अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध के पहले काव्य संग्रह के नामकरण की बहस के बारे में एक बार बताया था कि ख़ुद कवि की इच्छा उस संग्रह का नाम ‘ सहर्ष स्वीकारा है’ रखने की थी लेकिन अशोकजी और उनके मित्रों को यह मुक्तिबोध के काव्य स्वभाव के अनुरूप नहीं लगा. उनकी समझ थी कि मुक्तिबोध में न तो हर्ष है, न स्वीकार. फिर उनके काव्य संग्रह के लिए यह नाम नितांत असंगत ठहरता. इसलिए बहुत सोच-विचार कर संग्रह का नाम ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ रखा गया. यह संग्रह मुक्तिबोध की अचेतावस्था में छपा. वे इसे देख न पाए.

इस एक घटना और निर्णय ने मुक्तिबोध को पढ़े जाने का एक कोण तय कर दिया जहां से पिछले पचास साल से मुक्तिबोध के पाठक उन्हें देखते रहे हैं. दिलचस्प यह है कि ये पाठक दूसरे मामलों में एक-दूसरे से मतभेद रखते हैं लेकिन इस पर उनकी सहमति है कि मुक्तिबोध की कविताओं की दुनिया दहशत, डर, आशंकाओं की दुनिया है. वे मनुष्य के मन के अंधेरे के कवि हैं. दोष भावना और अपराध बोध से उनकी कविताएं बिंधी हुई हैं.

मुक्तिबोध का ज़िक्र आते ही ‘अंधेरे में’ की याद आती है. इस वजह से अंधेरापन मुक्तिबोध को परिभाषित करने वाले प्रत्यय में बदल गया है. नकार, निषेध, अभाव, शिकायत, आलोचना, चेतावनी ऐसे शब्द हैं, जो मुक्तिबोध को पहली बार पढ़ने वाले पाठकों के पास, जिनमें ख़ासकर हिंदी के छात्र शामिल हैं, कविता के पहले पहुंच जाते हैं. कुछ वैसे ही जैसे प्रेमचंद की किसी कहानी या उपन्यास को हाथ में लेने के पहले से ही यह मालूम रहता है कि वे एक यथार्थवादी, अर्ध मार्क्सवादी, अर्ध गांधीवादी, या आदर्शोन्मुख यथार्थवादी हैं. या, जैसे अज्ञेय अस्तित्ववादी हैं, यह धारणा उनकी रचना से पहले पाठकों के पास मौजूद होती है. इन धारणाओं के धुंधलके को पारकर रचना और लेखक का साक्षात्कार करने की यात्रा कई पाठकों के लिए बहुत लंबी और तकलीफ़देह होती है.

अंधेरे का कवि कहने के साथ-साथ मुक्तिबोध को भारतीय जनतंत्र के साथ होने वाली दुर्घटना का भविष्यवक़्ता भी मान लिया गया है. कहा जाता रहा है कि ‘अंधेरे में’ फ़ासिस्म की आशंका की कविता है. जिस वक़्त यह कविता लिखी गई, भारत में मुक्तिबोध के प्रिय नेहरू प्रधानमंत्री थे. नेहरू के बाद क्या होगा, यह आशंका तो थी लेकिन भारत में फ़ासिस्म आ सकता है, इसके इमकानात नहीं थे. मुक्तिबोध की एक किताब के ख़िलाफ़ अभियान और उस पर पाबंदी के कारण मुक्तिबोध को यह भयंकर आशंका थी कि कुछ ऐसा-वैसा हो सकता है. लेकिन यह अपने आप में पर्याप्त कारण नहीं कि आगे फ़ासिस्म की आशंका की जाए. फिर मुक्तिबोध की इस कविता को क्या सिर्फ़ भारतीय संदर्भ में ही समझा जाए, या इस प्रकार का विचार भी संभव है कि वे भारतीय संदर्भों के सहारे, जिनमें तिलक और गांधी भी हैं, जो कह रहे थे वह भारत तक सीमित न था?

मुक्तिबोध की अन्य कविताओं से यह बात और भी ज़ाहिर होती है. वे अनुपयोग के कारण मुरझा गई मानवीय क्षमताओं की ट्रेजेडी की कथा कहते हैं. साथ-साथ बुद्धि के कारण मनुष्य के सुख-चैन छिन जाने की भी. मानवीय उत्तरदायित्व और उससे जुड़े कर्तव्य के अहसास की तीव्रता की अभिव्यक्ति उनकी कविताओं में है. यह भी मात्र भारतीय संदर्भ तक सीमित क्यों माना जाए?

जैसे मुक्तिबोध को अंधेरेपन का कवि कहा जाता रहा है, उसी तरह उन्हें मार्क्सवादी कहकर मान लिया जाता है कि इससे उनके बारे में सबकुछ समझ लिया गया है. मार्क्सवादी होने से किसी लेखक में क्या विशेष पैदा होता है जो उसमें नहीं है जो मार्क्सवादी नहीं है, विशेषकर उसकी कविता या कहानी में, यह अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है. क्या यह सिर्फ़ विषय के चुनाव से ही पता चलेगा? तो क्या साहित्य में सारा कुछ विषय का चयन है?

अगर साहित्य और उसमें भी कविता में भाषा प्रमुख है तो मार्क्सवाद उसे किस प्रकार प्रभावित करता है? प्रायः जनसाधारण की भाषा में लिखने को मार्क्सवादी होने का लक्षण और परिणाम, दोनों ही मान लिया जाता है. मार्क्सवाद रचनात्मक संवेदना को किस प्रकार निर्णायक रूप में बदलता है, इसके बारे में ठीक-ठीक बात नहीं की गई है. इसी वजह से प्रेमचंद हों या निराला, मार्क्सवाद को इसका श्रेय दिया जाता है कि वे किसानों या मज़दूरों या जनसाधारण के दुःखदर्द और संघर्ष का चित्रण करते हैं

मुक्तिबोध में भी अंधेरा ही अंधेरा और भीषण या भयानक देखना ऐसी ही प्रवृत्ति की वजह से है. जबकि उनमें उल्लास, कोमल और उदात्त का एक साथ निवास और दोनों की बेचैन तलाश, अपने वजूद की खोज के साथ बार-बार उसकी कठोर परख, और सबसे बढ़कर दोस्तों या मित्रों की खोज, सब कुछ है. वहां सिर्फ़ असुरक्षा जनित भय नहीं है.

मुक्तिबोध कहते भी हैं कि ज़िंदगी मुश्किल है लेकिन इतनी मीठी कि जी चाहता है, एक घूंट में पी जाएं. उनका यह एक वाक्य ही उनकी कविता के स्वभाव को समझने के लिए दिए का काम कर सकता है.