कर्नाटक में हिंदी का विरोध तेज होता जा रहा है. बेंगलुरु मेट्रो के दो स्टेशनों पर हिंदी में लिखे गए नामों को टेप से ढक देने का मामला सामने आया है. यह घटना चिकपेटे और मैजेस्टिक स्टेशन की है. यह अभी तक पता नहीं चल सका कि इस काम को किसने अंजाम दिया. कर्नाटक पुलिस ने इस बात से इनकार किया है कि उसने बेंगलुरु मेट्रो को ऐसा करने के लिए कोई निर्देश जारी किया. कुछ मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह काम कर्नाटक रक्षणा वेदिके (केआरवी) नामक संगठन ने किया है.

केआरवी ने ही पिछले हफ्ते प्रदर्शन कर बेंगलुरु मेट्रो से उसके सभी स्टेशनों से हिंदी साइन बोर्ड को हटा देने की मांग की थी. संगठन ने हिंदी की घोषणाओं को भी बंद कर देने की मांग रखी थी. अपनी मांग के समर्थन में उसका तर्क था कि केरल और महाराष्ट्र की मेट्रो ट्रेनों में हिंदी भाषा का इस्तेमाल नहीं होता तो बेंगलुरु मेट्रो ऐसा क्यों कर रहा है. उसकी इस मांग का कर्नाटक के कुछ राजनीतिक दल भी समर्थन कर रहे हैं. इस मांग पर बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ी हुई है. ‘नम्मा मेट्रो हिंदी बेडा (हमारी मेट्रो, हम हिंदी नहीं चाहते)‘ नाम के हैशटैग में लोग मेट्रो ट्रेन सहित दूसरे सरकारी विभागों से हिंदी को हटाने की मांग कर रहे हैं.

बेंगलुरु मेट्रो केंद्र और कर्नाटक सरकार की संयुक्त परियोजना है. इसके चलते उस पर केंद्र सरकार का ‘त्रिभाषा सूत्र’ अपने आप: लागू हो जाता है. इस सूत्र के तहत स्थानीय भाषा, हिंदी और अंग्रेजी में सूचनाएं लिखने और प्रकाशित करना जरूरी है. केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार ने भी पिछले हफ्ते कहा था कि कर्नाटक में कन्नड़ भाषा को तवज्जो दी जाएगी. लेकिन वहां अंग्रेजी और हिंदी के बोर्ड भी लगाए जाएंगे ताकि दूसरे राज्य के लोगों को कोई दिक्कत न हो. उन्होंने अपनी बात के समर्थन में भारतीय रेलवे का उदाहरण दिया था जो तीन भाषाओं का इस्तेमाल करता है.