भारत में कुछ ऐसे राष्ट्रपति भी हुए हैं जिन्हें प्रधानमंत्री का ‘यस मैन’ कहा जाता था. ऐसे राष्ट्रपतियों में जैल सिंह और प्रतिभा पाटिल का नाम लिया जाता है. कहते हैं कि भारत में ‘यस मैन’ राष्ट्रपति वाली परंपरा देश के चौथे राष्ट्रपति वराहगिरि वेंकट गिरि यानी वीवी गिरि ने शुरू की.

एक तेलगू ब्राह्मण परिवार में जन्मे वेंकट ने कॉलेज की पढ़ाई डबलिन, आयरलैंड से की थी जिससे यह तो शायद साबित हो जाता है कि वे होशियार थे. आयरिश इतिहासकार कॉनर मुल्वा ने अपनी क़िताब ‘आयरिश डेज, इंडियन मेमोरीज़: वीवी गिरि एंड अदर स्टूडेंट्स’ में लिखा है, ‘लंदन में गिरि गांधी से अक्सर मिला करते थे. गांधी ने उन्हें बोअर की लड़ाई में अंग्रेजों की तरफ से रेडक्रॉस सोसाइटी के साथ जुड़ने की अपील की. गिरि गांधी के प्रभाव में आ गए और हामी भर दी.’

कॉनर आगे लिखते हैं, ‘अगले ही दिन गिरि ने चिट्ठी लिखकर गांधी को बताया कि वे रेडक्रॉस के साथ काम करना नहीं चाहते.’ गिरी मानते थे कि अंग्रेजों पर आया हर संकट भारत के लिए अवसर है इसलिए इस दौरान किसी भारतीय को उनकी मदद नहीं करनी चाहिए. उन्होंने अपनी चिट्ठी में यह भी लिखा कि गांधी अगर चाहें तो उनका यह रुख सार्वजनिक कर सकते हैं. गांधी ने गिरि की मनोस्थिति को समझ लिया. कॉनर आगे लिखते हैं, ‘यह गांधी की महानता ही थी जिसके चलते गिरि ऐसा कर पाए. अन्यथा गांधी अगर वह चिट्ठी अंग्रेजों के हवाले कर देते तो गिरि की वकालत अधूरी रह जाती.’

डबलिन में पढाई के दौरान वीवी गिरि एक आंदोलन से जुड़ गए जिसकी वजह से उन्हें आयरलैंड से देश निकाला दे दिया गया. हिंदुस्तान आकर उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय में वकालत शुरू कर दी और साथ-साथ कांग्रेस से भी जुड़ गये. 1920 में उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल भी गए.

1923 में वीवी गिरि मज़दूर संघठनों से जुड़े. तेज़तर्रार यह शख्स आल इंडिया रेल कर्मचारी फेडरेशन का महासचिव नियुक्त हुआ. बाद में वे इसके अध्यक्ष भी चुने गए. 1928 में उन्होंने बंगाल-नागपुर रेलवे संगठन की स्थापना की. यह उन पर गांधी का प्रभाव ही था कि गिरि के नेतृत्व में रेल कर्मचारियों ने पहली अहिंसक हड़ताल की. यह हड़ताल इतनी व्यापक थी कि सरकार और रेल प्रबंधन उनकी मांगें मानने को राज़ी हो गया था जिसके तहत निकाले गए मजदूरों को दोबारा भर्ती किया गया. बाद में उन्होंने ‘इंडियन ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन’ की स्थापना की. जिनेवा में 1927 में हुई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर कांफ्रेंस में वे मज़दूरों की तरफ से उनके नुमाइंदे की हैसियत से शरीक हुए थे.

उन दिनों दक्षिण भारत की राजनीति में राजगोपालाचारी का बड़ा बोलबाला था. राजाजी को वीवी गिरि भा गए और यहीं से उनका राजनैतिक जीवन तेज़ी से आगे बढ़ा. 1936 में जब मद्रास में राजाजी के नेतृत्व में कांग्रेस की अंतरिम सरकार बनी तो वीवी गिरि उसमें श्रम मंत्री बनाए गए. दुसरे विश्वयुद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया और जेल भी गये.

1952 में पहला आम चुनाव हुआ. वीवी गिरी कांग्रेस पार्टी की सरकार में वो पहले श्रम मंत्री बनाये गए. मजदूर आंदोलनों से कुशलतापूर्वक निपटने के उनके फॉर्मूले को ‘गिरि फार्मूला’ कहा जाता था. दरअसल, वीवी गिरि की समाजवादी राजनैतिक विचारधारा ने उन्हें हमेशा मज़दूर आंदोलनों के बीच ही रखा. एक बार जब कांग्रेस की सरकार ने बैंक कर्मचारियों की वेतन बढ़ाने की मांग को ठुकरा दिया तो उन्होंने श्रम मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

1957 के दूसरे आम चुनावों में वीवी गिरि आंध्र प्रदेश में पार्वतीपुरम की अपनी सीट खो बैठे थे. यह बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है. उन दिनों आरक्षित सीट का प्रावधान नहीं था. कुछ सीटों पर जातीय समीकरण बराबर रखने के लिए संविधान ने एक ही पार्टी से सामान्य वर्ग के अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति के प्रत्याशी को भी उसी सीट से चुनाव लड़ने की इज़ाज़त दे रखी थी. लिहाज़ा, हर पार्टी अपने दो प्रत्याशी चुनाव में उतारती थी- एक सामान्य वर्ग वाला और दूसरा एससी/एसटी वाला. गिरि चूंकि ब्राह्मण थे इसलिए उन्होंने सामान्य कोटे पर चुनाव लड़ा और हार गए. बस यहीं से उनके सक्रिय राजनैतिक जीवन का पटाक्षेप हो गया.

दूसरी राजनैतिक पारी में कांग्रेस सरकार ने वीवी गिरि को उत्तर प्रदेश, केरल और कर्नाटक का राज्यपाल बनाया. उनकी यह पारी कांग्रेस पार्टी को रास आने लगी थी. बताया जाता है कि कांग्रेस ने उनकी सत्ता का सुख भोगने की लालसा को भांप लिया था जिसके चलते उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति बना दिया गया.

1969 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर जाकिर हुसैन का निधन हो जाने से वीवी गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किया गया. जब राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ तो कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों ने इंदिरा गांधी की इच्छा को दरकिनार कर नीलम संजीव रेड्डी को अपना प्रत्याशी घोषित किया. उधर, विपक्ष ने भारतीय रिज़र्व बैंक के पहले भारतीय गवर्नर सीडी देशमुख को अपना उम्मीदवार बनाया. हालात को भांपते हुए वीवी गिरि ने तुरंत ही अपने पद से इस्तीफा दिया और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में कूद पड़े. जाते-जाते उन्होंने इंदिरा गांधी की मर्ज़ी के मुताबिक़ बैंकों और बीमा कंपनियों के राष्ट्रीयकरण को मंज़ूरी दे दी. इंदिरा गांधी ने भी मौका देखते हुए अपनी पार्टी के लोगों से ‘आत्मा की आवाज़’ सुनने की अपील की और दिग्गजों के प्रत्याशी संजीव रेड्डी के बजाय वीवी गिरि को वोट देने की अपील की. जाहिर था कि गिरि के सिर पर इंदिरा गांधी का हाथ था जो ‘कांग्रेस सिंडिकेट’ के दिग्गजों को धूल चटानी चाहती थीं.

एक बड़ा वर्ग मानता है कि उस वक़्त तीनों उम्मीदवारों में अगर कोई राष्ट्रपति बनने के काबिल था तो वे थे सीडी देशमुख जिनकी अपनी विद्वता और निर्भीकता के लिए खूब ख्याति थी. देशमुख ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया था. वे नहीं चाहते थे कि रिज़र्व बैंक सरकार के हाथों की कठपुतली बन जाये पर उनकी चली नहीं थी. खैर, यह किस्सा फिर कभी.

जैसी संभावना थी वैसा ही हुआ. सत्ता पक्ष में पड़ी फूट के चलते वराहगिरि वेंकट गिरि देश के चौथे राष्ट्रपति बन गए. बस फिर क्या था. उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की सरकार को बर्खास्त करना हो या फिर राजा-महाराजाओं को मिलने वाली पेंशन को बंद करने के अध्यादेश पर दस्तखत करना, जो-जो इंदिरा गांधी कहती गईं, वीवी गिरि करते गए. इस सबका नतीजा यह हुआ कि गिरि साहब को विपक्ष ने ‘प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति’ या ‘रबर स्टैम्प’ की उपाधि दे डाली.

हालात इतने बदतर हो गए थे कि इंदिरा गांधी ने जस्टिस एएन राय को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश न बनाने की वीवी गिरि की राय को मानने से इनकार कर दिया था. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की वरिष्ठता की अनदेखी कर जस्टिस राय को प्रधान न्यायाधीश बनाया था. यह इंदिरा गांधी की तानाशाही मंशाओं के मजबूत होने का संकेत था. जस्टिस राय ग्यारह न्यायाधीशों की खंडपीठ में अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन किया था. 1972 में वीवी गिरि ने स्व-प्रेरणा से श्रीमती इंदिरा गांधी को भारत रत्न की उपाधि से नवाज़ा. इंदिरा गांधी ने भी वीवी गिरि को 1975 में भारत रत्न देकर जैसे हिसाब बराबर कर दिया था!

वीवी गिरि ने यकीनन राष्ट्रपति पद की गरिमा को कम किया था. जो परिपाटी उन्होंने और इंदिरा गांधी ने अपनाई थी वह इस पद पर जैल सिंह जैसी नियुक्तियों से आगे बढ़ी. अब देखने वाली बात होगी कि क्या रामनाथ कोविंद एक और रबर स्टैम्प साबित होंगे या वे राष्ट्रपति भवन को वह गरिमा प्रदान करेंगे जिसका वह हक़दार है.