चंद्रशेखर से मैंने पूछा था कि शाम को विज्ञान भवन में देने के लिए उनने क्या कोई भाषण तैयार किया है. वे बावजूद नहा लेने के बहुत थके हुए दिख और लग रहे थे. अभी उनने हमारे साथ भोजन किया था और हम सब चाहते थे कि वे घंटा-डेढ़ घंटा सो लें ताकि शाम को अमृत महोत्सव (वे उस दिन 75 वर्ष के हुए थे) में ठीक-ठाक रह सकें. हम जाने के लिए उठे तो उनने बिना स्पष्ट हुए इतना ही कहा कि अभी कुछ बनाया नहीं है. और लोगों ने भी कुछ तैयार नहीं किया है.

तो इतना तो साफ था कि शाम को चंद्रशेखर जो बोलेंगे वह उन्हें वहीं लगा या सूझा हुआ होगा. लेकिन, सत्रह अप्रैल को विज्ञान भवन में जो हुआ वह तो हमारी सभी उम्मीदों से परे था. देश की सांप्रदायिक हालत, गुजरात और अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पर उन्हें क्या डर लग रहा है, इसका थोड़ा बहुत अंदाजा मुझे था. लेकिन, चूंकि अटल जी आजकल शुरुआत किसने की यही बताने में लगे हुए हैं, इसीलिए कहना होगा कि विज्ञान भवन में शुरुआत उन्हीं ने की और अगर अमृत महोत्सव को वे अपना खुलासा करने के अवसर में नहीं बदलते तो उनकी वह धुलाई नहीं होती जो बाद में चंद्रशेखर ने की.

वह लोकसभा का सदन नहीं था और जैसा कि खुद अटल जी कह चुके थे, चंद्रशेखर न पक्ष में हैं न विपक्ष में, वे निष्पक्ष हैं और यह उनकी वर्षगांठ और अमृत महोत्सव था इसलिए आखिरी बात कहने का मौका उन्हीं को मिलना था. और उस शाम इकट्ठे हुए देश के लगभग पूरे राजनैतिक वर्ग को चंद्रशेखर ने कह दिया कि अटल बिहारी वाजपेयी जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में दीक्षित हुए हैं, उसके बंधन और उसकी सीमाओं से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं. प्रधानमंत्री के नाते उनका जो राष्ट्रीय कर्तव्य है, उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं और इसलिए उन्हें अपना पद छोड़ देना चाहिए ताकि दूसरे उसका निर्वाह कर सकें. हालांकि, चंद्रशेखर ने यह भी कहा कि वे गुरुदेव से इस्तीफा नहीं मांग रहे हैं, क्योंकि मैं जानता हूं कि आप जाएंगे तो बदतर लोग आएंगे. बदतर के पहले बुरा होता है भले ही चंद्रशेखर ने वाजपेयी प्रशासन को बद नहीं कहा हो.

चूंकि अटल जी और चंद्रशेखर के गुरु-शिष्य संबंधों की चर्चा पहले से ही हो चुकी थी और चंद्रशेकर अपने भाषण में जता भी चुके थे कि उनने कब, कैसे और क्यों उन्हें गुरुदेव कहना शुरू किया, इसलिए मामला गुरु-शिष्य पर तो आना ही था. लेकिन, यह गुरु-शिष्य संवाद इतना गुरु-केंद्रित हो जाएगा इसकी न उम्मीद थी, न यह वांछनीय था, न अमृत महोत्सव इसका उपयुक्त अवसर था. लेकिन, फिर कहना होगा कि शुरुआत अटल जी ने की. उनने कहा कि उन पर आरोप है कि जहां जैसा अवसर होता है बोल देते हैं.

बताया गया है कि दंगों के चौतीस दिन बाद एक दिन के लिए गुजरात गए तो मुसलमान शरणार्थियों के सबसे बड़े कैंप अहमदाबाद के शाह आलम में उनने कहा कि अब वे विदेश में क्या मुंह लेकर जाएंगे.

फिर कंबोडिया और सिंगापुर में उनने कहा कि भारत एक अरब लोगों का देश है. हाल ही में हुई कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को लेकर आप को भारत के प्रति विचलित नहीं होना चाहिए. लेकिन, बारह अप्रैल को गोवा में भाजपा कार्यकारिणी में आए तो कहा कि सबकी शुरुआत गोधरा से हुई है. साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे में आग लगाकर इतने बच्चों, औरतों और आदमियों को जलाया नहीं जाता तो गुजरात में जो हुआ उसे टाला जा सकता था. फिर पूछा - गुजरात की घटनाएं शुरू कैसे हुई इसे भूलना नहीं चाहिए. आग लगाई किसने? आग फैली कैसे? फिर वे अमेरिकियों के बुशवाद पर आ गए और दावा किया कि जिहादी इस्लाम दुनिया भर में आतंकवाद का संकट पैदा कर रहा है. मुसलमान जहां भी रहते हैं शांति से नहीं रहते. हमें कोई धर्मनिरपेक्षता न सिखाए. ईसाइयत और इस्लाम के आने के पहले से हम धर्मनिरपेक्ष हैं. हमने ईसाइयों और मुसलमानों को अपने-अपने धर्म का पालन करने दिया.

लेकिन विज्ञान भवन में उस शाम अटल बिहारी वाजपेयी कुछ और आगे बढ़ गए. गोवा में तो गुजरात के नरसंहार के लिए उनने मुसलमानों को दोषी ठहराया था और इस्लामी जिहाद को दुनिया भर में फैले आतंकवाद के लिए. लेकिन, विज्ञान भवन में उनने कहा कि गोधरा के अग्निकांड के दूसरे दिन यानी 28 फरवरी को पूरी संसद ने अगर कड़ी-से-कड़ी निंदा की होती तो बाद में गुजरात में जो हिंसा हुई शायद नहीं होती. फिर उनने यह भी कहा कि निंदा तो हुई लेकिन जैसी होनी चाहिए थी नहीं हुई.

अब दूसरे स्वयंसेवकों, संगठनों और प्रचारकों की तरह बोलते वक्त अटल बिहारी वाजपेयी भूल गए कि वही उस संसद के नेता हैं जिसे उनकी राय में गोधरा अग्निकांड की कड़ी से कड़ी निंदा करनी थी. उस दिन बजट पेश होना था. संसद के नेता की जिम्मेदारी निभाते हुए वे गोधरा की भर्त्सना का प्रस्ताव रखकर वहां मारे गए लोगों के शोक में पांच बजे तक सदन को उठाए रख सकते थे और फिर बजट पेश हो सकता था. अटल जी ने संसद के नेता और प्रधानमंत्री होने के नाते अपना कर्तव्य क पूरा नहीं किया. वे अपने संसदीय जीवन के चालीस साल की तपस्या का इतनी बार बखान कर चुके हैं. लेकिन फिर भी उन्हें याद नहीं आया कि उनका संसदीय कर्तव्य पहले गोधरा की भर्त्सना में संसद को एकजुट करना था.

सदन के नेता और प्रधानमंत्री होने के अपने कर्तव्य को भूल कर वे छुटभैए प्रचारक की तरह बोल रहे थे कि संसद ने कड़ी से कड़ी निंदा की होती तो गुजरात में हिंसा नहीं होती. यानी गुजरात की मोदी सरकार की मौन और अकर्म सहमति से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने गोधरा का जो बदला गुजरात के निर्दोष मुसलमानों से लिया उसकी जिम्मेदारी और कोई नहीं वे, अटल बिहारी वाजपेयी संसद पर डाल रहे हैं जो प्रधानमंत्री होने के नाते उसके नेता हैं और जो बार-बार चालीस साल की अपनी संसदीय तपस्या की दुहाई देते रहते हैं. जब देश में ऐसे प्रधानमंत्री हों तो उस बेचारे प्रचारक मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्या बताया जाए जिसने कहा कि जब तक संसद सत्र चलता रहेगा, गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा होती रहेगी.

संसद के सबसे अनुभवी और तपस्वी सदस्य और उसके नेता और प्रधानमंत्री होते हुए जब स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी अपने संप्रदाय की प्रतिहिंसा के लिए संसद को दोषी ठहराने से हिचकते नहीं और चंद्रशेखर के अमृत महोत्सव के अवसर का भी इस्तेमाल अपने लोकतंत्र विरोधी निष्कर्ष को स्थापित करने के लिए करते हैं तो पहले कभी विधायक-सांसद न रहने वाले नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक हिंसा के लिए संसद को दोषी क्यों न ठहराएं ? संघ लोकतंत्र को फालतू की चीज मानता है, यह तथ्य तो देश सत्तर साल से जानता है. लेकिन उसके स्वयंसेवक जो अपने संसदीय जीवन की तपस्या को अपने प्रधानमंत्री होने की सबसे बड़ी योग्यता बताते रहे हों वो भी संसद और लोकतंत्र के बारे में इतने उच्च फासीवादी विचार रखते हैं और ऐसी मासूम बेशरमी से प्रकट कर सकते हैं यह लोकतांत्रिक भारत ने पहली बार देखा है.

प्रधानमंत्री ने अपने संप्रदाय की प्रतिहिंसा और अपनी पार्टी की एक राज्य सरकार की घनघोर अकर्मण्यता के लिए संसद को दोष दिया है. इस के पहले भाजपा, संघ, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल सरकार की सहमति और अकर्मण्यता से किए गए मुसलमान नरसंहार की जिम्मेदारी उन सेकुलर पार्टियों और उदार हिंदुओं पर डालते आ रहे हैं जिनने गोधरा में इस्लामी आतंकवादी कार्रवाई की छाती फोड़ और माथा ठोक कर निंदा नहीं की. यानी देश की संसद, सेकुलर पार्टियों और उदार हिंदू अगर मुसलमानों को मारपीट कर काबू में नहीं रखेंगे तो संघ संप्रदायी प्रतिहिंसा की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी. प्रधानमंत्री से लेकर हर दूसरे छुटभैये स्वयंसेवक ने यह बात कह दी है. और हम मानते हैं कि हम एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य हैं.

चंद्रशेखर को अगर अपने अमृत महोत्सव पर इतने अभिनंदन के बावजूद ऐसा पवित्र आक्रोश और ऐसी पीड़ा हुई तो इसलिए कि वे संवेदनशील प्राणी हैं. वे स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी की तरह गोधरा के मुसलमानों और गुजरात के हिंदुओं में फर्क नहीं कर सकते. यह संघी संस्कार उन्हें नहीं मिला है. इसीलिए उनने अटल बिहारी वाजपेयी नाम के अपने गुरूदेव से कहा कि सर्वोच्च पद पर होते हुए भी जब आप देश का काम न कर पाएं तो आपको हट जाना चाहिए.

लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी को इसकी शर्म नहीं आती. वे अपनी सरकार को दिल्ली में और अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में बचाए रखने के लिए बहुजन समाज पार्टी की मायावती की सरकार बनवा रहे हैं. उनने मोदी को हटाने के बजाए गुजरात में मुसलमानों की लाशों और उनके घरों, दुकानों और कारखानों की राख पर हिंदू सांप्रदायिक वोट लेने की प्रेरणा दी है क्योंकि गुजरात में इसके सिवाय भाजपा की सरकार नहीं बन सकती. सन चौरासी में राजीव गांधी ने भी सिखों के नरसंहार पर वोट मांगे थे. तब चुनाव अनिवार्य थे क्योंकि न सिर्फ इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी, लोकसभा का कार्यकाल भी पूरा हो रहा था. गुजरात में विधानसभा चुनाव फरवरी 2003 में होने हैं. लेकिन भाजपाई सरकार की सहमति से संघ संप्रदाय के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने गोधरा का जो बदला गुजरात के मुसलमानों से लिया है, वह भाजपा को लगता है कि उसे दो तिहाई बहुमत दिला सकता है. इसलिए गोवा में नरेंद्र मोदी को कहा गया कि वे इस्तीफा न दें, विधानसभा भंग करें और चुनाव करवा लें ताकि मुसलमानों के सुनियोंजित नरसंहार को लोकतांत्रिक मान्यता मिल सके.

मोदी ने अब तक विधानसभा भंग नहीं करवाई है और भाजपा तत्काल चुनाव टाल रही है तो उसका कारण तेलुगू देशम की चेतावनी है. भाजपा गठबंधन से बाहर होते हुए भी यह पार्टी चार साल से वाजपेयी सरकार को चला रही है. वह मांग कर रही है कि मोदी को हटाया जाए और सांप्रदायिक चुनाव न करवाए जाएं. अभी तक उसने समर्थन वापस नहीं लिया है. गुजरात में विधानसभा भंग करके चुनाव करवाने की घोषणा तेलुगुदेशम को कगार से उस पार धकेल सकती है. इसलिए सावधानी बरती जा रही है. दिल्ली की सरकार बनाए रखना जरूरी है क्योंकि वह गई तो न गुजरात में मोदी बचेंगे न सांप्रदायिक हिंसा की आग पर हिंदुत्व का दलिया पकेगा. हिंदुत्व की समृद्धि के लिए स्वयंसेवक वाजपेयी की सरकार अभी चलती रहनी चाहिए.

लेकिन पहले गोवा में और अब चंद्रशेखर के अमृत महोत्सव में स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी ने उदार, सहिष्णु और लोकतांत्रिक हिंदू होने के सभी स्वांग उतार दिए हैं. वे समझ गए हैं कि इन स्वांगों से न उनकी लोकतांत्रिक नेताई चल सकती है, न वे और उनकी पार्टी सत्ता में रह सकती है. उनने मान लिया है कि शुद्ध और स्पष्ट हिंदुत्व ही भाजपा में उनकी नेताई और भाजपा को सत्ता की होड़ में बनाए रख सकती है. हिंदुत्व की मूल प्रेरणा और आदि शक्ति ही इस्लाम और ईसाइयत से बदला लेने और उन्हें भारत में नाकुछ बना कर रखने की है. इसके दर्शन सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर से लेकर सुदर्शन तक में किए जा सकते हैं.

अगर आप न्यायमूर्ति जगदीश शरण वर्मा जैसे संस्कारविहीन और गंवार हिंदू न हों तो आपको समझने में देर नहीं लगेगी कि हिंदुत्व एक अहिंदू, अधार्मिक और अभारतीय राजनैतिक अवधारणा है जिसे सावरकर ने पश्चिम यूरोप के नाजीवाद और फासीवाद से विकसित किया है. गोलवलकर ने हिटलर से प्रेरणा ली है. लेकिन इस हिंदुत्व को भारत और धर्म की पांच हजार साल की परंपरा से जोड़े बिना हिंदुओं को भी स्वीकार नहीं करवाया जा सकता. इसलिए अटल बिहारी वाजपेयी गोवा में भाषण देते हैं कि हमें कोई धर्मनिरपेक्षता न सिखाए. ईसाइयत और इस्लाम के उदित होने के पहले भी हम धर्मनिरपेक्ष थे और मुसलमानों और ईसाइयों को हमने अपना धर्म पालन करने की इजाजत दी. बेचारे स्वयंसेवक वाजपेयी यही याद नहीं रखते कि वह धर्म और वह भारतीय समाज हिंदुत्ववादियों का नहीं है. इस हिंदुत्व को सौ साल भी नहीं हुए और यह धर्म और हिंदू समाज को उदार, सहिष्णु, बहुलतावादी और असंगठित होने के कारण कायर कहकर कोड़े मारता रहा है.

हिंदुत्व धर्म और भारतीय समाज को संगठित संप्रदाय और सैनिक समाज बनाने में लगा है क्योंकि वह मानता है कि उसके बिना ये बचेंगे नहीं. जिसे पांच हजार साल पुराना और लगातार जीवित रहने वाला धर्म और समाज संघ संप्रदाय बताता है, उसकी रक्षा का एकाधिकार भी वह अपना मानता है. धर्म और भारतीय समाज अगर हिंदुत्व को स्वीकार नहीं करता तो इसलिए कि यह राक्षसी संप्रदाय है. गुजरात में उसके उत्पाद सबने देख लिए हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी इसी हिंदुत्व को मानने वाले हैं, इसे तो जानने वाले जानते ही थे. चंद्रशेखर के अमृत महोत्सव की उपलब्धि मानना चाहिए कि जिस दिन वे पचहत्तर बरस के हुए उनने अपने गुरूदेव के फासीवादी चरित्र का उद्घाटन कर दिया. अटल जी गुरू इसी तरह गुड़ और बलियावाले शिष्य शक्कर हो जाते हैं. अपने शिष्यों से बचिए.