राजनीति क्या सिर्फ रणनीति का खेल है? क्या उसमें आदर्श की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है? क्या अब हम किसी राजनेता या दल की प्रशंसा सिर्फ इसलिए करने को बाध्य हैं कि उसने कुशल या चतुर रणनीति के जरिए अपने विरोधियों को हक्का-बक्का कर दिया है? राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों की भूमिका ने हमें इन इन सवालों पर पर नए सिरे से सोचने को मजबूर किया है.

भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में जब जन्मना दलित रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की गई तो ऐसा माना गया मानो उसने अपना तुरुप का पत्ता विपक्ष के मुंह पर फ़ेंक दिया है और अब विपक्ष के पास कोई चारा ही नहीं बचा है. रामविलास पासवान ने तो आगे बढ़कर कह ही डाला कि जो कोविंद का विरोध करेगा वह दलित विरोधी माना जाएगा.

मीडिया फिर से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की इस चाल पर, जिसमें विपक्ष के लिए मात ही मात थी, मुग्ध हो उठा. कुछ ऐसी ही हालत उसकी उस वक्त हुई थी जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व ने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित किया गया था.

कलाम का नाम 2002 के गुजरात की मुस्लिम विरोधी हिंसा के बाद आया था. यह तथ्य है कि गुजरात की हिंसा चल नहीं सकती थी अगर वहां की तत्कालीन सरकार ने या तो उसे शह न दी होती या उसकी ओर से आंख न मूंद ली होती. भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी गुजरात के अपने नेतृत्व को अनुशासित करने के लिए कुछ नहीं किया. इससे उसकी छवि पर मुस्लिम विरोधी का जो धब्बा पहले से लगा था, वह और गाढ़ा हो गया. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम इसी पृष्ठभूमि में लाया गया था. कलाम के चुनाव ने आखिर यह दिखा दिया कि भाजपा को मुसलमानों से परहेज नहीं, आखिर वह एक मुसलमान को राष्ट्रपति तक बनाने को तैयार है और गुजरात में जो कुछ हुआ उसे भाजपा का मुस्लिम विरोध नहीं कहा जा सकता. यह एक अलग बात है कि कलाम एक हिंदू दीखते मुसलमान थे. उन्हें देखकर मुझे बचपन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से सुनी यह बात याद आ गई कि मुसलमान ‘मोहमडन हिंदू’ के रूप में उन्हें स्वीकार्य हैं.

कोविंद का नाम उस समय प्रस्तावित किया गया है जब देश में दलित क्षोभ अलग-अलग रूप में जाहिर हो रहा है. इसका कारण खासकर पिछले तीन सालों में दलितों पर बढ़े हमले हैं. रोहित वेमुला के मामले में सत्ता में बैठे लोगों ने अपनी पूरी ताकत यह साबित करने में लगा दी कि रोहित वेमुला दलित थे ही नहीं. उसके बाद दलितों पर आक्रमण की घटनाएं बढ़ती चली गई हैं. और सरकार के मुखिया की प्रतिक्रिया इस पर क्या थी - दलितों को न मारो, भले मुझे मार लो!

कोविंद या उन जैसे किसी दलित का नाम आ सकता है, यह कयास पहले से लगाया जा ही रहा था. यह फिर एक चुस्त चाल है: आप भाजपा को दलित विरोधी कैसे कह सकते हैं जब वह एक दलित का नाम देश के सर्वोच्च पद के लिए प्रस्तावित कर रही हो! आखिर फली नरीमन जैसे संविधान के जानकार ने भी इसके लिए सरकार को बधाई दे ही डाली और अकादमिक जगत के दलित मुद्दों के विशेषज्ञ भी यह कह रहे हैं कि इस कदम से भाजपा ने खुद को एक सर्वसमाज का दल साबित किया है और विरोधी दलों का यह मुद्दा निष्प्रभावी कर दिया है कि सरकार दलित विरोधी है.

विपक्ष ने इस पर प्रत्याशित प्रतिक्रिया ही दी, कोविंद के नाम के जवाब में मीरा कुमार का नाम प्रस्तावित करके. उसका यह कदम इसलिए भी विश्वसनीय नहीं क्योंकि शह और मात के खेल में वह पिछड़ गया है. अगर वह किसी इससे ज्यादा उपयुक्त नाम के साथ पहले ऐसा कर पाता तो बात कुछ और हो सकती थी. एक प्रतीकात्मक दलित का जवाब उसी तरह का एक और दलित, इसमें कुछ अश्लीलता है क्योंकि ऐसा लगता है कि लक्ष्य तो कुछ और है, दलित उपलक्ष्य मात्र है.

यहां विपक्ष एक बड़ा मौका चूक गया. वह संसदीय राजनीति के पहचाने हुए दांवपेंच में पड़ने से इनकार करते हुए यह कह सकता था कि राष्ट्रपति का पद उसके लिए संवैधानिक मूल्यों की रक्षा से जुड़ा हुआ है और वह इसे सामाजिक न्याय के प्रतीकों के खेल में शेष नहीं करना चाहता. गोपाल कृष्ण गांधी का नाम इसीलिए उपयुक्त था कि अपनी उदार वाम छवि के बावजूद उन्होंने बंगाल का राज्यपाल रहते हुए सिंगूर और नंदीग्राम की राज्य समर्थित हिंसा की आलोचना की थी और वाम मोर्चा सरकार को संवैधानिक आदर्शों की याद दिलाई थी. लेकिन सुना जाता है कि खुद उन्होंने एक दलित का नाम प्रस्तावित करने का सुझाव दिया. इससे सिर्फ यह पता चलता है कि रणनीति ही अब आदर्श या मूल्य का भ्रम देने लगी है और अच्छे खासे लोग भी इसके झांसे में आ सकते हैं.

भारत खुद को आदर्शों का देश कहता रहा है लेकिन आदर्श का पक्ष लेना यहां अब दुस्साहस या मूर्खता से ज्यादा कुछ नहीं है. इस समय भारत को उन देशों की ओर देखने की ज़रूरत है जिनकी संस्कृति को पाश्चात्य कहकर उन्हें हीन ठहराने की उसे आदत पड़ चुकी है. हाल में ब्रिटेन में हुए चुनाव में जेरेमी कोर्बिन ने न सिर्फ आर्थिक मसलों पर, बल्कि सामाजिक प्रश्नों पर भी वह रुख लिया जिसे इस समय दुस्साहसी कहा जाएगा. उनके पहले फ्रांस में मैक्रोन इमैनुअल ने भी स्पष्ट रूप से राष्ट्रवाद का विरोध किया था और जर्मनी में भी राज्य के नेतृत्व ने अलोकप्रियता का खतरा उठाकर शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोलने का ऐलान किया था.

ये राजनेता डरे नहीं, उन्होंने जनता को झांसा देने की कोशिश नहीं की, उनसे स्पष्ट रूप से आदर्शों के संघर्ष में अपना पक्ष चुनने को कहा. यह साहस भारत के राजनीतिक नेतृत्व में नहीं है, फिर भी वह जाने क्यों खुद को किसी कल्पित महान संस्कृति का वारिस बताता है.