हाल ही में कलकत्ता उच्च न्यायालय से रिटायर हुए जस्टिस सीएस कर्णन के नाम कई अजीबोगरीब रिकॉर्ड दर्ज हो चुके हैं. वे ऐसे पहले जज हैं जिन्हें पद पर रहते हुए छह महीने की जेल की सजा सुनाई गई. जस्टिस कर्णन ऐसे भी पहले जज हैं जो पद पर रहते हुए लगभग सात हफ़्तों तक फरार रहे और ऐसे भी पहले जज जो फरार रहते हुए ही रिटायर हो गए. काफी समय तक फरार रहने के बाद जब अंततः जस्टिस कर्णन को गिरफ्तार किया गया तो उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में जमानत की अर्जी लगाई. न्यायालय ने जब उनकी इस अर्जी को ठुकरा दिया तो उनके कुछ समर्थक इसे जातिवादी फैसला करार दे रहे हैं.

यह पहली बार नहीं है जब जस्टिस कर्णन के मामले को जातिवादी रंग देने की कोशिश की जा रही है. वे जब-जब विवादों में घिरे हैं, उन्होंने खुद अपने दलित होने को ही अपना सबसे बड़ा बचाव समझा है. जस्टिस कर्णन ने अपने पूरे कार्यकाल में न्याय व्यवस्था के साथ कई खिलवाड़ किये, न्यायपालिका की गरिमा को गिराया और एक न्यायाधीश होने की सारी हदों को पार किया. लेकिन जब भी उनसे वरिष्ठ न्यायाधीशों या सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी गलतियों पर उंगली उठाई तो उन्होंने अपने दलित होने को ब्रह्मास्त्र की तरह से इस्तेमाल करने की कोशिश की.

उन्होंने अपने पूरे करियर के दौरान जातिगत भेदभाव को कई बार मुद्दा बनाया लेकिन उनका एक फैसला भी ऐसा नहीं मिलता जिसमें उन्होंने जातिगत भेदभाव को कम करने के लिए कोई निर्णायक कदम उठाया हो.  

जस्टिस कर्णन के विवादास्पद अतीत पर चर्चा करने से पहले उन तर्कों पर चर्चा करते हैं जो उनके समर्थक उनकी जमानत याचिका के ठुकराए जाने पर दे रहे हैं. इन समर्थकों का कहना है कि जस्टिस कर्णन की याचिका पर सुनवाई करने वाले जज वे थे जिनके खिलाफ जस्टिस कर्णन पहले ही शिकायत दर्ज कर चुके हैं. लिहाजा इन जजों ने दुर्भावना के चलते जस्टिस कर्णन की याचिका ठुकराई है. यह तर्क इसलिए पूरी तरह निराधार हो जाता है कि जस्टिस कर्णन तो लगभग सभी जजों के खिलाफ शिकायत या भेदभाव के आरोप लगा चुके हैं. अपने एक पत्र में उन्होंने 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं, सर्वोच्च न्यायालय के सात जजों को वे कारावास की सजा सुना चुके हैं और कई जजों पर वे पहले ही जातिगत भेदभाव के आरोप मढ़ चुके हैं.

अब बात करते हैं जस्टिस कर्णन के अतीत की. उन्होंने अपने पूरे कैरियर के दौरान जातिगत भेदभाव को कई बार मुद्दा बनाया लेकिन ढूंढ कर भी उनका एक फैसला भी ऐसा नहीं मिलता जिसमें उन्होंने जातिगत भेदभाव को कम करने के लिए कोई निर्णायक कदम उठाया हो. खोज कर भी उनका लिखाया कोई ऐसा फैसला नहीं मिलता जिसे ‘प्रगतिशील’ कहा जा सके.

जस्टिस कर्णन साल 2009 में जज बने. जिस मद्रास हाई कोर्ट में वे जज नियुक्त हुए वहां के वकीलों तक ने इससे पहले उनका कभी नाम नहीं सुना था. उनके साथ जो अन्य लोग नियुक्त हुए, वे भी उन्हें नहीं जानते थे. बताया जाता है कि उनकी नियुक्ति का एकमात्र कारण उनकी तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया केजी बालकृष्णन के भाई से नजदीकियां थीं. 2009 से 2011 तक जस्टिस कर्णन अस्थायी जज रहे और इस दौरान उन्होंने कोई बवाल नहीं किया क्योंकि अस्थायी जज को आसानी से हटाया जा सकता था. लेकिन 2011 में जैसे ही वे स्थायी जज बन गए, उनसे जुड़े विवादों का सिलसिला भी शुरू हो गया.

स्थायी जज बनने के कुछ ही समय बाद जस्टिस कर्णन ने अपने एक साथी जज पर जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए. लेकिन इन आरोपों के लिए उन्होंने न्यायालय में शिकायत नहीं की, न ही अपने मुख्य न्यायाधीश से आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की ही मांग की. उन्होंने एक प्रेस वार्ता बुलाकर ये आरोप लगाए जिसका नतीजा उन्हें सस्ती लोकप्रियता मिलने से ज्यादा कुछ नहीं हुआ. इसके बाद से वे लगातार विवादों में बने ही रहे.

उन्होंने देश के एक उच्च न्यायालय को ‘शिवा का इंसाफ’ सरीखी अदालत में बदल दिया. अपने ही कई मामलों में वे शिकायतकर्ता भी खुद थे, गवाह भी खुद, वकील भी खुद और जज भी खुद

साल 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय की एक पीठ जजों की नियुक्ति से संबंधित एक याचिका की सुनवाई कर रही थी. जस्टिस कर्णन सुनवाई के बीच में ही इस अदालत में दाखिल हो गए और एक जज होते हुए भी उन्होंने स्वयं को इस मामले में पार्टी बनाए जाने की मांग रख दी. इसी साल जस्टिस कर्णन ने मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर भी जातिगत भेदभाव के आरोप लगा दिए. इस दौरान जस्टिस कर्णन पर भी अपने साथी जजों को धमकाने और उनसे दुर्व्यवहार करने के आरोप लगते रहे. उनके साथ के 21 जजों ने, जिनमें कुछ दलित भी थे, तब देश के मुख्य न्यायाधीश को लिखित में जस्टिस कर्णन की एक शिकायत भेजी थी.

साल 2016 में जस्टिस कर्णन के विवादों का सिलसिला और भी बढ़ा. इसके बाद देश के मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें मद्रास से कलकत्ता उच्च न्यायालय ट्रांसफर किये जाने के आदेश दे दिए. लेकिन जस्टिस कर्णन ने अपने इस ट्रांसफर आदेश पर खुद ही रोक लगा दी. जब सर्वोच्च न्यायालय ने उनके द्वारा लगाई गई रोक को हटाने का फैसला दिया तो जस्टिस कर्णन ने सर्वोच्च न्यायालय के उन जजों के खिलाफ भी जातिगत भेदभाव के आरोप मढ़ दिए जिन्होंने यह फैसला दिया था.

इस दौर में जस्टिस टीएस ठाकुर देश के मुख्य न्यायाधीश हुआ करते थे. उन्होंने जस्टिस कर्णन की हरकतों को देखते हुए जब उन्हें समन भेजे तो जस्टिस कर्णन ने अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी और कहा कि ‘हताशा के कारण वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे थे.’ इसके साथ ही उन्होंने अपना ट्रांसफर आदेश स्वीकार कर लिया और मद्रास से कलकत्ता उच्च न्यायालय आ गए.

लेकिन उनके साथ जुड़े विवाद इसके बाद भी जारी ही रहे, बल्कि और भी बढ़ते चले गए. अब उन्होंने देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को खुला पत्र लिखते हुए कुल 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए. इसी के चलते उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज हुआ जिसकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में सात जजों की एक संवैधानिक पीठ कर रही थी. इस मामले के शुरू होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्णन के न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों पर भी रोक लगा दी थी.

कुछ समय पहले ही जस्टिस कर्णन ने खुद कहा था कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है लेकिन न्यायालय के आदेश के बाद भी वे अपनी जांच के लिए तैयार नहीं हुए  

इसके बाद जस्टिस कर्णन ने अपने मामले की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ के सातों जजों के खिलाफ जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए और इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय के सातों जजों को अपने सामने पेश होने के आदेश जारी कर दिए. हर सामान्य समझ का व्यक्ति, जिसे कानून की तकनीकियों का ज्ञान न भी हो, यह जानता है कि अपने ही मामले में कोई जज नहीं हो सकता. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत की एक ज़रूरी शर्त है. लेकिन जस्टिस कर्णन ने इस सिद्धांत को भी धता बताते हुए न जाने कितने ही फैसले दिए. उन्होंने देश के एक उच्च न्यायालय को ‘शिवा का इंसाफ’ सरीखी अदालत में बदल दिया. अपने ही कई मामलों में वे शिकायतकर्ता भी खुद थे, गवाह भी खुद, वकील भी खुद और जज भी खुद. ऐसे ही फैसले देते हुए उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की विदेश यात्राओं पर रोक लगाने का फैसला दिया तो कभी उन्हें पांच साल की सजा सुना दी.

संवैधानिक पीठ ने जस्टिस कर्णन की मानसिक स्थिति की जांच के भी आदेश दिए थे लेकिन उन्होंने अपनी जांच करवाने से इंकार कर दिया. कुछ समय पहले ही जस्टिस कर्णन ने खुद कहा था कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है लेकिन न्यायालय के आदेश के बाद भी वे अपनी जांच के लिए तैयार नहीं हुए. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें उनके व्यवहार के चलते न्यायालय की अवमानना का दोषी माना और छह महीने की सजा सुना दी.

अपने दलित होने का जस्टिस कर्णन ने जिस तरह से इस्तेमाल किया, वह सबसे ज्यादा निंदनीय है. उन्होंने हर उस जज के खिलाफ जातिगत भेदभाव के आरोप लगा दिए, जिसने उनके अजीबोगरीब फैसलों को पलटने की कोशिश की. ऐसा करके उन्होंने न सिर्फ दलितों के उत्पीड़न के लिए बनाए गए कानूनों का दुरुपयोग किया बल्कि दलितों की असल लड़ाई को भी कमज़ोर करने का काम किया. उनकी हरकतें ऐसे तमाम लोगों के लिए हथियार बन गई जो दलितों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों को कुंद करने की पैरवी करते रहे हैं.

जहां तक उनके द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों का सवाल है, उस पर भी उन्होंने तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं किया. पहले तो उन्होंने ये आरोप लगाए ही तब जब फटकार खाकर मजबूरन उन्हें मद्रास से कलकत्ता जाना पड़ा था. उनका ये ट्रांसफर एक दंडात्मक कार्रवाई के तहत तब हुआ था जब मद्रास हाई कोर्ट के 21 जजों ने उनके खिलाफ लिखित शिकायत की थी. स्थापित व्यवस्था है कि आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी (बर्डन ऑफ़ प्रूफ) शिकायतकर्ता की होती है, बचाव पक्ष की नहीं. यानी जस्टिस कर्णन ने अगर 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे तो उन्हें ही ये आरोप कोर्ट में साबित भी करने थे. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बुलाकर पूछा भी कि क्या वे अपने द्वारा लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए तैयार हैं? लेकिन जस्टिस कर्णन ने ऐसा करने की हामी नहीं भरी. उल्टा इन सभी जजों पर केस ठोक दिया कि वे एक दलित जज को परेशान कर रहे हैं.

हाई कोर्ट का जज अपने-आप में एक कोर्ट होता है. लेकिन जस्टिस कर्णन नाम की इस कोर्ट ने पूरी न्याय व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया था. इसलिए जानकार मानते हैं कि उनके खिलाफ कार्रवाई होना बेहद जरूरी था  

हाई कोर्ट का जज अपने-आप में एक कोर्ट होता है. लेकिन जस्टिस कर्णन नाम की इस कोर्ट ने पूरी न्याय व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया था. इसलिए जानकार मानते हैं कि उनके खिलाफ कार्रवाई होना बेहद जरूरी था. हां, इसे लेकर सवाल जरूर हो सकते हैं कि क्या यह कार्रवाई उसी तरह होनी चाहिए थी जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने की है. फिलहाल, मौजूदा कानून में हाई कोर्ट के किसी जज को महाभियोग के अलावा और किसी तरह से हटाया नहीं जा सकता. लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि आज तक देश के इतिहास में ये कभी किसी जज के खिलाफ पूरी नहीं हो सकी है. इसलिए जब भी हाई कोर्ट के किसी जज के खिलाफ शिकायतें आती हैं तो उन्हें दंडित करने के नाम पर सिर्फ उनका ट्रांसफर कर दिया जाता है. जस्टिस कर्णन को यह दंड भी दिया जा चुका था लेकिन उनकी हरकतों पर इसके बाद भी लगाम नहीं लगी थी.

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन पर लगाम लगाने का यह अभूतपूर्व तरीका निकला और उन्हें न्यायालय की अवमानना के आरोप में छह महीने की जेल सुना दी. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पास और क्या विकल्प हो सकते थे, इस पर जरूर चर्चा हो सकती है. कानून के कई जानकारों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय को उन्हें जेल भेजने की जगह उनसे उनके न्यायिक अधिकार छीन लेने चाहिए थे और उन्हें ऐसे ही रिटायर होने देना चाहिए था.

एक वर्ग के मुताबिक इस पर भी चर्चा होनी ही चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को जस्टिस कर्णन के बयान छापने से क्यों रोका. क्यों जब बात खुद उस पर आती है तो सुप्रीम कोर्ट हर बार ऐसा ही करता है. ऐसा ही तब भी हुआ था जब एक जज पर शारीरिक शोषण के आरोप लगे थे और कोर्ट ने उस जज का नाम छापने पर रोक लगा दी थी.

जानकारों के मुताबिक जस्टिस कर्णन मामले में यही पहलू हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए और इसे दलित विमर्श से जोड़ना ठीक नहीं है. जस्टिस कर्णन ने लगातार जातिगत भेदभाव के झूठे आरोप लगाकर दलितों की लड़ाई को कमज़ोर करने के अलावा कुछ नहीं किया है. अपनी अजीबोगरीब हरकतों के अलावा अगर जस्टिस कर्णन इतिहास में किसी कारण याद किये जाएंगे, तो वह कारण दलितों की लड़ाई को कमज़ोर करना ही होगा.