इस साल एक जुलाई से देश में लागू वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के प्रावधानों में सिलसिला जारी है. बीते हफ्ते जीएसटी परिषद ने इसके प्रावधानों में कई बदलाव किए. खबर आ रही है कि आगे भी जीसटी स्लैब में बदलाव किए जा सकते हैं. मोदी सरकार इसे देश के आर्थिक उदारीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश कर रही है. साथ ही, वह इसके गरीब हितैषी होने का भी दावा कर रही है.

मीडिया रिपोर्टस की मानें तो जीएसटी के तहत कई वस्तुओं के ऊंचे टैक्स स्लैब में होने के चलते कारोबारियों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. कई उद्योग-धंधे चौपट हो रहे हैं. साथ ही, केंद्र सरकार के निर्देश के बावजूद दुकानदारों द्वारा आम उपभोक्ताओं से जीएसटी के नाम पर अधिक कीमत वसूलने की बात सामने आ रही है. ये भी शिकायतें मिल रही हैं कि 28 फीसदी टैक्स स्लैब में रखी गई कई चीजों को व्यापारी बिना रसीद के बेच रहे हैं और इस तरह जीएसटी की मूल भावना को चपत लग रही है. विपक्ष के साथ-साथ भाजपा के अपने वरिष्ठ नेता भी सरकार पर नोटबंदी के बाद जीएसटी जैसे बड़े फैसले को बिना पूरी तैयारी के लागू करने को लेकर निशाना साध रहे हैं.

बीते शुक्रवार को जीएसटी परिषद ने तमाम आपत्तियों को देखते हुए 27 वस्तुओं और सेवाओं पर कर की दरों में बदलाव किया था. इसके बावजूद अब तक ऐसी चीजों की एक लंबी सूची है, जो लोगों को उनके मौजूदा स्लैब की वजह से हजम नहीं हो रहं. यहां तक कि बैंकों द्वारा खातों में न्यूनतम बैलेंस नहीं रखने पर भी ग्राहकों से मुआवजे के साथ जीएसटी भी वसूला जा रहा है.

जीएसटी के तहत वस्तु और सेवाओं के चार वर्ग बनाए गए हैं जिन पर पांच, 12, 18 और 28 फीसदी की दर से टैक्स लग रहा है. खाद्यान्न और रोजमर्रा की कई वस्तुओं को कर के दायरे से बाहर रखा गया है. लेकिन कई चीजें हैं जिनके बारे में आर्थिक मामलों के जानकारों सहित आम आदमी का भी मानना है कि उन्हें कर की उचित श्रेणी या स्लैब में नहीं रखा गया.

सैनेटरी नैपकिन

जीएसटी के तहत सैनेटरी नैपकिन पर 12 फीसदी कर लगाया गया है. साथ ही ग्राहकों को टैम्पून (सैनेटरी नैपकिन की एक अन्य किस्म) पर 18 फीसदी कर देना होगा. इससे पहले इसे दिल्ली जैसे कई राज्यों में इसे कर मुक्त रखा गया था या फिर इस पर काफी कम कर लगाए गए थे. दूसरी ओर, महिलाओं के लिए श्रृंगार की वस्तुओं जैसे चूड़ी, बिंदी आदि को कर मुक्त रखा गया है.

महिलाओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से सैनेटरी नैपकिन को बहुत जरूरी वस्तु माना जाता है इसलिए इस पर लक्जरी आइटम्स वाला कर लगाने का विरोध हो रहा है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस की पत्नी अमृता फड़णवीस ने कुछ समय पहले एक अखबार से बात करते हुए कहा कि सैनिटरी नैपकिन लग्जरी प्रॉडक्ट नहीं, बल्कि जरूरी चीज है लिहाजा इस पर टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए. अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा ने भी इस पर सवाल उठाया है. हालांकि कई रिपोर्टों में यह बात भी सामने आई है कि देश में महिलाओं का एक बड़ा तबका इसका लाभ नहीं उठा पाता क्योंकि उसे इसकी कीमत ज्यादा लगती है. जानकारों के मुताबिक ऐसे में सरकार को चाहिए था कि वह टैक्स कम से कम करके इसे ‘अफोर्डेबल’ बनाने की कोशिश करती.

फिल्मों के टिकट

जीएसटी के तहत 100 रुपये से कम के टिकटों पर 18 फीसदी और इससे ज्यादा पर 28 फीसदी मनोरंजन कर की दर तय की गई है. इसके अलावा तमिलनाडु ने टिकटों पर 30 फीसदी अतिरिक्त कर लगाने की बात कही है. इसके विरोध में राज्य के करीब एक हजार सिनेमाघर मालिकों ने हड़ताल भी की थी. उनका कहना है वे इतना ज्यादा टैक्स नहीं चुका सकते. माना जा रहा है कि टैक्स की ये नई दरें क्षेत्रीय सिनेमा के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह होंगी क्योंकि क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों पर अभी तक बहुत कम टैक्स लग रहा था. महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में तो क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों पर मनोरंजन कर की दर शून्य थी जबकि बंगाल में महज दो फीसदी. यही वजह है कि रजनीकांत और कमल हासन जैसे दिग्गजों ने इस पर निराशा जताई है.

इसके अलावा पहले ही मंदी से जूझ रहा हिंदी फिल्म उद्योग पांच फीसदी कर की उम्मीद कर रहा था. लेकिन 18 और 28 फीसदी के आंकड़े से उसे धक्का लगा है. माना जा रहा है कि इससे लाखों रोजगार देने वाले इस क्षेत्र की सेहत और बिगड़ सकती है.

दिव्यांगों के इस्तेमाल संबंधी उपकरण

नई एकसमान कर प्रणाली के तहत दिव्यांगों के इस्तेमाल संबंधी उपकरणों पर ग्राहकों को पांच फीसदी कर देना पड़ रहा है. साथ ही इन उपकरणों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर कच्चे माल पर 18 फीसदी कर लग रहा है. इससे पहले दिसंबर, 2016 में प्रधानमंत्री मोदी ने दिव्यांग व्‍यक्तियों के अधिकार विधेयक के संसद से पारित होने पर कहा था कि इसके जरिए इन्हें ज्‍यादा अवसर, समानता और सुविधाओं तक पहुंच हासिल हो सकेगी. प्रधानमंत्री के बातों के उलट जीएसटी लागू होने के बाद इन उपकरणों तक आम आदमी की पहुंच सीमित होने की आशंका जाहिर की जा रही है.

रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं

दैनिक उपभोग की कई चीजें हैं जिन्हें जीएसटी के तहत 18 और 28 फीसदी की श्रेणी में रखा गया है. इनमें शेविंग क्रीम, टूथपेस्ट, आफ्टर शेव, वाल पुट्टी, पेंट और रेजर शामिल हैं जिनका इस्तेमाल आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लोग भी करते हैं. दूसरी ओर ड्राई फ्रूट्स को पांच और 12 फीसदी वाली श्रेणी में रखा गया है. इसके अलावा 1000 रुपये तक के रेडीमेट गारमेंट्स के साथ सूती कपड़े, धागे और फैब्रिक उत्पाद पर पांच फीसदी कर लगाया गया है. इन पर पहले किसी तरह का कर नहीं लगाया गया था. जानकार बताते हैं कि इसकी वजह से छोटे कपड़ा कारोबारियों पर बुरा असर पड़ रहा है.

बच्चों की पढ़ाई में इस्तेमाल होने वाली चीजें

केंद्र सरकार शिक्षा पर प्रत्येक साल कुल जीडीपी का करीब तीन फीसदी ही खर्च करती है. दूसरी ओर, जीएसटी लागू होने से लगातार महंगी होती शिक्षा से जूझ रहे अभिभावकों की जेब और भी ढीली हो सकती है. इसके तहत बच्चों की पढ़ाई में काम आने वाले सामग्रियों को पांच, 12 और 18 फीसदी वाले टैक्स स्लैब में रखा गया है. ज्यॉमेट्री बॉक्स पर पांच और स्टेशनरी वह ड्राइंग बुक्स पर 12 फीसदी कर की दर तय की गई है. साथ ही खेल के सामान पर भी 12 फीसदी कर लगाया गया है.

बैंकिंग सेवाएं

नोटबंदी के ऐलान के बाद केंद्र सरकार लगातार कैशलेस पेमेंट को बढ़ावा देने की बात कर रही है. दूसरी ओर सरकार ने जीएसटी के तहत बैंकिंग सेवाओं के लिए कर की दर को 15 से बढ़ाकर 18 फीसदी कर दिया है. माना जा रहा है कि इससे लोग डिजिटल पेमेंट को लेकर बेरुखी अपना सकते हैं और सरकार की इसे बढ़ावा देने की कोशिशों को धक्का लग सकता है.