मैं आठ जून की उस सुबह सिलीगुड़ी में थी. दार्जिलिंग से करीब तीन घंटे की दूरी पर स्थित इस कस्बे में मेरा भाई भर्ती था. मैं उसे यहां देखने आई थी. डॉक्टरों द्वारा भर्ती मरीजों को देखने का सिलसिला अभी शुरू ही हुआ था और मैं यह देखकर खुश थी कि मेरा भाई अब पहले से काफी बेहतर नजर आ रहा है. दार्जिलिंग में रह रहे मेरे माता-पिता भी कुछ देर बाद ही उसे देखने के लिए आने वाले थे. वैसे सिलीगुड़ी का मौसम दार्जिलिंग की तुलना में काफी गर्म रहता है. इसीलिए मैं उम्मीद कर रही थी मेरे माता-पिता के आने तक थोड़ी ठंडक हो जाए क्योंकि उन्हें इतनी गर्मी में रहने की आदत नहीं है.

हालांकि यह एक सवाल भी पूछा जा सकता है कि मैं सिलीगुड़ी में क्यों हूं. दार्जिलिंग में क्यों नहीं? तो इस सीधा ज़वाब है. देश की आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी दार्जिलिंग में स्वास्थ्य सेवाएं स्तरीय नहीं हैं. इसीलिए वहां के लोगों को नियमित रूप से सिलीगुड़ी या उससे भी आगे कहीं किसी दूसरी जगह जाना पड़ता है. लेकिन इस पर बात बाद में.

मेरे माता-पिता उम्मीद से कुछ जल्दी ही अस्पताल पहुंच चुके थे. क्योंकि वे बिना वक़्त गंवाए अपने बीमार बेटे को देखने के लिए बेताब थे. लेकिन अभी उन्हें पहुंचे आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि उनके साथ ही आए मेरे बड़े भाई ने हमें बताया कि दार्जिलिंग में प्रदर्शन हो रहे हैं. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले दागे हैं. यह प्रदर्शन उस वक़्त शुरू हुए जब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ता उस स्थान की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य मंत्रिमंडल की बैठक ले रही थीं. इस प्रदर्शन की ख़बर मिलते ही मेरे माता-पिता को उल्टे पैर लौटना पड़ा.

दार्जिलिंग में आठ जून को शुरू हुए हिंसक प्रदर्शन के पीछे पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की ओर से 15 मई को ज़ारी एक आदेश था. इस आदेश के तहत पूरे राज्य के स्कूलाें में 10वीं कक्षा तक बंगाली पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया था. इस फ़रमान ने आग में घी का काम किया और पहले से ही चल रही पृथक् गोरखालैंड की मांग को और भड़का दिया. अनिश्चितकालीन बंद से इस पहाड़ी कस्बे का जनजीवन मानो रेंगने लगा.

हालांकि प्रदर्शन-आंदोलन के पीछे इस बार निश्चित रूप से भाषाई मसला ही था. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए दार्जिलिंग के लोग बंगाली के ख़िलाफ हैं. वे उसे सीखना नहीं चाहते. वे तो भाषा को जबरन थोपने की सरकारी कोशिश से भड़के हुए हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि भाषा चुनने की उनकी आज़ादी को सरकारी आदेश से ख़तरा है.

वेसे सरकार ने भी ज़ल्द ही इस फरमान से हाे सकने वाले नुक़सान का अंदाज़ा लगा लिया और स्पष्ट कर दिया कि आदेश दार्जिलिंग के लोगों के लिए बाध्यकारी नहीं है. लेकिन इसके बावज़ूद विरोध की आग शांत नहीं हुई.

पहले चुनने की आजादी थी, अनिवार्यता नहीं

मैं अपने अनुभव की ही बात करूं तो मैंने सातवीं कक्षा तक नेपाली माध्यम के स्कूल में पढ़ाई की. वह 1990 का दशक था. उस दौर में स्कूलों में बंगाली पढ़ाई तो जाती थी लेकिन उसमें फेल हो जाने पर भी बच्चा अगली कक्षा में पहुंच जाता था. क्योंकि बंगाली अनिवार्य विषय नहीं थी. इस तरह हम बिना किसी ज़ोर-ज़बर्दस्ती के ही नई भाषा सीखा रहे थे. मैंने भी पांचवीं और छठी में बंगाली पढ़ी थी. यह मेरे लिए उस वक़्त काम आई जब मैं प्राणि विज्ञान (ज़ूलॉजी) से स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएशन) करने के लिए दार्जिलिंग के सरकारी कॉलेज में पहुंची. वहां राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए व्याख्याता (लेक्चरर) अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते थे. वे हमें ‘बांग्लिश’ (बंगाली-अंग्रेजी का मिला-ज़ुला रूप) में हमें पढ़ाते थे. नेपाली और हिंदी तो उन्हें आती ही नहीं थी.

यहां से मुझे अपनी बंगाली को और बेहतर करने का एक मौका मिला. कक्षा में मेरे कई साथी मूल रूप से बंगाली भाषी ही थे. कुछ मेरी तरह नेपाली भाषी. इनमें भी मेरे अलावा सिर्फ एक ही शख़्स ऐसा था जिसे थोड़ी बहुत बंगाली भी आती थी. यानी हम दोनों ही समझ पाते थे कि हमारे अध्यापक ‘बांग्लिश’ में असल में कह क्या रहे हैं. यहां मुझे शिद्दत से यह महसूस हुआ कि नई भाषा सीखना कितना उपयोगी हो सकता है. यह वैसा ही है जैसे अस्तित्व बचाए रखने के लिए आपको किन्हीं-किन्हीं उपकरणों की ज़रूरत होती है. मेरे इस अनुभव का ही थोड़ा-बहुत असर कह सकते हैं कि आज मेरा भतीजा दार्जिलिंग के एक प्रतिष्ठित स्कूल में चौथी भाषा के रूप में बंगाली पढ़ रहा है. लेकिन वहां भी वह उसकी पसंद है. काेई ज़बर्दस्ती नहीं है.

लेकिन अब तो भाषा पर ही राजनीति हो रही है

आम तौर पर माना यही जा रहा है कि दार्जिलिंग में हो रहे प्रदर्शनों के पीछे स्कूलों में बंगाली भाषा अनिवार्य किए जाने संबंधी सरकारी आदेश है फ़ौरी तौर पर यह सही भी दिखता है. लेकिन यह तस्वीर का एक ही पहलू है. दार्जिलिंग की निवासी होने के नाते मैं आपको बता सकती हूं कि यह विरोध काेई आज का नहीं है. बल्कि बीते दो साल से छोटे-बड़े रूप में चल रहा है. और इसके पीछे कोई सरकारी आदेश नहीं बल्कि यहां नेपाली भाषी लोगों पर बंगाली थोपने की राजनीतिक साज़िश है.

पहली बार यह मसला उस वक़्त उठा जब पश्चिम बंगाल पुलिस का एक बैनर शहर के बीचों-बीच स्थित चौरस्ता में दिखाई दिया था. एक ऐसी जगह पर जहां बहुतायत लोग नेपाली ही बोलते-समझते हैं वहां पुलिस के अधिकृत बैनर में बंगाली में शरदोत्सव की बधाई दी गई थी. दार्जिलिंग में नेपालियाें के लिए दशहरा साल का सबसे बड़ा उत्सव होता है और उस समय ज़्यादातर लोग ख़रीदारी में व्यस्त होते हैं. समाज के कुछ जागरूक लोगों ने इस पर सख़्त एतराज़ ज़ताया. हालांकि ऐसा लगता है कि किसी नेता ने इस पर ध्यान नहीं दिया जबकि सरकार की ओर से यह सब जानबूझकर किया गया था.

बहरहाल लोगों के विरोध और ऑनलाइन अर्ज़ियों के बाद पुलिस ने उसकी जगह पर दूसरा बैनर लगा दिया. लेकिन इस बार उसकी भाषा नहीं बल्कि सिर्फ लिपि बदली गई थी और यह थी देवनागरी जिसमें हिंदी और नेपाली, दोनों लिखी जाती हैं. बैनर पर लिखा था, शारद शुभेच्छा, आप्नादेर सकलके जानाइ, शारदीयार प्रीति ओ शुभेच्छा, आप्नादेर साथे- आप्नादेर पाशे. पश्चिम बंग पुलिस’. इस बार कई लोगों का इस बैनर पर ध्यान गया.

पश्चिम बंगाल पुलिस की ओर से दार्जिलिंग के चौरस्ता पर लगाया गया बैनर.
पश्चिम बंगाल पुलिस की ओर से दार्जिलिंग के चौरस्ता पर लगाया गया बैनर.

यहां मैं सिर्फ याद दिलाना चाहूंगी कि नेपाली भारत की मान्यता प्राप्त भाषा है. यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है. इसके बावजूद सरकारी मशीनरी ने यहां रहने वाले लाेगों को नेपाली में नहीं बंगाली में बधाई संदेश देने को प्राथमिकता दी. इससे निज़ी तौर पर मुझे तक़लीफ पहुंची. मुझे लगा जैसे जानबूझकर मेरी मातृभाषा का अपमान किया गया है. लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई गई है.

एक राज्य, एक भाषा की अघोषित व्यवस्था

यहां एक और दिलचस्प तथ्य पर ग़ौर कीजिए. केंद्रीय लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में भले ही परीक्षार्थियों को नेपाली में परीक्षा देने का विकल्प मिल जाता हो, लेकिन पश्चिम बंगाल लोकसेवा आयोग ऐसी कोई सुविधा नहीं देता. उसके विकल्पों में बंगाली के साथ हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, संथाल और यहां तक पाली, अरब, फ्रेंच और फारसी तक है. लेकिन नेपाली नहीं है. यही नहीं अगर कोई पश्चिम बंगाल लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास भी कर लेता है तो उसके लिए विभागीय परीक्षाएं देना अनिवार्य होता है. इनमें ग़ैर-बंगालियों के लिए बंगाली और बंगालियों के लिए हिंदी भाषा के प्रश्न पत्र शामिल किए जाते हैं. यह परीक्षा पास करने के बाद ही उनकी नौकरी नियमित होती है. अगर कोई उम्मीदवार परीक्षा पास करने में नाक़ाम रहता है तो उसकी वेतन वृद्धियां और नौकरी का स्थायीकरण रोक लिया जाता है. यानी अगर कोई उम्मीदवार पहाड़ों से ताल्लुक रखता है और उसने कभी बंगाली नहीं पढ़ी तो उसे नुकसान होना पक्का है. मैं निज़ी तौर पर पश्चिम बंगाल लोकसेवा के ऐसे कई अफसरों को जानती हूं जिन्होंने ये विभागीय परीक्षाएं पास नहीं की हैं. और अपने हिस्से का नुकसान उठा रहे हैं.

राज्य में भाषा पर होने वाली राजनीति का एक और उदाहरण मुझे याद आता है. यह वाक़या 2014 का है. मेरी एक दोस्त अपने ख़राब स्वास्थ्य और कमज़ोर आर्थिक हाल के बावज़ूद पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग की परीक्षा पास करने के लिए मेहनत कर रही थी. इसके ज़रिए राज्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में व्याख्याता के पद पर नियुक्तियां होती हैं. उसकी मेहनत सफल रही और उसका चयन हो गया. वह उसके माता-पिता खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. हालांकि मुझे उसकी सफलता से कोई अचरज़ नहीं हुआ बल्कि मेरे लिए वह प्रेरणास्रोत हो चुकी थी. लेकिन अफ़साेस. पश्चिम बंगाल महाविद्यालय सेवा आयोग ने उसे नौकरी देने से इंकार कर दिया. क्योंकि वह बंगाली लिख और पढ़ नहीं सकती थी. हालांकि वह बंगाली बोलती धाराप्रवाह थी जो कि उसने कोलकाता में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते वक़्त सीख ली थी.

इस भेदभाव को झेलने वाली मेरी वह दोस्त अकेली नहीं थी. पहाड़ी और उससे लगते दोआर व तराई के इलाक़ों से आने वाले छह छात्र-छात्राओं को इसी एक कारण के चलते नौकरी देने से मना कर दिया गया था. पहाड़ी क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बावज़ूद सरकार भाषा के आधार नौकरी देने से मना कर देती है. वह उनके साथ कभी निष्पक्षता से पेश नहीं आती. यह कहां तक न्यायोचित है? ख़ासतौर पर इस तथ्य के मद्देनज़र कि दार्जिलिंग में मेरे व्याख्याता तो मुझे नेपाली के बज़ाय ‘बांग्लिश’ में पढ़ा रहे थे? ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं. स्कूलों को नेपाली भाषा की पाठ्यपुस्तकें तक राज्य सरकार की ओर से समय पर उपलब्ध नहीं कराई जातीं.

मुझे घूमना-फिरना, नई जगहों की खोजबीन करना, उनका इतिहास, संस्कृति, परंपराएं जानना बेहद पसंद है. लिहाज़ा कई जगहों पर रुकती-ठहरती भी हूं. और उस वक़्त मेज़बानों की ही भाषा में कुछ बातकर उनसे जुड़ने की कोशिश करती हूं. उन कुछ शब्दों का असर अपने मेजबानों की आंखों में मुझे नज़र आता है. उनके चेहरे पर दिखता है. ऐसा लगता है जैसे वे मेरे लिए अपने घर के नहीं दिल के दरवाज़े खोल रहे हैं. लेकिन दुखद है कि पश्चिम बंगाल सरकार इस छोटे लेकिन बेहद अहम रहस्य को नहीं समझ पा रही है. हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करने वाले मेज़बानों (नेपालियों) का वह ‘एक राज्य एक भाषा’ के नाम पर दमन करने में लगी है.