राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का प्रचार अभियान शुरू हो गया है. चार जुलाई को उन्होंने तेलंगाना से अपने अभियान की शुरुआत की. अब तक देश की करीब 30 छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां उन्हें अपना समर्थन दे चुकी हैं.

जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह घोषणा की कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद होंगे तो हर ओर से यही सवाल आने लगा कि ये कौन हैं! जिस वक्त उनकी उम्मीदवारी की घोषणा अमित शाह ने की, उस वक्त वे बिहार के राज्यपाल थे. रामनाथ कोविंद के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए पार्टी को बाकायदा अभियान ही चलाना पड़ा. इसके लिए उनका एक प्रोफाइल तक पार्टी की ओर से जारी किया गया.

लेकिन इस सबके बीच राजनीति जानने-समझने वाले लोगों के लिए यह पहेली बना रहा कि आखिर रामनाथ कोविंद का नाम तय कैसे हुआ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी आखिर इस नाम तक पहुंची कैसे? इस सवाल में जाने से पहले भाजपा की आंतरिक राजनीति में रामनाथ कोविंद कहां रहे हैं, इसे जान लेना जरूरी है.

रामनाथ कोविंद भाजपा में 1991 में आए. वे पार्टी की ओर से एक लोकसभा चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए. 1994 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. 2006 तक वे राज्यसभा में रहे. अपने राज्यसभा के कार्यकाल के दौरान ही वे भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष बने. भाजपा को समझने वाले लोग जानते हैं कि पार्टी पदाधिकारियों में यह कोई बेहद अहम पद नहीं है.

इसके बाद उन्हें पार्टी में पद तब मिला जब नितिन गडकरी अध्यक्ष बने. गडकरी की टीम में वे राष्ट्रीय प्रवक्ता थे. भाजपा पदाधिकारियों की सूची कोई अगर अक्सर देखता हो तो यह बात सामने आएगी कि हर टीम में अनुसूचित जाति के एक प्रवक्ता को रखा जाता है. इस नाते गडकरी की टीम में प्रवक्ताओं की सूची में कोविंद की मौजूदगी को भी कई लोग ऐसे ही देखते थे. जब गडकरी को बतौर अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल नहीं मिला और राजनाथ सिंह फिर से अध्यक्ष बन गए तो उन्होंने अपनी जो टीम घोषित की, उसमें कोविंद का नाम नहीं था. प्रवक्ताओं की सूची में कोविंद की जगह विजय सोनकर शास्त्री को उन्होंने शामिल कर लिया. शास्त्री भी अनुसूचित जाति से हैं.

पार्टी की राष्ट्रीय टीम से छुट्टी होने के बाद कोविंद को उत्तर प्रदेश भाजपा की टीम में जगह मिली. प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने उन्हें अपनी टीम में शामिल किया. उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का महासचिव बनाया गया. राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह भी प्रदेश महासचिव के पद पर थे. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पद कम से कम पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए तो नहीं है. लेकिन इसके बावजूद रामनाथ कोविंद यहां भी पदाधिकारियों की सूची में लंबे समय तक शामिल नहीं रह पाए.

अब यहीं से रामनाथ कोविंद के राजनीतिक सफर में एक अहम मोड़ आने की नींव पड़ने लगी. राजनाथ सिंह ने अपनी जो नई टीम बनाई उसमें अमित शाह को महासचिव बनाकर लाया गया. उन्हें उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी भी बना दिया गया. इसी बीच सितंबर, 2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. कुल मिलाकर देखा जाए तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दखल पार्टी के पूरे कामकाज में बहुत तेजी से बढ़ रहा था.

2014 के लोकसभा चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी अमित शाह पर थी. खुद नरेंद्र मोदी भी उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ना चाह रहे थे. ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति को लेकर कुछ अनुभवी और विश्वस्त लोगों से राय-सलाह करने की जरूरत मोदी और शाह की जोड़ी को थी. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के प्रति नरेंद्र मोदी का आदर रहा है और वे उत्तर प्रदेश के मामले में कल्याण सिंह के अनुभव और समझ का लाभ लेना चाह रहे थे.

कल्याण सिंह उस वक्त भाजपा में नहीं थे बल्कि एक निर्दलीय सांसद के तौर पर लोकसभा में थे. उन्हें पार्टी में वापस लाने की कोशिशें गडकरी के अध्यक्ष रहते राजनाथ सिंह ने की थीं. लेकिन कुछ मसलों को लेकर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पा रही थी. मोदी और शाह के आते ही ये मसले सुलझ गए और कल्याण सिंह मोदी के साथ मंच साझा करते हुए दिखने लगे. उस वक्त भाजपा में वे औपचारिक तौर पर वापस नहीं आ सकते थे. क्योंकि जैसे ही वे भाजपा में शामिल होते, उनकी सांसदी चली जाती. नियमों के मुताबिक निर्दलीय सांसद किसी पार्टी में शामिल नहीं हो सकता.

लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह के बेटे को पार्टी ने टिकट दिया. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में कुछ और सीटों पर टिकट बंटवारे को लेकर अमित शाह ने कल्याण सिंह की राय ली. कल्याण सिंह की सलाह पर ही अमित शाह ने 2014 लोकसभा चुनावों के दौरान कई सभाओं और कार्यक्रमों में कोविंद को अपने साथ रखा. 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद कल्याण सिंह को राजस्थान का राज्यपाल बना दिया गया.

रामनाथ कोविंद की कल्याण सिंह से बेहद नजदीकी रही है. कहा जाता है कि पार्टी में जब तक कल्याण सिंह थे, तब तक कोविंद की राजनीति ठीक चल रही थी. कल्याण सिंह के प्रभावी रहने के दौरान ही रामनाथ कोविंद पहला लोकसभा चुनाव लड़े. कहा जाता है कि कल्याण सिंह ने ही रामनाथ कोविंद को राज्यसभा भेजा. लेकिन जब कल्याण सिंह पार्टी से बाहर चले गए तो कोविंद का भी पार्टी के अंदर विकास रुक गया.

मोदी के प्रभावी होते कल्याण सिंह एक बार फिर से प्रभावी हो गए. ऐसे में जब बिहार में राज्यपाल बनाने की बात 2015 में आई तो इसकी भी एक राजनीति थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बाद नीतीश कुमार ने दलित जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था. लेकिन मांझी ने पद छोड़ने को लेकर काफी विवाद किया और एक तरह से नीतीश कुमार और उनकी पूरी पार्टी को एक होकर जबरन मांझी को हटाना पड़ा. इसके बाद मांझी भाजपा खेमे में आ गए.

उस वक्त बिहार चुनावों को लेकर अमित शाह एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे. किसी भी कीमत पर भाजपा बिहार चुनावों को जीतना चाहती थी. ऐसे में मांझी को हटाए जाने को ‘दलित अपमान’ का मुद्दा बनाने की कोशिश भाजपा ने की. कुछ लोगों की मानें तो इसे भुनाने के लिए ही कल्याण सिंह ने ही रामनाथ कोविंद का नाम बिहार के राज्यपाल के तौर पर सुझाया. बिहार में अपनी सभाओं में जिस तरह से नरेंद्र मोदी कोविंद का परिचय कराते थे, उससे यह बिल्कुल साफ हो गया था कि केंद्र सरकार ने उन्हें बिहार के दलित मतदाताओं को भाजपा के पाले में लाने के मकसद से राज्यपाल बनाया है.

कहा तो यह भी जा रहा है कि अब जब राष्ट्रपति बनाने की बारी आई तो कल्याण सिंह खुद इस पद पर आना चाह रहे थे. कल्याण सिंह के नातेदारों-रिश्तेदारों में इस बात की बड़ी चर्चा थी. इनमें से ही एक व्यक्ति एक पत्रिका निकालते हैं. इस पत्रिका में बाकायदा एक बड़ी स्टोरी की गई. इसका शीर्षक थाः कल्याण सिंह होंगे भारत के अगले राष्ट्रपति.

लेकिन कल्याण सिंह को राष्ट्रपति बनाने को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि उनका स्वास्थ्य लंबे समय से खराब चल रहा है. राज्यपाल के पद पर रहते हुए उतना सार्वजनिक जीवन नहीं होता जितना राष्ट्रपति पद पर रहते हुए होता है. दूसरी दिक्कत यह थी कि वे पिछड़े तो थे लेकिन दलित नहीं थे. तीसरी दिक्कत बाबरी विध्वंस को लेकर हालिया अदालती निर्णय को कहा जा सकता है. लेकिन अभी जिस तरह की राजनीति भाजपा कर रही है, उसमें तीसरी दिक्कत की कोई खास भूमिका दिखती नहीं.

ऐसे में कहा जा रहा है कि जब कल्याण सिंह को अपनी संभावना खत्म होती दिखी तो उन्होंने रामनाथ कोविंद का नाम नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सुझाया. कोविंद के नाम से गुजरात चुनाव से लेकर विपक्ष की राजनीति को ध्वस्त करने तक कितनी तरह के राजनीतिक फायदों की उम्मीद भाजपा को है, इस बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. ऐसे में कोविंद मोदी को हर तरह से उपयुक्त लगे और प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष की जोड़ी ने उन्हें देश का अगला राष्ट्रपति बनाने का निर्णय कर लिया.