ली डैन को बैडमिंटन की दुनिया का लियोनल मैसी और डॉन ब्रैडमैन कहा जाता है. उनसे पहले शायद ही किसी खिलाड़ी ने बैडमिंटन में इतने मुकाम हासिल किये हों जितने उन्होंने किये. अब 33 साल के हो चुके डैन 28 साल की उम्र तक ‘सुपर ग्रैंड स्लैम’ सहित बैडमिंटन की दुनिया के सभी नौ प्रमुख खिताब अपने नाम कर चुके थे. विश्व चैंपियनशिप, विश्व कप, थॉमस कप, सुदिरमन कप, सुपर सीरीज मास्टर्स फाइनल और ऑल इंग्लैंड ओपन जीतने के साथ-साथ एशियाई खेलों, एशियाई चैंपियनशिप और ओलंपिक में सोना जीतने वाले पहले और एकमात्र खिलाड़ी हैं. इनमें से कई खिताब तो डैन पांच-पांच बार भी जीत चुके हैं. वे ऐसे भी पहले और इकलौते शटलर हैं जिन्होंने ओलंपिक में लगातार दो बार पुरुष एकल में स्वर्ण पदक जीता है.

ली डैन में दो बड़ी खूबियां हैं. एक तो वे अपनी कलाई के दम पर ही इतना तगड़ा स्मैश करते हैं जो दूसरे पूरा दम लगाकर भी नहीं कर पाते. दूसरा, उनके बारे में माना जाता है कि वे अपने प्रतिद्वंदी के दस मिनट के खेल से उसे पूरा भांप लेते हैं और फिर अपने मन मुताबिक खेल को चलाते हैं.

2014 में 21 साल के एक पतले-दुबले युवा बैडमिंटन खिलाड़ी किदाम्बी श्रीकांत का लंबी-चौड़ी भुजाओं वाले ली डैन से सामना हुआ. वह भी किसी आम मैच में नहीं बल्कि चाइना ओपन सुपर सीरीज के फाइनल में. श्रीकांत इस फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय पुरुष शटलर थे. इस मैच को लेकर चीन के सट्टा बाजार में जीत-हार का सट्टा नहीं लग रहा था. सट्टा इस पर लग रहा था कि श्रीकांत किदाम्बी आखिर कितनी देर डैन के सामने टिक पायेंगे.

लेकिन, इस मैच में श्रीकांत ने इतिहास रचते हुए इन सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. उन्होंने ली डैन को लगातार दो सेट में हराकर आश्चर्यजनक रूप से मैच जीत लिया. इसके साथ ही श्रीकांत भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी बन गए जिसने न सिर्फ चाइना ओपन सुपर सीरीज जीती बल्कि ली डैन को भी मात दी.

इससे समझा जा सकता है कि श्रीकांत किदाम्बी ने आखिरकार क्या हासिल किया था. बहरहाल, यह श्रीकांत के सफर में एक बड़ी सफलता जरूर थी, लेकिन वे इससे पहले भी कई बार दुनिया को अपने प्रदर्शन से चौंका चुके थे.

2012 में 18 साल की उम्र से सीनियर स्तर पर खेल की शुरुआत करने वाले श्रीकांत ने एक साल बाद ही पहली बड़ी सफलता हासिल कर ली थी. उन्होंने 2013 में दिल्ली में हुई अखिल भारतीय सीनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उस समय के सबसे अच्छे भारतीय खिलाड़ी परुपल्ली कश्यप को हराकर खिताब अपने नाम किया था. राष्ट्रीय स्तर पर अपना लोहा मनवाने के बाद भारतीय बैडमिंटन संघ ने उन्हें इसी साल थाईलैंड ओपन ग्रां पी में जाने की अनुमति दे दी. श्रीकांत ने इस टूर्नामेंट को जीतकर और फाइनल मुकाबले में दुनिया के आठवें नंबर के खिलाड़ी थाईलैंड के बूनसक पोनसाना को हराकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बार अपनी पहचान बनाई. इस पूरे टूर्नामेंट में श्रीकांत ने जिस तरह का प्रदर्शन किया उसने कई टीम के कोचों को चौंका कर रख दिया था. वे एचएस प्रणय के बाद यह टूर्नामेंट जीतने वाले दूसरे भारतीय थे.

हैदराबाद के एक मध्य्यम वर्गीय परिवार से आने वाले श्रीकांत ने 2008 से बैडमिंटन खेलना शुरू किया था. आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में रहने वाले उनके पिता दिसंबर 2009 में उन्हें पुलेला गोपीचंद अकादमी में लेकर आए थे. उनके करीबी बताते हैं कि श्रीकांत के तब तक जीवन में कुछ भी ऐसा चौंकाने वाला नहीं किया था जिससे यह लगता कि वे भविष्य में कुछ बड़ा करेंगे. लेकिन, गोपीचंद अकादमी में पहुंचने के बाद श्रीकांत में चौंकाने वाले परिवर्तन शुरू हुए.

पुलेला गोपीचंद एक साक्षात्कार में बताते हैं कि अकादमी में आने के बाद श्रीकांत को युगल और मिश्रित युगल खिलाड़ी के रूप में प्रशिक्षण दिया गया और इस दौरान उन्होंने जूनियर लेवल पर काफी अच्छा प्रदर्शन भी किया जिस वजह से गो-स्पोर्ट फाउंडेशन ने उन्हें स्कालरशिप के लिए चुना. लेकिन, युगल में बेहतर करने के बावजूद इस दिग्गज कोच को लगा कि यह सिंगल्स का और बेहतर खिलाड़ी साबित हो सकता है. इसलिए गोपीचंद ने श्रीकांत से युगल के बजाय केवल सिंगल्स पर फोकस करने को कहा. उनके मुताबिक श्रीकांत में दो बड़ी खूबी हैं - पहली वे बड़े मुकाबलों में बिना तनाव के आखिर तक हार मानने को तैयार नहीं होते. दूसरा, उनकी फुर्ती है जो विपक्षियों को हर समय पंजों के बल खड़ा रहने को मजबूर कर देती है.

अपने गुरु पुलेला गोपीचंद के साथ किदांबी श्रीकांत | फोटो :एएफपी
अपने गुरु पुलेला गोपीचंद के साथ किदांबी श्रीकांत | फोटो :एएफपी

श्रीकांत की सफलता को इस बात से समझा जा सकता है. 2012 में 240 वीं रैंक से शुरुआत करने वाले श्रीकांत मई 2013 में दुनिया के 13 शीर्ष खिलाड़ियों में अपनी जगह बना चुके थे. इसी साल शुरू हुई भारतीय बैडमिंटन लीग में उन्हें अवध बैरियर की टीम से खेलने का मौका मिला जो उस साल इस टूर्नामेंट में दूसरे नंबर पर रही थी. इस लीग के दौरान श्रीकांत ने अपने खेल से कइयों को प्रभावित किया. दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी ली चोंग वेई के कोच टाई जैको तो उनसे इतना ज्यादा प्रभावित हो गए कि उन्होंने श्रीकांत को लंबी रेस का घोड़ा करार देते हुए उनके भविष्य को लेकर कई तरह की भविष्यवाणियां कर दी थीं.

साल 2014 में चाइना ओपन सुपर सीरीज प्रीमियर में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी ली डैन को हराने के अलावा श्रीकांत ने कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीता. लेकिन, वे ज्यादातर बड़े टूर्नामेंट में अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहे. इस साल उन्होंने इंडियन ओपन ग्रां पी का फाइनल खेला, मलेशियन ओपन के क्वार्टर फाइनल में पहुंचे और हांगकांग ओपन सुपर सीरीज के सेमीफाइनल में भी जगह बनाई. अच्छे खेल की वजह से इसी साल उन्हें बैडमिंटन का सुपर ग्रैंड स्लैम कही जाने वाली वर्ल्ड सुपर सीरीज फाइनल्स में खेलने का मौका दिया गया. श्रीकांत दुनिया के चुनिंदा खिलाडियों वाले इस टूर्नामेंट के सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रहे. 2014 में अपने अच्छे प्रदर्शन के कारण ही उनकी वर्ल्ड रैंकिंग 4 हो गयी. वे दुनिया के पांच शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल होने वाले भारत के मात्र तीसरे खिलाड़ी हैं. इससे पहले तक यह उपलब्धि केवल प्रकाश पादुकोण और पुलेला गोपीचंद ही हासिल कर पाए थे. क्रिकेट के खुमार में खोये रहने वाले भारतीय इस समय तक भले ही श्रीकांत को न जान पाए हों, लेकिन अब तक यह युवा भारतीय खिलाड़ी बैडमिंटन की दुनिया में अपनी विशेष पहचान बना चुका था.

2015 श्रीकांत के अब तक के करियर का सबसे अच्छा साल माना जाता है. इस साल उन्होंने दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों को हराकर स्विस ओपन ग्रां पी और इंडियन ओपन सुपर सीरीज का खिताब जीता. इन दो खिताबों के बाद वे विश्व रैंकिंग में तीसरे स्थान पर पहुंच गए. यह रैंकिंग पाने वाले वे पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी हैं. उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए साल 2016 में हुए रियो ओलम्पिक में उनसे पदक की उम्मीद की जा रही थी. लेकिन, क्वार्टर फ़ाइनल मुकाबले में उनका सामना उनके पुराने प्रतिद्वंदी ली डैन से हो गया. इस मैच में ली डैन ने श्रीकांत को पहला सेट बुरी तरह से 6-21 से हराया. हालांकि, श्रीकांत ने भी हार नहीं मानी और पलटवार करते हुए दूसरा सेट 21-11 से जीत लिया. तीसरे सेट में दोनों के बीच कांटे का मुकाबला आखिर तक यह बताना मुश्किल था की बाजी किसके हाथ लगेगी. हालांकि, दो बार के ओलंपिक चैम्पियन रह चुके ली डैन ने किदांबी से यह सेट 21-18 से जीत लिया. किदांबी के कोच पुलेला गोपीचंद एक साक्षात्कार में कहते हैं कि मेडल से मात्र एक कदम दूर रह गए किदांबी को इस हार ने काफी ज्यादा परेशानी दी, लेकिन हकीकत यह है कि इस मैच के बाद वे मानसिक रूप से कई गुना मजबूत हो चुके थे.

2016 में जापान ओपन के एक मैच के दौरान उनका टखना बुरी तरह चोटिल हो गया और उन्हें लगभग पूरे साल कोर्ट से दूर रहना पड़ा. लेकिन, इसके बाद साल 2017 में श्रीकांत ने फिर वापसी की और सिंगापुर सुपर सीरीज के फ़ाइनल में जगह बनाई. हालांकि, इस मुकाबले में उन्हें हमवतन साईं प्रनीत से हार का सामना करना पड़ा. लेकिन, इस टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पहुंचकर श्रीकांत ने यह बता दिया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह के दमखम की जरूरत होती है वह चोट से उभरने के बाद उनमें बना हुआ है.

सिंगापुर सुपर सीरीज में अपने दमखम का परिचय देने वाले श्रीकांत ने इसी साल जून में पहले इंडोनेशिया सुपर सीरीज प्रीमियर का खिताब जीता और फिर एक हफ्ते बाद ही ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज जीतकर इतिहास रच दिया. किदांबी ने इन दोनों टूर्नामेंट में न केवल विश्व के नंबर एक शटलर सोन वान को दो बार हराया, बल्कि ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में मौजूदा ओलंपिक चैंपियन और विश्व चैंपियन चेन लांग को सीधे सेटों में शिकस्त दी.

साल 2015 में अर्जुन अवार्ड पाने वाले श्रीकांत को इस साल मार्च में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया | फोटो : पीआईबी
साल 2015 में अर्जुन अवार्ड पाने वाले श्रीकांत को इस साल मार्च में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया | फोटो : पीआईबी

इसके बाद अक्टूबर में आंध्र प्रदेश के इस नौजवान ने डेनमार्क ओपेन सुपर सीरीज का खिताब भी जीत लिया. इसके एक हफ्ते के अंदर ही उन्होंने एक और बड़ा टूर्नामेंट ‘फ्रेंच ओपन सुपर सीरीज’ भी अपने नाम कर लिया. यह टूर्नामेंट जीतने के बाद किदांबी श्रीकांत विश्व रैंकिंग में दूसरे पायदान पर आ गए थे. साथ ही वे ली चोंग वाई, ली डैन और चेन लांग के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए एक साल के अंदर बैडमिन्टन की चार ‘सुपर सीरीज’ अपने नाम करने वाले दुनिया के चौथे और भारत के इकलौते खिलाड़ी बन गये. इसके अलावा यह युवा स्टार शटलर बैडमिंटन की सुपर सीरीज, सुपर सीरीज प्रीमियर और ग्रां पी गोल्ड तीनों टूर्नामेंट जीतने वाला पहला भारतीय शटलर भी बन गया.

लेकिन, इन बड़ी सफलताओं के बावजूद श्रीकांत का अपने करियर के शिखर पर पहुंचना बाकी ही था. हालांकि, इसके लिए उन्हें ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा और उन्होंने इस शिखर को अप्रैल 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में हासिल कर लिया. ऑस्ट्रेलिया में चल रहे इन खेलों में मलेशिया के पूर्व नंबर एक खिलाड़ी ली चोंग वाई को हराकर वे दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी बन गए. इस भारतीय नौजवान की इस सफलता के मायने इस बात से समझे जा सकते हैं कि पुरुष बैडमिंटन में 38 साल पहले भारत की ओर से केवल प्रकाश पादुकोण ही शीर्ष पायदान हासिल कर सके थे.

कई जानकार श्रीकांत की बेजोड़ तकनीक और जीतने की इच्छा शक्ति को देखते हुए मानते हैं कि यह खिलाड़ी भविष्य में वह हासिल करने वाला है, जो अभी तक दुनिया के चंद शटलर ही हासिल कर सके हैं. इसका एक कारण उनकी उम्र भी है जो अभी महज 25 साल है. श्रीकांत के अगले दो बड़े लक्ष्य ओलंपिक में सोना जीतना और प्रतिष्ठित ‘ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप’ का खिताब पाना है. यह खिताब बैडमिन्टन के हर खिलाड़ी का सपना होता है. अभी तक केवल दो भारतीय प्रकाश पादुकोण और पुलेला गोपीचंद ही इसे हासिल कर सके हैं. हालांकि, जिस तरह से श्रीकांत आगे बढ़ते जा रहे हैं उसे देखते हुए माना जा रहा है कि वे जल्द ही इन मील के पत्थरों को भी पीछे छोड़ देंगे.

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