. सबको पता था कि प्रशासन उन्हें मंदसौर गोलीकांड के पीड़ित परिवारों से मिलने नहीं देगा. लेकिन उनका पहला दौरा वहीं रखवाया गया जहां उन्होंने गिरफ्तारी भी दी. भोपाल के नज़दीक फंदा गांव में पुलिस की लाठियों से घायल हुए किसानों से तो उनकी मुलाकात हो भी गई. इसके बाद आगे संघर्ष शुरू हुआ.’

3. शिवराज का उपवास राजनीतिक नौटंकी साबित हुआ और सिंधिया का सत्याग्रह उनकी लॉन्चिंग

मंदसौर गाेलीकांड से अपनी और सरकार की किरकिरी होते देख शिवराज सिंह चौहान ने नौ जून को अचानक घोषणा कर दी कि वे अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठेंगे. उन्हाेंने कहा कि जब तक प्रदेश में शांति स्थापित नहीं हो जाती वे अपने दफ्तर या घर में नहीं बैठेंगे. लिहाज़ा अगले दिन यानी 10 जून की सुबह से ही राजधानी भोपाल के बीएचइएल दशहरा मैदान में वे उपवास पर बैठ गए. लेकिन इस कथित उपवास में आलीशान तामझाम किस स्तर के थे इसकी असलियत एक समाचार चैनल पर आए इस वीडियो से समझी जा सकती है.

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शिवराज के उपवास पर लोगों को अचरज हुआ कि जब सरकार शिवराज की, प्रशासन उनका, पुलिस उनकी तो फिर यह किसके ख़िलाफ और क्यों? और भी कई सवाल उठे लेकिन जल्द ही मीडिया ने इनका भी जवाब ढूंढ लिया और शिवराज के रणनीतिकारों को धता बताते हुए पूरी पोल पट्‌टी खोल दी. इसमें पता चला कि न तो शिवराज के उपवास की घोषणा अचानक हुई न ही वह अनिश्चितकालीन था. सब कुछ सोच-समझकर योजनाबद्ध तरीके से मुख्यमंत्री और सरकार की छवि पर लगे दाग साफ करने की गरज़ से किया गया था.

एक चैनल पर आई ख़बर के मुताबिक नौ जून को जब शिवराज सिंह चौहान उपवास की घोषणा कर रहे थे तो उसी समय मंदसौर गोलीकांड के पीड़ित किसान परिवारों के सदस्यों को स्थानीय नेता भोपाल लाने के लिए राजी करने में जुटे थे, ताकि वे वहां मुख्यमंत्री से उपवास तोड़ने के लिए आग्रह कर सकें. इन परिवारों को भोपाल लाया भी गया और कथित रूप से उनके आग्रह पर शिवराज ने ‘अनिश्चितकालीन उपवास’ 28 घंटे में ख़त्म कर दिया.

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दूसरी तरफ शिवराज के उपवास को किसानों का उपहास बताते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसके ज़वाब में 14 जून से भोपाल के टीटी नगर दशहरा मैदान में 72 घंटे का सत्याग्रह शुरू किया. लेकिन इसमें बेहद सधे तरीके से उन सभी चीजों का ध्यान रखा जिनको शिवराज अपने उपवास के दौरान अनदेखा कर गए. सत्याग्रह स्थल पर ग्वालियर घराने के महाराजा तंबू में सादा पंखेे की हवा में, खाट पर, टेंट से लाए गए सादा गद्दों में रात बिताते दिखे. बिना चप्पलों के घूमते नज़र आए और किसानों के साथ ज़मीन पर बैठक भोजन करते भी दिखाई दिए. यानी थी तो यह भी मुकम्मल तैयारी ही लेकिन तुलनात्मक रूप से अधिक चतुराई भरी.

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इस रणनीति का फायदा यह रहा कि यह सत्याग्रह सिंधिया के लिए अगले विधानसभा चुनाव के लिहाज़ से लॉन्चिंग पैड सरीखा साबित हुआ. यहां सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव जैसे नेता तो सिंधिया के साथ हर वक्त खड़े दिखे. इनके अलावा दिग्विजय सिंह, सत्यव्रत चतुर्वेदी ने धरना स्थल पर पहुंचकर हाज़िरी लगाई और कमलनाथ ने आख़िरी दिन यानी 17 जून को खलघाट, धार में हुए इस आयोजन के समापन के समय. प्रदेश के कांग्रेस विधायक भी सिंधिया से आदेश-निर्देश लेते देखे गए.

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4. मुआवज़े में देरी और किसानों की आत्महत्याओं से शिवराज की किरकिरी और सिंधिया की नई ज़मीन तैयार हुई

असंतोष को शांत करने के लिए शिवराज ने मंदसौर गोलीकांड के मृतकाें के परिवारों को पहले पांच लाख, फिर 10 लाख और इसके बाद बढा़कर एक करोड़ रुपए के मुआवज़े की घोषणा कर दी. लेकिन मुआवज़े की यह रकम सरकारी नियम-कायदों के भंवर में उलझ गई क्योंकि इतनी बड़ी राशि देने का प्रावधान नहीं है. नतीज़ा यह हुआ कि अगले दिन मुआवज़े का चेक दिला देने की घोषणा करने वाले शिवराज जब हादसे के आठ दिन बाद पीड़ित किसानों से मिले तो उनके हाथ खाली ही थे. यानी तब तक पीड़ितों को मुआवज़ा नहीं मिला था.

यही नहीं, शिवराज ने उपवास तोड़ते समय ऐलान किया था कि समर्थन मूल्य से कम पर कृषि उपज़ ख़रीदने को कानून बनाकर अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाएगा. लेकिन उनकी इस घोषणा से व्यापारी वर्ग नाराज़ हो गया. विरोध के साथ ही यह वर्ग कृषि मंडियों में समर्थन मूल्य से कम पर ही उपज़ ख़रीद रहा है और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. कानून बनना-बनाना तो अभी दूर की बात नज़र आ रही है.

मंदसौर गोलीकांड के बाद से प्रदेश में किसानों की ख़ुदक़ुशी की खबरें भी सुर्खियां बन रही हैं. अभी बुधवार को ही स्थानीय अख़बारों में ख़बर आई कि नरसिंहपुर और होशंगाबाद में आर्थिक संकट में फंसे दो और किसानों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. इस तरह पिछले दो हफ्ते में 21 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. ख़ुद को किसान का बेटा कहने वाले शिवराज के लिए यह भी एक चिंताजनक स्थिति है.

ज़ाहिर तौर पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और फिलहाल उसकी अगुवाई करते दिख रहे सिंधिया के लिए ये चीजें सरकार के ख़िलाफ ज़मीन तैयार करने में मददगार हो रही हैं. उन्होंने ऐलान भी किया है कि किसानों की समस्याओं की तरफ सरकार का ध्यान दिलाने के लिए प्रदेश के हर ज़िले में सत्याग्रह आयोजित किया जाएगा. उनके मुताबिक यह लड़ाई तब तक चलेगी जब तक मंदसौर गोलीकांड के लिए ज़िम्मेदार पुलिसकर्मियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज़ नहीं हो जाते और आंदोलन के दौरान ग़िरफ्तार 300 किसानों को छोड़ नहीं दिया जाता.

यानी किसान आंदोलन ने कांग्रेस ही नहीं सिंधिया को भी आगामी चुनाव के लिहाज़ से उम्मीद की किरण दिखाई है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अगले एक साल में इस उम्मीद को यक़ीनी हक़ीक़त में बदल पाते हैं या नहीं.