बौद्धों के शीर्ष धर्मगुरू दलाई लामा के बचपन का यह किस्सा उनकी आत्मकथा ‘मेरा देश निकाला’ से लिया गया है.


जब मैं तीन वर्ष पूरे कर रहा था, तिब्बत सरकार द्वारा भेजा गया एक दल कुमबुम मठ में दलाई लामा के नए अवतार की खोज करने आया. वह कुछ चिन्हों की सहायता से यहां पहुंचा था. इनमें से एक मेरे पूर्ववर्ती तेरहवें, दलाई लामा थुप्तेम ग्यात्सो के सुरक्षित शरीर से संबंधित था – सन 1933 में सत्तावन वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ था. एक दिन अचानक यह देखा गया कि उनका सिर दक्षिण दिशा से उत्तर-पूर्व की ओर घूम गया है. इसके तुरंत बाद तत्कालीन रीजेंट को - जो स्वयं बड़े लामा थे - एक दृश्य दिखाई दिया. दक्षिण तिब्बत की पवित्र झील ल्हामोई ल्हात्सो के जल पर नजर डालते ही उनके सामने तीन तिब्बती अक्षर उभर कर आए – आब, क और म. इनके पीछे एक तीन मंजिले मठ का चित्र उभरा, जिसकी छत सोने और मूंगे की बनी थी, और जहां से एक पगडंडी निकलकर ऊपर पहाड़ी पर जाती थी. अंत में उन्हें एक छोटा सा घर दिखाई दिया जिसका परनाला भिन्न प्रकार का था. उन्हें लगा कि आब अक्षर का अर्थ उत्तर-पूर्व का प्रदेश आमदो है, इसलिए खोज दल को यहां भेजा गया.

ये लोग जब तक कुमबुम पहुंचे, उन्हें विश्वास हो गया था कि वे सही दिशा में जा रहे हैं. यदि ‘आब’ का अर्थ आमदो हो सकता है तो ‘क’ का अर्थ कुमबुम होना चाहिए. यह मठ भी तिमंजिला था, इसकी छत भी सोने और मूंगे से बनी थी. अब उन्हें उस पहाड़ी तथा उस घर की खोज करनी थी जिसका परनाला विचित्र सा था. इसलिए इस क्षेत्र के गांवों में उन्होंने इसकी खोज शुरू की. जब उन्हें हमारे घर और छत की टेढ़ी-मेढ़ी लकड़ियां दिखाई दीं तो उन्होंने एक रात इसी गांव में बिताने का फैसला किया. एकदम अपने उद्देश्य की घोषणा करने के बजाय दल के नेता - के उत्सांग रिन्पोचे नौकर बन गए और घर के सबसे छोटे बच्चे के साथ खेलने और उसके व्यवहार का अध्ययन करने लगे.

बच्चे ने उसे तुरंत पहचान लिया और सेरा लामा – सेरा लामा, कहकर उन्हें पुकारा. उत्सांग रिन्पोचे के मठ का नाम सेरा था. इसके दूसरे दिन वे वापस लौट गए. कुछ दिन बाद वे अधिकृत प्रतिनिधिमंडल लेकर वापस आए. इस समय उनके पास कुछ वस्तुएं थीं. उनमें से कुछ दलाई लामा के उपयोग की वस्तुएं थीं और कुछ नहीं थीं. जब ये चीजें शिशु के सामने रखी गईं तो उसने लामा की चीजों को यह कहकर उठाया कि - यह मेरी है, यह मेरी है. और बाकी को छोड़ दिया. इससे दल को मोटे तौर पर यह विश्वास हो गया कि दलाई लामा का नया अवतार उन्हें मिल गया है. लेकिन इसे अंतिम रूप से मानने के लिए उन्हें एक अन्य शिशु का भी परीक्षण करना था. यह सब होने के कुछ समय बाद उन्होंने घोषणा कर दी – ताक्तसेर का शिशु ही दलाई लामा है. यह शिशु मैं था.

यह कहने की जरूरत नहीं है कि मुझे इन घटनाओं की ज्यादा याद नहीं है. तब मैं बहुत छोटा था. जांच दल ने अंतिम निर्णय लेने के बाद यह समाचार ल्हासा स्थित रीजेंट को भेज दिया. कई महीने बाद इसकी स्वीकृति का समाचार प्राप्त हुआ. तब तक मुझे घर पर ही रहना था. इसके बाद मेरे पिता मुझे कुमबुम मठ पहुंचा आए, जहां एक सुबह मेरा तख्तारोहण समारोह आयोजित किया गया. यह घटना मुझे इसलिए याद है क्योंकि मुझे सूरज निकलने से पहले जगाकर कार्यक्रम के लिए तैयार किया गया. मुझे सिंहासन पर बैठने की भी याद है.

इसके बाद मेरे जीवन का कुछ-कुछ दुखद अध्याय आरंभ हुआ. मेरे माता-पिता मेरे साथ ज्यादा दिन नहीं ठहरे और मैं इन सब अजनबी चेहरों के बीच अकेला रह गया. इतने छोटे बच्चे के लिए मां-बाप से अलग रहना कठिन काम है.

फिर जब, मेरी चौथी वर्षगांठ के एक सप्ताह बाद, यह दिन आया, तो मैं बहुत उत्साहित हुआ. हमें एक दल के साथ यात्रा पर निकलना था. इस दल में बहुत से लोग थे. मेरे माता-पिता और भाई लोबसांग सामतेन के अलावा इसमें जांच दल के सभी सदस्य और अनेक तीर्थयात्री भी थे. कई सरकारी अधिकारी हमारी देखभाल के लिए तैनात थे. खच्चरों पर सवार बहुत से लोग तथा स्काउट भी थे. ये व्यक्ति तिब्बत में लंबी यात्राएं करने वाले लोगों की सहायता करने में कुशल थे. इन लोगों को सही-सही पता होता था कि किस नदी को कहां से पार किया जा सकता है. पहाड़ के किस दर्रे को पार करने में कितना समय लगेगा.

कुछ दिन की यात्रा करने के बाद हमने बूफेंग द्वारा शासित प्रदेश को पार किया और तिब्बत सरकार ने मेरे चुनाव की आधिकारिक घोषणा की. अब हमने दुनिया के एक सबसे खूबसूरत प्रदेश में प्रवेश किया- विशाल ऊंचे पहाड़ और बगल में फैले विस्तृत मैदान, जिनमें हम लोग छोटे-छोटे कीड़ों की तरह रेंगते हुए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे. कहीं-कहीं पिघली हुई बर्फ का ज़बरदस्त रेला सामने आ जाता और हम छपाके मारते उसे पार करते. और कुछ दिन के बाद कोई छोटी सी बस्ती आती जो हरी घास के झुरमुट में चुपचाप छिपी होती या किसी पहाड़ी को जैसे हाथ की अंगुलियों से कसकर पकड़े लटक रही होती. लेकिन ज्यादातर ये खुश्क, खाली जगहें होतीं जहां धूलभरी आंधियां या बर्फ के ज़बरदस्त तूफान प्रकृति की भयंकर शक्तियों का प्रदर्शन करते रहते थे.

ल्हासा की हमारी यात्रा तीन महीने में पूरी हुई. इस यात्रा की बहुत ज्यादा याद तो नहीं है, सिवाय कुछ आश्चर्यजनक दृश्यों के, जैसे कि जंगली याक के, जिन्हें ‘द्रौंग’ कहते हैं, बड़े-बड़े झुंडों में मैदान पार कर रहे हैं या ‘क्यांग’ कहलाने वाले जंगली गधों के छोटे-छोटे दल धीरे-धीरे आराम से चले जा रहे हैं. या छोटे हिरन जो तेजी से भागकर सामने से इस तरह एक झलक दिखाकर गुज़र जाते हैं, मानो भूत क्षण-भर के लिए प्रकट हो गया हो. इसी तरह समय-समय पर आसमान में उड़ते पक्षी देखकर भी मुझे बहुत अच्छा लगता था.

यह अधिकांश यात्रा मैंने ‘ड्रेलजाम’ नामक पालकी में अपने भाई लोबसांग सामतेन के साथ बैठकर पूरी की. इसे दो खच्चर खींच रहे थे. हम उसमें बैठे लड़ते-झगड़ते ही रहे, जैसा बच्चों का स्वभाव है, और कभी-कभी मुक्के भी चलाए गए. इससे अक्सर पालकी के संतुलन खोकर उलट जाने का खतरा पैदा हो जाता था. इस स्थिति में चालक पालकी रोककर मां को बुलाकर लाता. जब वह भीतर देखती तो हमेशा एक ही स्थिति दिखाई देती- मेरे भाई की आंखों में आंसू भरे होते और मैं स्वयं शान से बैठा होता. उसकी उम्र मुझसे ज्यादा थी लेकिन मैं उससे ज्यादा तेज था. यूं हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे लेकिन एक साथ रहने पर लड़ते-झगड़ते ही रहते थे. हममें से कोई एक बात कहता और दूसरा उसका जवाब देता और बहस शुरू हो जाती. जिसका अंत मुक्कों और आंसुओं में होता था- लेकिन आंसू हमेशा उसी के होते थे. लोबसांग सामतेन का स्वभाव बहुत अच्छा था, और वह मेरे खिलाफ़ कभी बलप्रयोग नहीं कर सकता था.

आखिरकार हमारा दल ल्हासा के पास पहुंचने लगा. शरद ऋतु आरम्भ हो गई थी. जब हम ल्हासा से कुछ दिन की दूरी पर पहुंच गए, तब उच्च सरकारी अधिकारियों का एक दल हमारा स्वागत करने आया, और हमें राजधानी के मुख्य द्वार से दो मील दूर दोएगुथांग मैदान में ले गया. यहां अनेक तंबू लगे हुए थे. इनके बीचों-बीच नीले और सफेद रंग का एक बड़ा सा तंबू था जिसे ‘माचा चेनमो’ अर्थात ‘महान मयूर पक्षी’ कहते हैं. यह बहुत शानदार लग रहा था और इसमें बहुत खूबसूरत कारीगरी से बना लकड़ी का एक सिंहासन रखा था- जिस पर शिशु दलाई लामा को बिठाकर उसका स्वागत किया जाना था.

इसके बाद वह समारोह हुआ जिसमें मुझे तिब्बत की जनता का धार्मिक नेता घोषित किया गया. यह समारोह पूरे दिन चला. मुझे इसकी बहुत कम याद है. सिर्फ लोगों की ज़बरदस्त भीड़ याद है और यह कि मैं घर आ गया हूं. इतने ज्यादा लोग मैंने कभी नहीं देखे थे. यह कहा जा सकता है कि चार साल के बच्चे की दृष्टि से तो मेरा व्यवहार अच्छा रहा. कुछ बहुत वरिष्ठ भिक्षु विशेष रूप से यह जांच करने आए थे कि मैं सचमुच तेरहवें दलाई लामा का अवतार हूं या नहीं. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अंत में लोबसांग सामतेन के साथ मुझे नोरबुलिंग्का - जिसका अर्थ है हीरे-मोती का पार्क - जो ल्हासा के पश्चिम में स्थित है, ले जाया गया.

सामान्यत: इसका उपयोग दलाई लामा के ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में किया जाता है. लेकिन रीजेन्ट ने अगले साल तक प्रतीक्षा करने का निश्चय किया, जिसके बाद तिब्बत सरकार के केंद्र पोटाला महल में मेरा तख्तारोहण किया जाना था. इस समय तक मैं वहां नहीं रह सकता था. लेकिन यह मेरे लिए अच्छा ही रहा क्योंकि पोटाला की तुलना में नोरबुलिंग्का अधिक मनोहर स्थल है. यहां अनेक बाग हैं और कई छोटी-छोटी खुली हुई इमारतें हैं. यहां से मुझे पोटाला की आलीशान इमारत दिखाई देती थी, जो अंधेरी, ठंडी और उदास प्रतीत होती थी.

इस तरह मैं यहां पूरा एक साल अपने भाई के साथ मज़े से खेलता-कूदता और माता-पिता से नियमित रूप से मिलता-जुलता, बिताता रहा. ये मेरे जीवन में स्वतंत्रता के अंतिम दिन थे.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)