पिछले साल दिसंबर में जयललिता के निधन के बाद से अब तक ‘तमिल राजनीति की फिल्मी पटकथा’ किसी शून्य में झूल रही थी. मानो वह अपने लिए किसी अदद फिल्मी सितारे की तलाश में थी. उसकी यह तलाश कमल हासन पर पूरी होती दिख रही है. अभी सात नवंबर को ही 63 साल के हुए कमल हासन ने जन्मदिन के मौके पर साफ शब्दों में सभी को बता दिया है कि वे ‘राजनीति में आ चुके हैं.’ यह भी कि जनवरी से वे पूरे राज्य का दौरा और इस दौरान लोगों से सीधा संवाद करने वाले हैं. उससे पहले वे एक मोबाइल एप्लीकेशन ‘मय्यम व्हिसल’ लॉन्च करेंगे और दौरा ख़त्म होने के बाद या हो सकता है कि बीच में भी कभी अपनी नई पार्टी भी.

सो अब यह सवाल लाज़िमी है कि तमिल राजनीति में कमल हासन ने ऐसा क्या देखा कि वे उम्र के इस पड़ाव पर इसमें अपने भविष्य की संभावनाएं देखने लगे हैं? इसका ज़वाब तमिल राजनीति की फिल्मी पटकथा में मिलता है जो पहले-पहल 1949 में लिखी जानी शुरू हुई थी. यानी वह साल जब सीएन अन्नादुरई ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की स्थापना की. इसके बाद इस पटकथा में एम करुणानिधि, एमजीआर (मरुदुर गोपालन रामचंद्रन) तथा जयललिता जयराम जैसे चमकदार सितारे जुड़ते चले गए. और किसी चलचित्र की मानिंद पटकथा आगे बढ़ती रही. कैसे और किस तरह? यह समझने के लिए इन सितारों से जुड़े कुछ अहम पड़ावों का जायज़ा लिया जा सकता है.

1 सीएन अन्नादुरई

तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी घालमेल करने का श्रेय सीएन अन्नादुरई को जाता है. वे मूलत: फिल्मों और नाटकों की पटकथा लिखा करते थे. राज्य में 1925 में पेरियार ईवी रामासामी ने जब निचली जातियों को समाज में बराबरी का हक दिलाने के लिए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ शुरू किया तो अन्नादुरई भी इससे जुड़ गए. मद्रास प्रेसिडेंसी के उस ज़माने में राज्य की निचली जातियों को ‘द्रविड़ियन’ कहा जाता था. आंदोलन के ज़रिए उनको प्रोत्साहित किया गया कि वे वैदिक रीति-रिवाज़ को न मानें. ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनौती दें. इस अांदोलन को ‘द जस्टिस पार्टी’ भी समर्थन दे रही थी जिसे 1916 पी त्यागराया शेट्‌टी ने स्थापित किया था.

जस्टिस पार्टी में बहुलता तो ग़ैर-ब्राह्मणों की ही थी लेकिन ऊंचे ओहदों पर ज़्यादातर ज़मींदार बैठे थे. लिहाज़ा पेरियार ने जल्द ही उससे अलग राह पकड़ ली. उन्होंने 1944 में ‘द्रविड़ार कड़गम’ की स्थापना की जिसमें जस्टिस पार्टी का भी विलय हो गया. इस बीच 1937 में केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जब देश में हिंदी अनिवार्य करने का फ़रमान ज़ारी किया तो तमिलनाडु में सामाजिक सुधार के लिए चलाए जा रहे आत्मसम्मान आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया. अब द्रविड़ार कड़गम की अगुवाई में ब्राह्मणों के वर्चस्व के साथ हिंदी की अनिवार्यता को भी चुनौती दी जाने लगी थी. और इसमें अन्नादुरई की पटकथाएं बड़ा ज़रिया बन रही थीं.

हालांकि पांच साल बाद ही 1949 में द्रविड़ार कड़गम दोफाड़ हो गई. इस विभाजन की पटकथा लिखने वाले भी अन्नादुरई ही थे. इसमें पेरियार के भतीजे ईवीके संपत और उस दौर के फिल्म अभिनेता केआर रामास्वामी ने उनका साथ दिया था. इस तरह अन्नादुरई अब ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (डीएमके) नाम के एक अलग दल के मुखिया हो चुके थे. इस हैसियत से वे अब एक साथ दो मोर्चाें पर काम कर रहे थे. पहला- वे अपने नाटकाें और फिल्मों के ज़रिए समाज सुधार और हिंदी विरोधी आंदोलन को लगातार प्रोत्साहित कर रहे थे. दूसरा- फिल्मों और नाटकों के रास्ते अपना और अपनी पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ाते जा रहे थे.

अन्नादुरई आम जनमानस पर फिल्म और फिल्मी क़िरदाराें के असर को पढ़ चुके थे. इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे कई फिल्मी हस्तियों को अपने साथ जोड़ा. इनमें रामास्वामी के अलावा, एनएस कृष्णन, एमआर राधा, शिवाजी गणेशन, एसएस राजेंद्रन, एमजी रामचंद्रन और एम करुणानिधि प्रमुख थे. यानी स्थापना से महज़ पांच-सात साल के भीतर ही डीएमके में फिल्मी हस्तियों का ख़ासा जमावड़ा हो चुका था जो मिलकर अन्नादुरई के मक़सद को आगे बढ़ा रही थीं. इसका असर हुआ और डीएमके ने (जो 1957 से ही विधानसभा के चुनाव में हिस्सा लेने लगी थी) 1967 में 234 में से 138 सीटें जीतकर राज्य में सरकार बना ली. अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने.

2. एम करुणानिधि

अन्नादुरई हालांकि मुख्यमंत्री के तौर पर ज़्यादा काम नहीं कर सके. दो साल बाद फरवरी 1969 में उनका निधन हो गया. उनके निधन के बाद डीएमके की कमान तमिल सिनेमा के एक और बड़े पटकथा-संवाद लेखक तथा कवि एम करुणानिधि के हाथ में आ गई. राज्य के मुख्यमंत्री का पद भी उन्हीं के ख़ाते में गया और पार्टी के ख़ातों की देख-रेख का काम बतौर कोषाध्यक्ष उस दौर के लोकप्रिय अभिनेता एमजीआर के हिस्से में आया. करुणानिधि हालांकि इससे पहले ‘पराशक्ति’ जैसी अपनी हिट फिल्मों के ज़रिए इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि कहते हैं फिल्मी पर्दे पर सबसे पहले उनका नाम ही नज़र आया करता था. कुछ ऐसे, ‘स्टोरी एंड डायलॉग बाइ कलईनार (कलाकार) एम करुणानिधि.’ इसके बाद फिल्म से जुड़े अन्य लोगों का.

हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद करुणानिधि ने दो मोर्चाें पर काम किया. फिल्माें की पटकथाओं, संवादों और कविताओं के ज़रिए वे अपनी पार्टी के सिनेमाई साथियों के सहयोग से समाज सुधार और हिंदी विरोधी आंदोलन को हवा दे ही रहे थे. दूसरा- सरकार के मुखिया के तौर पर उन्होंने ग़रीब कल्याण के कई कार्यक्रम भी लागू किए. इन कार्यक्रमों में अहम था ‘आत्म-सम्मान विवाह’ (सेल्फ रिस्पेक्ट मैरिज) को कानूनी रूप देना. यह सजातीय-अंतर्जातीय प्रेम विवाह होते थे लेकिन इनमें ब्राह्मणों से वैवाहिक कर्मकांड नहीं कराए जाते थे. इसका नतीज़ा यह हुआ कि 1971 में लगातार दूसरी बार डीएमके भारी बहुमत से सत्ता में लौटी और करुणानिधि फिर मुख्यमंत्री बने. हालांकि जल्द ही कलईनार पर पार्टी के वैचारिक धरातल से हटने और भ्रष्ट आचरण के आरोप लगने लगे. इस पर उनका पार्टी के दूसरे सबसे ताक़तवर शख़्स एमजीआर से मनमुटाव भी बढ़ने लगा.

3. मरुदुर गोपालन रामचंद्रन ‘एमजीआर’

करुणानिधि और एमजीआर के बीच तक़रार इतनी बढ़ी कि दोनों का साथ चलना मुश्किल हो गया. आखिरकार करुणानिधि ने एमजीआर को पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद 1972 में एमजीआर ने अलग पार्टी (अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जो बाद में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम कहलाने लगी) बना ली. यह पहल तमिलनाडु की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने वाली साबित हुई क्योंकि यहां से राज्य की राजनीति डीएमके और एआईएडीएमके के बीच बंट और सिमट गई. एमजीआर ने तमिलनाडु की राजनीति को भी और कई अर्थों में परिभाषित किया. जैसे कि उस दौर में जब राज्य की राजनीति तमिल-ग़ैर तमिल के इर्द-ग़िर्द घूम रही थी (यह चलन आज भी है) एमजीआर पहले शख़्स थे जो तमिलनाडु से बाहर के होने के बावज़ूद अपना राजनीतिक जनाधार बना चुके थे.

यहां बताते चलें कि एमजीआर का जन्म केरल में पलक्कड़ जिले के वदवन्नूर गांव से ताल्लुक रखने वाले नायर परिवार में हुआ था. जब एमजीआर पैदा हुए तो उनका परिवार कैंडी, सीलोन (वर्तमान में श्रीलंका का हिस्सा) के नवलापिटिया गांव में रह रहा था. यानी तमिलनाडु के बाहर से ताल्लुक रखने के बावज़ूद यह मसला एमजीआर को छू तक नहीं गया.

सिर्फ इतना ही नहीं. उन्होंने अपने करिश्मे से कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष के कामराज जैसे दिग्गज नेताअों को भी गलत साबित किया. इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है. कहते हैं एक बार ने कामराज ने डीएमके में एमजीआर जैसी फिल्मी हस्तियों के जमावड़े पर तंज कसा था. उन्होंने कहा था, ‘भला फिल्मी कलाकारों की कोई सरकार कैसे हो सकती है.’ लेकिन एमजीआर ने इस तंज को चुनौती की तरह लिया. और अलग पार्टी बनाने के पांच साल के भीतर 1977 में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गए. वह पहला मौका था जब देश में फिल्म का कोई हीरो किसी राज्य का मुख्यमंत्री बना.

लेकिन एमजीआर के लिए यह कामयाबी कोई तुक्का नहीं था. उन्होंने एक के बाद एक तीन चुनाव (1977, 1980, 1984) जीते और दिसंबर 1987 में निधन होने तक लगातार 10 साल मुख्यमंत्री रहे. यही नहीं इस बीच केंद्र की सत्ता में भी उनकी पार्टी साझीदार रही और राष्ट्रीय राजनीति में द्रविड़ियन पार्टियों की प्रभावी भूमिका की यह भी पहली शुरुआत थी. एमजीआर की पार्टी के सांसद अरविंद बाला पझनोर और सत्यवाणी मुत्थु उस वक्त प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की सरकार में मंत्री बने थे. लेकिन यह सब हासिल करने के लिए एमजीआर को लंबा सफर तय करना पड़ा. वे 1953 से कांग्रेस के सदस्य के तौर पर राजनीति में आ गए थे. फिर अन्नादुरई और करुणानिधि के साथ डीएमके में रहे.

फिल्मों को भी उन्होंने अपना जनाधार और लोकप्रियता बढ़ाने के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया. तमिलनाडु के एक वरिष्ठ पत्रकार संपत कुमार कहते हैं, ‘एमजीआर अपनी छवि को लेकर बेहद सचेत रहते थे. उन्हें फिल्मों में शराब, सिगरेट पीते किसी ने नहीं देखा. उन्होंने हमेशा बतौर नायक ही भूमिकाएं कीं. इनमें ग़रीबों के मसीहा और ज़रूरतमंदों के मददग़ार की भूमिकाएं ही ज़्यादा निभाईं. फिर जब मुख्यमंत्री बने तब भी ‘मध्यान्ह भोजन’, ‘महिलाओं के लिए विशेष बसें चलाने’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम शुरू किए, जिसने उनकी छवि भगवान सरीखी बना दी. यही वज़ह है कि तमिलनाडु के कई गांवों में आज भी लोग यह मानने से इंकार कर देते हैं कि एमजीआर अब इस दुनिया में नहीं रहे.’

4. कोमलावल्ली यानी जयललिता जयराम

एमजीआर की लोकप्रियता, उनकी नज़दीकी और उनके मार्गदर्शन का पूरा फ़ायदा उनके बाद जयललिता जयराम काे मिला. जयललिता मैसुरू, कर्नाटक में एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुईं. उनके दादा मैसुरू रियासत के राजवैद्य हुआ करते थे. लाेगों को मैसुरू के राजा जयचमराजेंद्र वाडियार के साथ उनके परिवार का संबंध याद रहे इसलिए उन्होंने अपने परिजनों के नाम से पहले ‘जय’ लगाने का चलन शुरू किया. जयललिता का बचपन का नाम कोमलावल्ली था. पिता जयराम के निधन के बाद कुछ समय जयललिता ननिहाल में रहने के लिए मां के साथ बेंगलुरू आ गईं. यहां कुछ साल उनकी बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल में शिक्षा-दीक्षा हुई. फिर उनकी मां फिल्मों में काम करने के चेन्नई आईं तो जयललिता भी वहां आ गईं.

ग़ैर-तमिल और ब्राह्मण होने के साथ ही जयललिता की फिल्में भी उनकी राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में कोई ज़्यादा मददग़ार नहीं रहीं. फिर भी वे तमिल राजनीति की सफल सितारा बनीं तो इसकी वज़ह थे सिर्फ एमजीआर, जो उनकी फिल्मों के नायक रहे और राजनीतिक चलचित्र के भी. फिर एमजीआर के निधन के बाद जयललिता ने किस संघर्ष के साथ एआईएडीएमके और तमिल राजनीति में ख़ुद को स्थापित किया यह कहानी कई बार कही-सुनी जा चुकी है.एमजीआर की सिखाई राजनीति पर अमल करते हुए जयललिता ने एआईएडीएमके को विधानसभा के चुनावों में चार बार (1991, 2002, 2011 और 2016) जीत दिलवाई. ज़ाहिर है हर बार वे ही मुख्यमंत्री बनीं या जब आय से अधिक संपत्ति जुटाने का दोषी पाए जाने पर अदालत ने उन्हें जेल भेजा तो उनका मोहरा कहे जाने वाले ओपीएस (ओ पन्नीरसेल्वम).

5. तो अब क्या अगला किरदार कमल हासन हो सकते हैं?

तो अब क्या इस पटकथा का अगला किरदार कमल हासन हैं? इसका ज़वाब फिलहाल कुछ संकेतों में ही ढूंढना होगा. मसलन एक संकेत तमिल रंगमंच के बड़े कलाकार क्रेज़ी मोहन (सीएम) देते हैं. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ‘पूर्णता (परफेक्शन) का नाम कमल हासन है. दृढ़ता और लगन का नाम कमल हासन है. अपने मक़सद के लिए लगन और दृढ़ता का दूसरा नाम कमल हासन है. ऐसी लगन और दृढ़ता मैंने किसी और में नहीं देखी.’ निश्चित ही सीएम की यह बातें फिलहाल तो फिल्मी पेशे के प्रति कमल हासन के समर्पण के बाताल्लुक ही माननी चाहिए. लेकिन उनकी राजनीति के शुरुआती संकेत भी कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं कि वे बेहद सधे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं.

मसलन- राजनीति में आने की घोषणा करने के बाद कमल ने अब तक कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई है. बल्कि मंझे हुए राजनेता की तरह उन्होंने पहले समान विचार वाले अन्य नेताओं से मुलाकात का सिलसिला शुरू किया है. इस क्रम में वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से मिल चुके हैं. तो दूसरी तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल से भी. और मामला सिर्फ मेल-मुलाकातों तक सीमित नहीं है. कमल हासन लगातार यह संकेत भी दे रहे हैं कि उनकी राजनीति राह कैसी होगी.

इसके भी उदाहरण हैं. जैसे- जब वे केरल के मुख्यमंत्री से मिले तो मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मेरा रंग केसरिया नहीं है.’ फिर इसी लाइन पर आगे बढ़ते हुए एक साप्ताहिक तमिल पत्रिका में अपने लेख में लिखा, ‘हिंदू संगठन पहले किसी हिंसा में शामिल नहीं होते थे. वे विरोधियों से बात करते थे. लेकिन अब हिंसा करने लगे हैं. लिहाज़ा वे अब किसी को इसलिए चुनौती नहीं दे सकते कि वह अतिवाद का शिकार है. क्योंकि एक हद तक अतिवाद तो हिंदुओं में भी पैठ गया है. वे ‘सत्यमेव जयते’ से भरोसा खो रहे हैं. इसकी जगह ‘शक्ति ही सत्य है’ के घोषवाक्य पर आस्था रखने लगे हैं.’

इसी तरह जब उन्होंने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की तो भ्रष्टाचार के मुद्दे को छुआ क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजे नेता हैं. और उन्हें यह भी उतनी ही अच्छी तरह मालूम है कि भ्रष्टाचार का मसला ही है जो आज की तारीख में युवाओं को सबसे ज़्यादा खींचता है. लिहाज़ा चेन्नई में केजरीवाल से मुलाकात के वक़्त कमल हासन ने कहा, ‘हम दोनों भ्रष्टाचार से संघर्ष करना चाहते हैं. इसीलिए आज एक साथ हैंं. कोई भी व्यक्ति जो भ्रष्टाचार से जुड़ा है वह मुझसे नहीं जुड़ सकता.’ यानी वे विचार और मुद्दा दोनों साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं.

इसके बाद बात आती है माध्यम और तौर-तरीके की तो उसमें उनकी कार्यशैली देखिए. उन्होंने अपने लेख के जरिए जब हिंदू अतिवाद का मसला उठाया तो सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेताओं ने उन्हें ‘नैतिक तौर पर भ्रष्ट’ तक कह दिया. मगर उन्होंने परिपक्व राजनेता की तरह इस पर कोई तीखी ज़वाबी प्रतिक्रिया नहीं दी. बल्कि कुछ दिन बाद छोटा सा स्पष्टीकरण जारी कर दिया कि ‘मीडिया ने उनकी टिप्पणी की गलत व्याख्या की’ है. और उनके ख़िलाफ़ तनी बंदूकें शांत हो गईं.

सात नवंबर को अपने जन्मदिन के मौके पर कमल हासन ने फिर तमाम अटकलों को धता बता दिया. पहले माना जा रहा था कि इस रोज वे अपनी नई पार्टी के गठन का एलान कर सकते हैं. पर समर्थकों के लगातार दबाव के बावज़ूद उन्होंने ऐसा नहीं किया. बल्कि पहले जन-मानस की थाह लेने का फैसला किया है. वह भी सूचना-संवाद के आधुनिक तौर-तरीकों के साथ, जिसका जिक्र शुरू में ही किया जा चुका है.यानी कमल हासन आधुनिक दौर के खांटी राजनेता की तरह राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं.

इसीलिए आगे यह देखना दिलचस्प हो सकता है कि वे राजनीति के अपने नए करियर में भी पूर्ण व्यक्तित्व का वह तमगा हासिल कर पाते हैं या नहीं जो उन्हें फिल्मों और अभिनय के क्षेत्र में मिला है. और अगर वे ऐसा कर सके तो निश्चित ही न सिर्फ तमिल राजनीति का शून्य भरेंगे बल्कि उसकी फिल्मी पटकथा में नए अध्याय की तरह भी जुड़ेंगे.