पौने दो साल से राजस्थान सरकार के लिए संकट का सबब बना कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल आखिरकार एनकाउंटर में मारा गया. हत्या, अपहरण और जमीनों पर अवैध कब्जा करने सरीखे दर्जनों मामलों में वांछित आनंदपाल तीन सितंबर, 2015 को कोर्ट में पेशी के बाद अपने दो साथियों के साथ फरार हो गया था. पिछले 22 महीने में प्रदेश की पुलिस ने उसे पकडऩे के खूब प्रयास किए. उस पर पांच लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया. इस दौरान दो बार पुलिस का उससे आमना-सामना भी हुआ, लेकिन वह शातिराना ढंग से गच्चा देकर भाग निकला.

लेकिन इस बार पुलिस ने जो चक्रव्यूह रचा, उसे आनंदपाल भेद नहीं पाया. 12 जून को पुलिस को आनंदपाल के भाई रूपेंद्र पाल उर्फ विक्की की हरियाणा के सिरसा में छिपे होने की पुख्ता जानकारी मिली. 24 जून को जब यहां दबिश दी गई तो विक्की के साथ आनंदपाल का गुर्गा देवेंद्र उर्फ गट्टू भी पकड़ में आया. दोनों से सख्ती से पूछताछ हुई तो उन्होंने अपने आका की लोकेशन उगल दी. शीर्ष अधिकारियों ने पिछली गलतियों से सबक लेते हुए घेराबंदी करने तक ऑपरेशन को गोपनीय रखा. चारों तरफ से घिरने के बाद आनंदपाल ने एके-47 से खूब गोलियां दागीं. पर पुलिस की छह गोलियों ने उसको छलनी कर दिया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

असहज सवालों से मुक्ति

आनंदपाल की मुठभेड़ में मौत राज्य की वसुंधरा सरकार के लिए बड़ी राहत है. सबसे पहले कानून-व्यवस्था के लिहाज से बात करें तो सरकार जब भी इस क्षेत्र की उपलब्धियों का बखान करती, आनंदपाल का नाम उन पर कालिख पोत देता. हालत यह हो गई कि गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया आनंदपाल का नाम सुनते ही झल्ला जाते. एक बार तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि ‘आनंदपाल पर बोलते-बोलते मैं भी आनंदपाल हो गया हूं.’ पिछले छह-सात महीने से तो यह हालत हो गई थी कि कटारिया से जब भी यह सवाल पूछा जाता कि आनंदपाल कब तक पकड़ा जाएगा तो वे यहां तक कह देते थे कि वह मेरी जेब में तो बैठा नहीं है.

एनकाउंटर के बाद गुलाब चंद कटारिया की खीज खुशी में तब्दील हो गई है. अब वे न सिर्फ अपराधों में आई कमी के आंकड़ों का गुणगान कर पाएंगे, बल्कि इन्हें और बेहतर करने की दिशा में भी सोच पाएंगे. जानकारों के मुताबिक आनंदपाल का खात्मा करने में पुलिस को 22 महीने का समय तो लग गया, लेकिन उसे ढूंढऩे की प्रक्रिया में पुलिस ने उसके नेटवर्क को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया. आनंदपाल तक पहुंचने से पहले पुलिस उसे फरार करवाने में मदद करने, शरण देने, गाड़ियां उपलब्ध करवाने, पुलिसकर्मियों पर फायरिंग व हत्या करने, राजकार्य में बाधा डालने और उसके इशारे पर संगीन वारदातों को अंजाम देने के आरोप में 108 गिरफ्तारियां कर चुकी थी. इनमें से ज्यादातर अभी भी जेल में ही हैं. यानी गैंग का सरगना ही नहीं, उसके गुर्गे भी तितर-बितर हो चुके हैं.

राज्य के पुलिस महानिदेशक रहे डॉ ज्ञानप्रकाश पिलानिया की मानें तो यह किसी गैंगस्टर के खिलाफ राजस्थान के इतिहास की सबसे बड़ी और लंबी कार्रवाई है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे. वे कहते हैं, ‘राजस्थान में कई गैंगस्टर हुए हैं, लेकिन किसी को पकडऩे के लिए इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ी. इस संगठित कार्रवाई का फायदा यह हुआ कि आनंदपाल मारा जा चुका है और उसकी गैंग नेस्तनाबूद हो चुकी है. इसके फिर से खड़े होने की संभावना न के बराबर है. यह प्रदेश की सबसे बड़ी गैंग थी. इसके खात्मे से प्रदेश में गैंगवार जैसी घटनाओं पर लगाम लगेगी. आनंदपाल का हश्र देखकर बाकी गिरोह भी सबक लेंगे और अपराधों का ग्राफ निश्चित रूप से नीचे गिरेगा.’

सियासी राहत

सरकार के लिए आनंदपाल के एनकाउंटर सियासी तौर पर भी सुकून भरा है. विपक्ष आनंदपाल के फरार होने के बाद से ही सार्वजनिक निर्माण व परिवहन मंत्री यूनुस खान पर इसमें लिप्त होने के आरोप लगाता रहा है. खान न सिर्फ कैबिनेट के सबसे ताकतवर मंत्री हैं, बल्कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के भी करीबी हैं. ऐसे में उन पर आरोप लगने पर सरकार का अहसज होना स्वाभाविक था. इस लिहाज से देखें तो आनंदपाल का अंत सरकार और यूनुस खान, दोनों के लिए राहत भरा है. खान कहते हैं, ‘एनकाउंटर से साबित हो गया है कि विपक्ष ने मेरे ऊपर जो आरोप लगाए वे बेबुनियाद थे. यदि आनंदपाल को मेरा संरक्षण होता तो उसे पकडऩे के लिए सरकार 11 आईपीएस और 100 पुलिसकर्मी क्यों लगाती और उसका एनकाउंटर क्यों होता?’

हालांकि यूनुस खान के खिलाफ सबसे ज्यादा मुखर रहने वाले निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल अभी भी हमलावर हैं. वे कहते हैं, ‘सरकार ने अपनी खाल बचाने के लिए एनकाउंटर किया है. वह जिंदा पकड़ा जाता तो सारे राज उगल देता. यह जगजाहिर है कि यूनुस खान जेल में आनंदपाल से मिले थे और उनकी मदद से ही वह फरार हुआ. यदि आनंदपाल के फरार होने की सीबीआई जांच होती तो यूनुस खान से उसके रिश्तों का पता चल जाता. इसीलिए सरकार ने इसकी सीबीआई जांच नहीं करवाई.’ वे आगे कहते हैं, ‘एनकाउंटर के बाद यह साबित हो गया है कि आनंदपाल राजस्थान में ही छिपा हुआ था. किसी राजनैतिक संरक्षण के बिना इतने दिन तक छिपे रहना कैसे भी संभव नहीं है.’

हालांकि राज्य सरकार ऐसे आरोपों को महज राजनीति बता रही है. ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री राजेंद्र राठौड़ इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, ‘कुछ लोग 2006 से इस प्रकार के आरोप लगाकर ही राजनीति कर रहे हैं. आनंदपाल हमारी नजर में एक अपराधी था जो अपने अंजाम तक पहुंच चुका है.’

जातीय समीकरण

वसुंधरा राजे सरकार को आनंदपाल के एनकाउंटर से तीसरा फायदा जातीय समीकरण सधने का है. दरअसल, आनंदपाल राजपूत जाति का था. उसने जिनके खिलाफ वारदातों को अंजाम दिया उनमें जाट समुदाय के लोग सबसे ज्यादा होते थे. इससे उसकी ‘एंटी जाट’ छवि बन गई. 2006 के चर्चित गोदारा हत्याकांड के बाद क्षेत्र के जाटों ने लंबा आंदोलन किया. यह सिलसिला 2012 में आनंदपाल की गिरफ्तारी के बाद थमा. 22 महीने पहले जब आनंदपाल फरार हुआ तो यह क्रम फिर से शुरू हो गया. एनकाउंटर के बाद इस पर विराम लगना तय है. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एनकाउंटर की खबर सामने आते ही शेखावाटी के कई गांवों में जश्न मनाया गया.

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले जाट समुदाय की नाराजगी दूर होना भाजपा के लिए मुफीद है. जाटों को परंपरागत रूप से कांग्रेस समर्थक माना जाता है और राजपूतों को भाजपा का वोट बैंक, लेकिन वसुंधरा राजे के खुद को ‘जाटों की बहू’ के तौर पर प्रचारित करने के बाद जाटों ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिए. पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहते हैं, ‘हमने जाटों को बड़ी मशक्कत के बाद भाजपा से जोड़ा है. हम उन्हें किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते.’

सब कुछ राहत भरा ही नहीं

आनंदपाल के एनकाउंटर से सरकार के लिए राहतों की इस फेहरिस्त के बीच एक आफत भी है. राजपूत संगठनों ने एनकाउंटर पर सवाल उठाते हुए सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया है. राष्ट्रीय करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी ने एनकाउंटर को साजिश बताते हुए इसकी सीबीआई जांच की मांग की है. वे कहते हैं, ‘आनंदपाल को लेकर सरकार और पुलिस के रूख को देखकर पहले से ही लग रहा था कि एनकाउंटर होगा. सरकार ने समाज विशेष को खुश करने के लिए आनंदपाल को बलि का बकरा बनाया है. यदि आनंदपाल जिंदा पकड़ा जाता तो सरकार के कई चेहरे बेनकाब होते. यह एनकाउंटर नहीं, हत्या है.’ वे अब इस एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. सुखदेव सिंह कहते हैं, ‘हमने इस मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया है. यदि सरकार ने इसे नहीं मांगा तो पूरे राजस्थान में उग्र आंदोलन करेंगे.’

इस बीच आनंदपाल के परिवार ने भी एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग की है. उन्होंने जांच के आदेश नहीं होने तक शव लेने से इंकार कर दिया है. आनंदपाल की बहन एनकाउंटर को बड़ी साजिश बता रही हैं. वे कहती हैं, ‘हमने और हमारे वकील ने कई बार कहा कि यदि सरकार सुरक्षा की गारंटी दे तो आनंदपाल समर्पण करने को तैयार है. जिस व्यक्ति पर जेल में कातिलाना हमला हो जाए और पुलिस जिसका एनकाउंटर करने के लिए तैयार बैठी हो, वह भागेगा नहीं तो और क्या करेगा?’ वे आगे जोड़ती हैं, ‘यह एनकाउंटर नहीं, हत्या है. सीबीआई जांच में ही यह सामने आएगा कि किसके इशारे पर हत्या हुई. जब तक जांच के आदेश नहीं होंगे हम शव नहीं लेंगे.’

राजपूतों का यह रुख सरकार के सामने संकट खड़ा कर सकता है, क्योंकि इसका अंजाम जाट-राजपूत टकराव के रूप में सामने आ सकता है. यदि ऐसा होता है तो यह न सिर्फ राजस्थान के सामाजिक सौहार्द्र पर बुरा असर डालेगा, बल्कि भाजपा को सियासी तौर पर इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. लगता है कि सरकार को भी इसका अंदाजा है. इसलिए पार्टी के कई नेता अब क्षेत्र के राजपूत और जाट समुदाय के प्रभावशाली लोगों से संपर्क साध रहे हैं.