बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अपेक्षा की जा रही थी कि वे राष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को समर्थन देंगे. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार दलित समुदाय से आती हैं और बिहार से ही ताल्लुक रखती हैं. लेकिन नीतीश ने ऐसा करने के बजाय एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थनक दे दिया.

इस तरह उन्होंने एक तरह से रस्साकशी का खेल शुरू कर दिया है. यह खेल नीतीश और बिहार में उनकी अगुवाई वाले महागठबंधन के मुख्य सहयोगी लालू प्रसाद यादव के बीच है. बल्कि बीते हफ्ते तो नीतीश के ख़िलाफ कांग्रेस भी इस खेल में कूदती दिखी.

दोनों तरफ से तीखे और चेतावनी भरे लहज़े में दिए गए बयानों के बाद यह खेल फिलहाल रुका हुआ नज़र आता है. जिस तरह की परिस्थितियां हैं उन्हें देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि नीतीश सरकार को हाल-फिलहाल कोई ख़तरा नहीं होगा. इसके बावज़ूद कुछ सवाल अनुत्तरित बने हुए हैं. जैसे कि क्या अब इस घटनाक्रम के बाद नीतीश फिर से विपक्ष में अपनी विश्वसनीय हैसियत हासिल कर पाएंगे? उन्हें 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह गै़र-भाजपाई विपक्ष के अहम चेहरे के तौर पर देखा जाने लगा था. क्या वे उस स्थिति को फिर पा सकेंगे? इन्हीं सवालों से जुड़ी संभावनाओं पर नज़र डालते हैं.

नीतीश ने बिहार विधानसभा चुनाव में ग़ैर-भाजपाई महागठबंधन का नेतृत्व किया था. इसमें लालू प्रसाद यादव की पार्टी- राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस भी थी. तीनों पार्टियों की एकता और नीतीश के चेहरे के भरोसे इस महागठबंधन ने बिहार में सरकार बनाई. तब कहा जाने लगा था कि नीतीश या उनके जैसे स्वीकार्य चेहरे को आगे कर विपक्ष 2019 में महागठबंधन का प्रयोग दोहराता है तो वह नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकता है. ऐसे में ज़ाहिर है नीतीश के मन में भी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं कुलांचे मारने लगी थीं क्योंकि वे प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार माने जा रहे थे.

लेकिन इसके बाद राजनीतिक हालात तेजी से बदले. आज स्थिति यह है कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन जैसा प्रयोग तो है लेकिन उसमें नीतीश कुमार ही नहीं हैं. बल्कि नीतीश को तो अब विपक्षी पार्टियां भरोसे का साथी भी शायद ही मानती हैं. इसके उलट उनके बारे में यह धारणा मज़बूत हो रही है कि उनका दुराव व्यक्तिगत रूप से सिर्फ नरेंद्र मोदी से था या शायद थोड़ा अब भी है. बाकी तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के हिंदुत्व एजेंडे से भी उन्हें संभवत: कोई दिक्कत नहीं है.

एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष लेकिन तीखे हमले

नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल- यूनाइटेड (जद-यू) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने मंगलवार को अपने गठबंधन की पुरानी सहयोगी भाजपा को याद किया. उन्होंने कहा, ‘भाजपा ने हमें कभी किसी मौके पर असहज़ महसूस नहीं होने दिया.’ जद-यू ने यह बयान ज़ारी कर एक तरह से मौज़ूदा सहयोगी राजद का मुंह बंद करने की कोशिश की. लेकिन जानकारों के मुताबिक उसने वैचारिक मोर्चे पर अपना पक्ष कमजोर किया. एक तरफ तो उसने उस पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन किया जिसके ख़िलाफ वह वैचारिक लड़ाई का बिगुल फूंक रही है और दूसरी तरफ इसका विरोध करने वालों को वह चुप करा रही है.

नीतीश ने जब कोविंद को समर्थन देने का ऐलान किया तो राजद के कई नेताओं ने उनके ख़िलाफ बयानबाज़ी की थी. राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने तो नीतीश के इस फैसले को ‘ऐतिहासिक ग़लती’ बता दिया था. जबकि उनके पुत्र और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इसे ‘राजनीतिक अवसरवाद’ क़रार दिया था. यहां तक कि कांग्रेस के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद भी हमला करने से नहीं चूके. उन्होंने कहा, ‘जो लोग एक सिद्धांत में भरोसा करते हैं, वे सिर्फ एक फैसला लेते हैं. जिन्हें कई सिद्धांतों में भरोसा है वे कई तरह के फैसले लेते हैं.’ आजाद ने कहा, ‘वे (नीतीश) पहले ऐसे शख्स थे, जिन्होंने बिहार की बेटी को हराने का फैसला किया, हम नहीं.’ इससे पहले नीतीश कुमार का बयान आया था कि विपक्ष ने बिहार की दलित बेटी मीरा कुमार को हराने के लिए मैदान में उतारा है. आजाद के बयान के बाद ही केसी त्यागी का बयान आया था.

हालांकि इसी बीच जब यह लगने लगा कि बिहार में महागठबंधन की गाठें ढीली पड़ रही हैं तो लालू और नीतीश ने फिर सुलह कर ली. जल्द ही दोनों दलों के प्रवक्ताओं की ओर से बयान ज़ारी कराए गए. इनके ज़रिए यह संकेत दिया गया कि बिहार के सत्ताधारी महागठबंधन में सब ठीक है. इस सुलह-सफाई से निकला संदेश साफ था कि अगर गठबंधन टूटने से राजद के हाथ से सत्ता छूटेगी तो जद-यू को भी नुकसान बराबर का होगा. वह एक अनिश्चित राजनीतिक ज़मीन पर आकर खड़ा हो जाएगा. क्योंकि निश्चित रूप से इस बार जद-यू अगर भाजपा की तरफ रुख़ करेगा तो हालात पहले की तरह नहीं होंगे.

नीतीश ने जून-2013 में जब भाजपा और एनडीए का 17 साल पुराना साथ छोड़ा तब उनका हाथ ऊपर था लेकिन अब उन्हें तेवर नरम करने होंगे. वे भाजपा के साथ मिलकर अपनी सरकार तो बचा लेंगे, लेकिन प्रतिष्ठा शायद ही बचा पाएं. और फिर यह भी तय नहीं है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की लहर पर सवार भाजपा कब तक बिहार में जद-यू के पीछे चलने को राज़ी होगी. जद-यू के नेता भी अनौपचारिक बातचीत में मानते हैं कि अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा अब पुरानी वाली पार्टी नहीं रही. वह पहले से ज़्यादा महत्वाकांक्षी और आक्रामक है.

ऐसे में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा बिहार में जद-यू और राजद का गठबंधन टूटने की स्थिति को अपने लिए अवसर माने और सत्ता हासिल करने के लिए मध्यावधि चुनाव की ज़मीन तैयार करने में लग जाए. बंटे हुए विपक्ष से भाजपा को लाभ मिलने की संभावना भी पूरी तरह ख़ारिज नहीं की जा सकती.

लेकिन विश्वसनीयता का संकट तो है ही?

तो कुल मिलाकर अभी स्थिति यह है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से पार जाकर नीतीश द्वारा रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के बावज़ूद उनकी सरकार को संकट नहीं है. लेकिन उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं पर चोट ज़रूर पहुंची है. उनकी विश्वसनीयता पर भी संकट आ खड़ा हुआ है. आख़िरकार राष्ट्रपति चुनाव के लिए जब विपक्ष ने संयुक्त उम्मीदवार उतारने की पहल शुरू की थी तो नीतीश उसमें सबसे अहम और अग्रणी क़िरदार जो थे. लेकिन अब नीतीश ने रामनाथ कोविंद का समर्थन कर विपक्ष को साफ संकेत दे दिया है कि उसकी एकता सत्तापक्ष की तुरुप चाल के आगे कभी भी ढेर हो सकती है. और साथ में यह भी कि नरेंद्र मोदी से मतभेद होने के बावज़ूद उन्हें आरएसएस से कोई दिक्कत नहीं है.

अपने सहयोगियों को चौंकाना नीतीश कुमार की राजनीति की मुख्य ताक़त है. जब वे एनडीए में थे तब भी उन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर सबको चौंकाया था. लेकिन नीतीश को समझना होगा कि वक़्त अब बदल चुका है. अनिश्चितता के माहौल में अब राजनीति में भी भरोसे की अहमियत बढ़ती जा रही है.