जानकारियों तक जनता की पहुंच को आसान बनाने वाला सोशल मीडिया अब उन्हीं जानकारियों के चलते जनता के लिए संकट भी बनता दिख रहा है. हाल ही में नौ देशों में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि सरकारें और किसी ख़ास मकसद से जुड़े हुए सोशल मीडिया के हवाले से झूठी और भ्रामक ख़बरें फैला रहे हैं. इसका मकसद है जनता की राय को अपनी तरफ मोड़ना.

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविध्यालय ने हाल ही में ‘कम्प्यूटेशनल प्रोपेगैंडा रिसर्च प्रोजेक्ट’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के मुताबिक़ रूस जैसे देश में 45 प्रतिशत ट्विटर एकाउंट्स बोट्स हैं. बोट एक स्वचालित कंप्यूटर स्क्रिप्ट होती है जो एक साथ लाखों लोगों तक ऑनलाइन भेजी जाती है और जिस पर लोगों के कई लाख लाइक्स या शेयर दिखाए जाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान में राष्ट्रपति हत्साई इंग व्हेन के खिलाफ़ चीन ने सोशल मीडिया पर बोट्स के जरिये झूठा प्रचार किया था. रिपोर्ट आगाह करती है कि बोट्स के सहारे गंदी राजनीति का खेल हो रहा है.

आप इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब आप किसी राजनीतिक या व्यापारिक मुद्दे से जुडी हुई ऑनलाइन खबर या पोस्ट देखते हैं तो आप पाते हैं कि उनपर लाखों लाइक्स और शेयर्स होते हैं. आप उन लाइक्स और शेयर्स को देखकर प्रभावित हो जाते हैं और जाने-अनजाने उस खबर या पोस्ट से सहमत होकर अपनी राय बनाते हैं. यह आज के दौर में रायशुमारी बनाने का सबसे कारगर हथियार है जिसकी परिणति उस राजनैतिक पार्टी के पक्ष में वोट देकर या उस कंपनी के उत्पाद खरीदने पर होती है. इसलिए जानकारों के मुताबिक फेसबुक पर जब आप ‘फलां प्रधानमंत्री फैन क्लब’ या ‘फलां पार्टी फैन क्लब’ देखें तो हो सकता है कि वह एक राजनैतिक बोट हो जो आपकी राय को संबंधित व्यक्ति या पार्टी के हक में मोड़ने का काम कर रहा हो.

रूस और ताइवान के अलावा जिन देशों में ये अध्ययन किया गया वे हैं- ब्राज़ील, कनाडा, चीन, जर्मनी, पोलैंड, यूक्रेन और अमेरिका. अंग्रेजी अखबार ‘द गार्डियन’ ने ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर फिलिप होवार्ड के हवाले से कहा है कि सोशल मीडिया पर फेसबुक और ट्विटर के कंप्यूटर जनित प्रोग्राम्स (अल्गोरिद्म) झूठ, जंक और ग़लत जानकारियां फैला रहे हैं. उनके मुताबिक आजकल सोशल साइट्स पर नकली एकाउंट्स बनाकर जनता की राय को बदला जा रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे नकली एकाउंट्स के ज़रिये ख़ास मकसद के प्रोग्रामों (बोट्स) को आगे फैलाकर वास्तविक मुद्दे दबा दिए जाते हैं. चूंकि इन पर लाइक्स और शेयर्स की संख्या ज्यादा होती है, लिहाज़ा, लोग इन पर यकीन कर लेते हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि इस तरह के झूठे प्रचार-प्रसार से आम सहमति का निर्माण किया जा रहा है और छद्म लोकप्रियता गढ़ी जा रही है.

80 के दशक में एडवर्ड हरमन और नोऍम चोमस्की की किताब ‘ मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ ने इस विषय को सबसे पहले उठाया था कि कैसे झूठे साधनों से संचार मीडिया में आम सहमति का निर्माण राजनैतिक पार्टियां अपने पक्ष में करती हैं. अब बात एक कदम आगे बढ़कर इंटरनेट तक पहुंच गई है.

भारत में 2015 में हुए आम चुनावों में भी सोशल मीडिया का बहुत सहारा लिया गया था. भाजपा की जीत में एक बड़ी भूमिका इसकी भी बताई गई थी. अमेरिकी चुनावों के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट भी काफी चर्चा में रहे थे.

इस शोध के मुताबिक़ जर्मनी ऐसा देश है जहां इस तरह का खतरा सबसे कम है. जर्मनी ने ऐसे कानून बनाये हैं जो ऑनलाइन साइट्स को उनके कंटेंट्स के लिए ज़िम्मेदार बनाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़ जर्मनी का कानून इस तरह के कंप्यूटर जनित झूठे प्रचार प्रसार से निपटने में कारगर है.

कुछ समय पहले जर्मनी की चांसलर अंगेला मर्केल ने फेसबुक और गूगल को विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि इसकी कार्यशैली पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं हैं. उन्होंने गूगल के अल्गोरिद्म्स को सार्वजानिक करने की मांग भी उठाई है.

जबसे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हुई है तबसे फेसबुक पर यह इल्ज़ाम लगाया जा रहा है कि उसने सोशल मीडिया पर ट्रंप के पक्ष में झूठी और भ्रामक ख़बरें फैलाई थीं. हालांकि फेसबुक ने इस बात का खंडन किया है और भरोसा भी दिलाया है कि उसने कई कदम उठाकर झूठी ख़बरों को फैलने से रोका है.