लालू यादव और सोनिया गांधी ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को हराने के लिए नहीं नीतीश को डराने के लिए चुना था. लेकिन नीतीश कुमार को इस बार भी पहचानने में कांग्रेस और लालू यादव ने भूल कर दी. उन्होंने शब्दों की मर्यादा में रहकर सोनिया और लालू दोनों को जवाब दे दिया. इफ्तार लालू यादव का था, खर्चा भी उन्हीं का लेकिन चर्चा नीतीश के बयान की हुई.

लालू यादव के घर के सामने खड़े होकर नीतीश कुमार ने कह दिया, बिहार की बेटी को राष्ट्रपति का चुनाव जिताने के लिए नहीं हराने के लिए चुना गया है. अगर मीरा कुमार को राष्ट्रपति बनाना ही था तो तब बनाते जब सोनिया गांधी ने प्रतिभा पाटिल या प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाया था. जब सोनिया गांधी के बुलावे पर ज्यादातर विपक्षी पार्टी के नेता मिले तो सबकी ज़ुबान पर एक ही चर्चा थी कि आखिर नीतीश ने बैठक से पहले ही नरेंद्र मोदी के उम्मीदवार का साथ क्यों दिया? नीतीश ने अब खुद ही इस फैसले की वजह बता दी है. उन्होंने यह राज़ खोल दिया कि विपक्षी नेताओं की बैठक गुरुवार को हुई लेकिन मीरा कुमार को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने का फैसला पहले ही हो गया था.

सुनी-सुनाई है कि बीते बुधवार को ही मीरा कुमार सोनिया गांधी से मिली थीं जिसके बाद लालू यादव और शरद पवार को बता दिया गया था कि वे ही रामनाथ कोविंद का मुकाबला करेंगी. राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद को सोनिया गांधी ने नीतीश कुमार को मनाने पटना भेजा था. इसी के बाद नीतीश कुमार ने विपक्ष की बैठक में जाने से इंकार कर दिया और अब यह भी कह दिया कि ऐसी बैठक में जाने से क्या फायदा जिसका फैसला पहले ही हो चुका हो.

यहां दिलचस्प बात यह है कि नीतीश बिहार की मीरा कुमार को छोड़कर उत्तर प्रदेश के रामनाथ कोविंद का समर्थन कर रहे हैं और मायावती उत्तर प्रदेश के रामनाथ कोविंद को छोड़कर बिहार की मीरा कुमार का. इसकी वजह है कि मीरा कुमार की जाति और मायावती का कोर वोटबैंक एक ही है. उधर मीरा कुमार दलितों के जिस जाटव समुदाय से आती हैं उसकी संख्या बिहार में उतनी नहीं है कि नीतीश को इससे कोई फर्क पड़ सके.

लेकिन इस सबसे अलग इस चुनाव में नीतीश कुमार ने एक तरह से खुल्लम-खुल्ला एलान कर दिया है कि वे अब स्वतंत्र रास्ते पर चलना चाहते हैं और बिहार के किसी गठबंधन धर्म से नहीं जुड़े हैं. इस बार उन्होंने सिर्फ लालू यादव को ही नहीं सोनिया गांधी को भी नाराज़ किया है जबकि उनकी सरकार लालू और सोनिया की पार्टी के समर्थन से ही चल रही है. लालू यादव छटपटा रहे हैं, लेकिन फिलहाल कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं. सोनिया भी कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.

लालू यादव के पास वैसे तो केंद्र सरकार के खिलाफ शिकायतों का पिटारा है, लेकिन सुनी-सुनाई है कि उऩकी सबसे नई शिकायत यह है कि नीतीश से ज्यादा सांसद और विधायक होने के बाद भी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उनसे मोदी सरकार के किसी मंत्री तक ने संपर्क क्यों नहीं किया. जबकि नीतीश कुमार से खुद प्रधानमंत्री ने बात की. विपक्षी खेमे में खबर उड़ी हुई है कि इनकम टैक्स और सीबीआई की जांच में लालू परिवार इतना फंसा हुआ है कि वे चाहकर भी नीतीश की सरकार से समर्थन वापस नहीं ले सकते. इसलिए नीतीश ने सोच-समझकर यह खतरा उठाया है.

इस समय उनके दिल्ली में जीतने की गारंटी हर हाल में है और पटना में सरकार ना गिरने की भी.