फेसबुक अब अपने यूजर्स पर उनके मोबाइल के कैमरे और कंप्यूटर के वेबकैम के जरिए नजर रखने की तैयारी कर रही है. खबरों के मुताबिक कंपनी ने एक ऐसे पेटेंट के लिए आवेदन किया है जिससे वह अपने यूजर की डिवाइस के कैमरे के जरिए उसके ‘फेस एक्सप्रेशन’ यानी चेहरे के हावभाव के बारे में पता लगा सकेगी. बताया जाता है कि इसके पीछे फेसबुक का उदेश्य यह पता करना है कि किसी पोस्ट, मैसेज, फोटो, वीडियो या विज्ञापन को देखकर यूजर किस तरह की प्रतिक्रिया देता है.
हाल ही में सीबी इनसाइट्स नामक अमेरिकी वेबसाइट ने फेसबुक के इस पेटेंट आवेदन के बारे में खुलासा किया है. वेबसाइट ने इसकी जानकारी देते हुए बताया है कि इस तकनीक के जरिए यूजर के द्वारा किसी वेबसाइट को पढ़ते समय उसके फोटो लिए जा सकते हैं या वीडियो भी बनाए जा सकते हैं. इससे यह पता लगाया जा सकता है कि वेबसाइट के किस कंटेंट को देखते या पढ़ते समय यूजर की कैसी प्रतिक्रिया थी.
सीबी इनसाइट्स का यह भी कहना है कि इस तकनीक के इस्तेमाल से फेसबुक का काम काफी आसान हो जाएगा. उदहारण के तौर पर यदि किसी फेसबुक यूजर को एक विशेष तरह की पोस्ट या विज्ञापन देखने में ख़ुशी होती है तो उसके चेहरे के हाव-भाव देखने के बाद फेसबुक उसे उसी तरह की फोटो या पोस्ट भेजेगा. इस तकनीक में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इससे कोई वेबसाइट अपने यूजर की अनुमति के बिना भी उसके फोटो ले सकती है. दूसरे शब्दों में कहें तो किसी यूजर का कैमरा ऑन नहीं है तो भी इस तकनीक के जरिए उसकी फोटो या वीडियो क्लिप बनाई जा सकती हैं.
उधर, फेसबुक की ओर से इस खुलासे पर सफाई दी गई है. फेसबुक के प्रवक्ता ने कहा है कि कंपनी की ओर से इस पेटेंट के लिए एप्लीकेशन दी गई है लेकिन, उसकी इसे लागू करने की कोई योजना नहीं है.
माइक्रोसॉफ्ट ने फिंगरप्रिंट स्कैनर वाला मॉडर्न की-बोर्ड लॉन्च किया
माइक्रोसॉफ्ट ने एक विशेष अत्याधुनिक की-बोर्ड लांच किया है. कंपनी ने इसका नाम ‘माइक्रोसॉफ्ट मॉडर्न की-बोर्ड’ रखा है. माइक्रोसॉफ्ट की ओर से इसकी विशेषताओं के बारे में बताते हुए कहा गया है कि इस की-बोर्ड में दिया गया फिंगरप्रिंट स्कैनर इसकी सबसे बड़ी खासियत है. कंपनी के अनुसार इस फिंगरप्रिंट स्कैनर के जरिए विंडोज 10 यूजर्स अपने कंप्यूटर को फिंगरप्रिंट ऑथेंटिकेशन इनेबल कर पाएंगे यानी इसके इस्तेमाल से वे अपने कंप्यूटर पर फिंगरप्रिंट तकनीक से लॉग इन कर सकेंगे. माइक्रोसॉफ्ट का यह भी कहना है कि इस की-बोर्ड में लगे फिंगरप्रिंट स्कैनर का उपयोग किसी भी वेबसाइट में साइन-इन करने के लिए भी किया जा सकता है.
फिंगरप्रिंट स्कैनर वाला यह मॉडर्न की-बोर्ड विंडोज 10, मैक ओएस और एंड्रॉयड के लेटेस्ट वर्जन पर काम करेगा. कंपनी ने ग्राहकों की सहूलियत के लिए इसे वायर या बिना वायर के चलाने का भी ऑप्शन दिया है. वायरलेस मॉडर्न की-बोर्ड के लिए यूजर का कंप्यूटर या डिवाइस ब्लूटूथ 4.0 या इससे अधिक को सपोर्ट करता होना चाहिए. माइक्रोसॉफ्ट ने अमेरिकी बाजार में इसकी कीमत $129.99 (लगभग 8,500 रुपए) रखी है.
अब आतंकी फेसबुक और यूट्यूब का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे
आतंकियों द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक और यूटयूब का बढ़ चढ़कर इस्तेमाल किए जाने की खबरें आने के बाद फेसबुक और गूगल ने बड़ा फैसला लिया है. फेसबुक के अधिकारियों ने एक ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से बताया कि कंपनी ने अपने नियमों में बड़ा बदलाव किया है. इसके तहत अब कंपनी ने आतंकी सामग्री का पता लगाने और उसे तुरंत हटाने के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. इन लोगों के मुताबिक इससे यूजर्स के देखने और रिपोर्ट करने से पहले ही ऐसी सामग्री को हटाया जा सकेगा. इससे पहले तक फेसबुक यूजर्स द्वारा किसी कॉन्टेंट को संदिग्ध बताए जाने के बाद ही उसकी समीक्षा करता था और हटाता था.
उधर, फेसबुक के इस फैसले के दो दिन बाद ही गूगल ने भी इसी तरह का फैसला लिया है. बीते रविवार कंपनी ने एक ब्लॉग पोस्ट में बताया है कि उसने अपने वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर आतंकवादी या हिंसक या कट्टरपंथी सामग्री को पहचानने और हटाने के लिए कुछ नए और कड़े नियम बनाए हैं. इस पोस्ट में गूगल के एक्जीक्यूटिव केंट वाकर ने कहा है कि जो वीडियो सीधे-सीधे आतंकवाद को बढ़ावा देते हुए दिखेंगे उन्हें पहचान कर तुरंत हटा दिया जायेगा. इसके अलावा वे वीडियो जो पूरी तरह से उसके नए नियमों का उल्लंघन नहीं करते होंगे या जिनमें बहुत कम भड़काऊ धार्मिक कॉन्टेंट मौजूद होगा, उन्हें चेतावनी के साथ दिखाया जाएगा. साथ ही ऐसे वीडियो को न तो प्रोमोट किया जाएगा और न ही उन पर विज्ञापन दिखाए जाएंगे. इसके अलावा भी एक ऐसी व्यवस्था की जा रही है जिससे यूजर इन्हें आसानी से ढूंढ न पाएं.
पिछले दिनों आतंकियों द्वारा फेसबुक और गूगल का इस्तेमाल किए जाने के कई मामले सामने आए थे जिसके बाद इन कंपनियों की जमकर आलोचना हुई थी. हाल ही में ब्रिटेन में लंदन ब्रिज पर हुए आतंकी हमले में शामिल एक आतंकी के करीबियों ने भी बताया था कि वह यूट्यूब पर इस्लामी उपदेशकों के वीडियो देखकर कट्टरपंथी बन गया था. इसके बाद गूगल पर ये आरोप भी लगे थे कि वह ऐसे वीडियो को हटाने के बजाय इन पर विज्ञापन दिखाकर पैसे कमा रहा है.
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