‘गोरक्षा के नाम पर क्या किसी को मारने का हक मिल जाता है? हमारी धरती अहिंसा की धरती है. हमारी धरती महात्मा गांधी की जन्मभूमि है, हम यह कैसे भूल सकते हैं?’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें गुरुवार को गुजरात में साबरमती आश्रम के शताब्दी समारोह में कहीं. एक साल में यह दूसरी बार है जब प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक मंच से गोरक्षा के नाम पर की जा रही हिंसा की निंदा की है. इससे पहले अगस्त, 2016 में उन्होंने कहा था, ‘इस बात से मुझे गुस्सा आता है कि कुछ लोग गोरक्षा के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं. ये लोग रात में समाज-विरोधी काम करते हैं और फिर दिन में गोरक्षक बन जाते हैं.’ प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से फर्जी गोरक्षकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपील भी की थी.
लेकिन लगता है कि उनकी बातों का राज्य सरकारों और कथित गोरक्षकों पर कोई असर नहीं हुआ. बीते कुछ महीनों के दौरान ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब गोरक्षा के नाम पर लोगों की हत्या हुई या फिर उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा गया. जिस दिन प्रधानमंत्री साबरमती आश्रम में यह बोल रहे थे उसी दिन झारखंड के रामगढ़ में गुस्साई भीड़ ने अलीमुद्दीन नाम के एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी. भीड़ में शामिल लोगों का मानना था कि उनकी कार में गोमांस रखा हुआ था. इससे पहले अप्रैल में राजस्थान के अलवर में कथित गोरक्षकों ने गायें ले जा रहे पहलू खान की हत्या कर दी थी. इसी मंगलवार को झारखंड के गिरीडीह में डेरी चलाने वाले मोहम्मद उस्मान के घर के आगे मरी हुई गाय पाए जाने पर करीब 1000 लोगों की भीड़ ने उनकी बुरी तरह पिटाई की. ये दोनों ही डेयरी किसान थे.
इन घटनाओं में खास बात यह भी है कि गोरक्षा के नाम पर की जा रही हिंसा का शिकार बनने वालों में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती दिखती है. इसके मुताबिक 2010 से 2017 के दौरान गोरक्षा के नाम पर देशभर में 63 घटनाएं हुई हैं जिनमें 28 लोगों की हत्याएं हुई हैं. इनमें से 24 मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते थे जबकि पांच दलित और तीन हिंदू या सिख समुदाय से थे. इसके अलावा इन घटनाओं में 124 लोगों के घायल होने की भी बात सामने आई है. बीते आठ वर्षों के दौरान अंग्रेजी मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा की कुल 63 में से 32 घटनाओं में मुसलमानों को निशाना बनाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक इन घटनाओं में से 52 फीसदी अफवाहों के कारण हुई थीं.
आलोचकों का मानना है कि 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान इस तरह की घटनाओं में काफी तेजी आई है. इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट भी इसकी पुष्टि करती दिखती है. इसके मुताबिक पिछले सात साल के दौरान ऐसे कुल मामलों में से 97 फीसदी मोदी सरकार के शासन में ही सामने आए हैं. इस साल बीते वर्षों के मुकाबले इसमें काफी तेजी देखी गई है. 2017 में अभी तक गोरक्षा के नाम पर हिंसा की 20 घटनाएं सामने आई हैं. यह इस तरह की घटनाओं की दृष्टि से सबसे खराब माने जाने वाले 2016 में हुई कुल घटनाओं का 75 फीसदी है.
गोरक्षा के नाम पर हिंसा के मामलों में भी भाजपा शासित राज्य आगे दिखते हैं. पिछले आठ वर्षों के 63 में से 32 मामले इन्हीं राज्यों से जुड़े हैं. इसके अलावा देश के जिन राज्यों में इस तरह की सबसे ज्यादा घटनाएं सामने आई हैं, उनमें अधिकतर उत्तर भारत के राज्य हैं. पूर्वोत्तर में केवल भाजपा शासित असम में बीते 30 अप्रैल को दो लोगों की हत्या की बात सामने आई है.
बीते साल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फर्जी गोरक्षकों पर निशाना साधा था तो उसके बाद हिंदू महासभा और विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदूवादी और गोरक्षकों के समूहों ने इस पर ऐतराज जताया था. हिंदू महासभा ने तो प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफे की मांग करते हुए उन्हें सबक सिखाने की भी चेतावनी दी थी. माना जाता है कि इन संगठनों की आपत्ति के पीछे की वजह इनके सदस्यों का इन घटनाओं में शामिल होना है. इस पर इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट भी मुहर लगाती दिखती है. रिपोर्ट के मुताबिक हिंसा की जिन 63 घटनाओं की बात ऊपर की गई है उनमें से 23 में बजरंग दल, विहिप और स्थानीय गोरक्षकों संगठनों के सदस्य ही शामिल थे.
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