13 जनवरी, 1897 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में लगभग 6000 अंग्रेजों की भीड़ महात्मा गांधी को पीट-पीटकर मार डालना चाहती थी. वह भीड़ अपने नेता के द्वारा उकसाई गई थी. पहले तो भीड़ ने गांधी पर पत्थर और सड़े हुए अंडे बरसाए. फिर किसी ने उनकी पगड़ी उछाल दी. उसके बाद लात और घूंसों की बौछार शुरू हुई. गांधी लगभग बेहोश होकर गिर चुके थे. तभी किसी अंग्रेज महिला ने ही उनकी ढाल बनकर किसी तरह उनकी जान बचाई. फिर पुलिस की निगरानी में गांधी अपने एक मित्र पारसी रुस्तमजी के घर पहुंच तो गए, लेकिन हजारों की भीड़ ने आकर उस घर को घेर लिया. लोग तीखे शोर में चिल्लाने लगे कि ‘गांधी को हमें सौंप दो’. वे लोग उस घर को आग लगा देना चाहते थे. अब उस घर में महिलाओं और बच्चों समेत करीब 20 लोगों की जान दांव पर लगी थी.

वहां के पुलिस सुपरिण्टेण्डेंट एलेक्ज़ेण्डर गांधी के शुभचिंतक थे, जबकि वे खुद भी एक अंग्रेज थे. उन्होंने भीड़ से गांधी की जान बचाने के लिए एक अनोखी तरकीब अपनाई. उन्होंने गांधी को एक हिन्दुस्तानी सिपाही की वर्दी पहनाकर उनका रूप बदलवा दिया और किसी तरह थाने पहुंचवा दिया. लेकिन दूसरी तरफ भीड़ को बहलाने के लिए वे स्वयं भीड़ से एक हिंसक गाना गवाने लगे. गाने का अनुवाद कुछ इस तरह होगा-

चलो हम गांधी को फांसी पर लटका दें,

इमली के उस पेड़ पर फांसी लटका दें.

इसके बाद जब उन्होंने भीड़ को बताया कि उनका शिकार तो वहां से सुरक्षित निकल भागा है, तो भीड़ में किसी को गुस्सा आया, कोई हंसा, तो बहुतों को उस बात का यकीन ही नहीं हुआ. लेकिन भीड़ के प्रतिनिधि ने घर की तलाशी के बाद जब भीड़ के सामने इस खबर की पुष्टि की, तो निराश होकर और मन-ही-मन कुछ गुस्सा होते हुए वह भीड़ फिर बिखर गई.

गांधी के जीवन से जुड़ी इस सच्ची घटना में दो बातें ध्यान देने की हैं. पहली यह कि उन्हें मारनेवालों की भीड़ भी अंग्रेजों की ही थी और उन्हें बचानेवाले लोग भी अंग्रेज ही थे. दूसरी बात यह कि अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने उन्मत्त भीड़ ही हिंस्र मानसिकता को पहचानते हुए एक मनोवैज्ञानिक की तरह गांधी को फांसी पर लटकाने वाला वह हिंसक गाना गवाया, ताकि हिंसा का वह मवाद मनोरंजक तरीके से उनके दिलो-दिमाग से फूटकर बह निकले.

विडंबना देखिए कि इस घटना के लगभग 22 साल बाद 10 अप्रैल, 1919 को यह खबर फैलने के बाद कि गांधी को गिरफ़्तार कर लिया गया है, अहमदाबाद की एक हिंसक भीड़ ने पूरे शहर में दंगे और आगजनी के दौरान एक अंग्रेज को मार डाला और कई अंग्रेजों को गंभीर रूप से घायल और अपंग कर दिया. भीड़ के गुस्से का तात्कालिक कारण यह अफवाह भी थी कि गांधी के साथ-साथ अनुसूयाबेन को भी गिरफ्तार कर लिया गया है. गांधी ने जब यह सुना तो वे फफक कर रो पड़े थे. जिस गांधी ने अपने साथ डरबन में हुई भीड़ की हिंसा के बाद पुलिस में रिपोर्ट तक लिखाने से इंकार कर दिया था, उसी की गिरफ्तारी पर भारतीयों की हिंसक भीड़ ने किसी निर्दोष अंग्रेज को मार डाला था. इसलिए भीड़ की इस मानसिकता को गांधी ने एकदम तटस्थ तरीके से समझना शुरू किया.

हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, पारसी और सिख से लेकर अंग्रेजों तक के साथ अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक निकटताओं के अनुभव से गांधी ने पाया कि हिंसा और अहिंसा का संबंध किसी समुदायविशेष से नहीं होता. उन्होंने तो इसे शाकाहार और मांसाहार से जोड़ने वाली प्रचलित धारणा को भी चुनौती दी थी. आमतौर पर अहिंसक माने जाने वाले जैनियों के बारे में अक्टूबर 1926 में लिखे अपने एक लेख में उन्होंने कहा था- ‘..जैनियों को कोई अहिंसा का ठेका तो मिला हुआ नहीं है.’

उन्होंने आगे लिखा, ‘अहिंसा किसी एक धर्मपंथ का लक्षण नहीं है. धर्म-मात्र में अहिंसा है. उसका अमल सभी धर्मपंथों में एकसमान रूप से नहीं होता. मुझे ऐसा नहीं लगता कि जैन लोग इस समय दूसरों की अपेक्षा अहिंसा का अधिक पालन करते हैं. जैनों के साथ मेरा संबंध तो इतना पुराना है कि बहुत से लोग मुझे जैन ही मानते हैं. महावीर तो दया की, अहिंसा की मूर्ति थे. मेरी इच्छा उनके भक्तों को भी वैसा ही देखने की है. लेकिन मेरी वह इच्छा सफल नहीं होती.’

गांधीजी ने सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान भी स्वयंसेवकों की हुल्लड़बाजियां देखी थीं. उनकी सभाओं में अनियंत्रित भीड़ द्वारा हंगामा आम बात थी. इसलिए हारकर उन्होंने आठ सितंबर, 1920 को यंग इंडिया में एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था- ‘लोकशाही बनाम भीड़शाही’. उन्होंने लिखा- ‘आज भारत बड़ी तेजी से भीड़शाही की अवस्था से गुजर रहा है. यहां मैंने जिस क्रियाविशेषण का प्रयोग किया है, वह मेरी आशा का परिचायक है. दुर्भाग्यवश ऐसा भी हो सकता है कि हमें इस अवस्था से बहुत धीरे-धीरे छुटकारा मिले. लेकिन बुद्धिमानी इसी में है कि हम हरसंभव उपाय का सहारा लेकर इस अवस्था से जल्दी से जल्दी छुटकारा पा लें.’

हालांकि ये बातें गांधी ने भीड़शाही के अलग संदर्भ में कही थीं. लेकिन इसी लेख में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही थी- ‘मेरे संतोष का कारण यह है कि भीड़ को प्रशिक्षित करने से ज्यादा आसान काम और कोई नहीं है. कारण सिर्फ इतना ही है कि भीड़ विचारशील नहीं होती. वह तो आवेश के अतिरेक में कोई काम कर गुजरती है. और जल्दी ही पश्चाताप भी करने लगती है. अलबत्ता हमारी सुसंगठित सरकार पश्चाताप नहीं करती- जालियांवाला, लाहौर, कसूर, अकालगढ़, रामनगर आदि स्थानों पर किए गए अपने दुष्टतापूर्ण अपराधों के लिए खेद प्रकट नहीं करती. लेकिन गुजरांवाला की पश्चाताप करती हुई भीड़ की आंखों में मैंने आंसू ला दिए हैं. और अन्यत्र भी मैं जहां कहीं गया, वहां अप्रैल के उस घटनापूर्ण महीने में भीड़ में शामिल होकर शरारत करनेवाले (अमृतसर और अहमदाबाद में भीड़ द्वारा दंगा और अंग्रेजों की हत्या करनेवाले) लोगों से मैंने खुलेआम पश्चाताप करवाया है.’

आज भारत में सामाजिक और राजनीतिक संवाद की यह प्रक्रिया शिथिल सी हो गई है. राजनीतिक वर्ग का न केवल वह सामर्थ्य ही क्षीण हो गया लगता है कि वह किसी भीड़ को शांत करा सके या उससे पश्चाताप करवा सके, बल्कि उनमें ऐसी मंशा और इच्छाशक्ति भी शायद नहीं रह गई है. हम एक विचित्र विसंवाद के दौर से गुजर रहे हैं. इस विसंवाद में हमने असभ्यता के औचित्यीकरण के लिए बहाने और उसकी कहानियां गढ़ रखी हैं.

हमारा सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक नेतृत्व यह भूल चुका लगता है कि भीड़ से निपटना केवल पुलिस और सेनामात्र का काम नहीं है. भीड़ की स्थिति उत्पन्न न होने देना सामाजिक और राजनीतिक प्रबोधन का एक दीर्घकालिक उपक्रम है. हम सभी उस उपक्रम के हिस्से हैं. हम इसे भूल चुके लगते हैं, तभी किसी तात्कालिक भीड़ के सामने अपना सारा आत्मविश्वास गंवाकर मूकदर्शक बने रहते हैं. और बाद में भी इसे दुर्घटनामात्र करार देकर आगे ऐसी संभावना न बनने देने का दूरगामी प्रयास नहीं कर पाते.

14 मई, 1931 को किसी ने महात्मा गांधी को एक चिट्ठी लिखी जिसमें अमेरिका में किसी अश्वेत को भीड़ द्वारा जिंदा जला दिए जाने से संबंधित एक अखबारी कतरन भी संलग्न थी. पत्रलेखक ने गांधी से कहा कि जब कोई अमेरिकी अतिथि या भेंटकर्ता आपसे मिलने आए और आपसे अपने देश के लिए संदेश मांगे तो, आप उन्हें यही संदेश दें कि वे अश्वेतों पर होने वाले नरमेध जैसे अत्याचार को बंद करायें. गांधीजी ने इसके जवाब में लिखा- ‘इसको पढ़कर मन अवसाद से भर आता है. ...पर मुझे इस बात में तनिक भी संदेह नहीं है कि अमेरिकी जनता इस बुराई के प्रति पूरी तरह से जागरूक है और अमेरिकी जन-जीवन के इस कलंक को दूर करने की भरसक कोशिश कर रही है.’ आज का अमेरिकी समाज बहुत हद तक उस भीड़-हिंसा से सचमुच मुक्त हो चुका है, जिसका नाम ही लिंच-न्याय अमेरिकी कैप्टन विलियम लिंच की प्रवृत्ति की वजह से पड़ा था.

आज भीड़ की हिंसा की घटनाओं का यदि तटस्थ और बारीक विश्लेषण किया जाए, तो संभवतः हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि इस हिंसा में शामिल व्यक्ति प्रायः अपने-अपने जीवन में अलग-अलग प्रकार की व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त होता है. उसकी कायरतापूर्ण हिंसक प्रवृत्ति का विकास एक लंबी अवधि में हुआ होता है, जिसमें हमारी मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वातावरण के साथ ही अन्य कई कारकों का योगदान होता है.

वह अंतहीन विक्टिमहुड या पीड़ाबोध से ग्रसित लोगों की भीड़ हो सकती है. वह अपनी तमाम समस्याओं के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार मानने की प्रवृत्ति से ग्रसित लोगों की भीड़ हो सकती है. उन्हें अपनी व्यक्तिगत भड़ास निकालने के लिए एक तात्कालिक बहाना चाहिए होता है. उनकी दबी हुई हिंसावृत्ति अनायास ही किसी निरीह की तलाश में होती है और मौका देखते ही वह भीड़ के हिस्से के रूप में अपनी हिंसा की आजमाइश और तुष्टि कर बैठती है. उन्हें पता होता है कि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता. उसमें किसी को पहचाना नहीं जा सकता. कायरतापूर्ण हिंसा को छिपने के लिए भीड़ से बेहतर कोई अवसर नहीं होता.

शायद हमें यह थोड़ा अगंभीर लगे, लेकिन फिल्मों में प्रचलित उस हास्य दृश्य के जरिए भी इसे समझा जा सकता है जिसमें कोई भीड़ किसी व्यक्ति पर टूट पड़ती है और वह व्यक्ति बहुत ही सावधानी से उस भीड़ से फिसलकर बिना चोट खाए अपनी देह झाड़ते हुए निकल भागता है. लेकिन भीड़ में लोग फिर भी बेतहाशा लात-घूंसे चलाते रहते हैं, बिना यह जाने कि उन्हें किसे मारना था और किसे मार रहे हैं. प्रायः भीड़ की मानसिकता ऐसी ही होती है. उसे किसी को भी मारना होता है. उसके औचित्यीकरण के लिए उसके पास केवल एक फौरी बहाना चाहिए होता है. वह भीड़ सभी जाति-धर्मों की मिली-जुली भीड़ भी हो सकती है जिसमें कथित ब्राह्मण और दलित एक साथ हो सकते हैं, हिंदू और मुस्लिम एक साथ भी हो सकते हैं और बिना यह जाने कि उस भीड़ का शिकार व्यक्ति किस जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा का है.

किसी महिला को डायन घोषित कर पीट-पीटकर मार डालनेवाली भीड़ ऐसी ही होती है. चोर-पॉकेटमारों को पीट-पीटकर मार डालनेवाली भीड़ की संरचना भी प्रायः ऐसी ही होती है. स्थानीय अखबारों या पुलिसिया रिकॉर्ड को खंगालें तो पाएंगे कि केवल इसी वर्ष बिहार और झारखंड में डायन घोषित कर भीड़ द्वारा मार डाली जानेवाली महिलाओं की संख्या बहुत अधिक होगी.

हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे समाज में सांप्रदायिकता का फैलता जहर एक सच्चाई है. और वह किसी अनियोजित भीड़ के तात्कालिक उकसावे का कारण हो सकती है. भीड़ को एक अवसर चाहिए, बहाना चाहिए. संभव है कि जिसने अपने जीवन में एक मच्छर या चींटी भी न मारा हो, वह भी भीड़ का हिस्सा बनकर खूंखार हो जाए और मानवहत्या जैसे जघन्य कार्य को अंजाम दे दे.

सांप्रदायिकता, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह, ज़ेनोफोबिया, आत्महीनता, ऐतिहासिक पीड़ाबोध की मिथ्या चेतना, किसी भी प्रकार की कट्टरता, निजी जीवन की विफलताएं इत्यादि कुछ मौलिक कारण होते हैं, जो कमोबेश हर जाति और संप्रदाय के लोगों में पाए जाते हैं. लेकिन जिन समाजों ने मानवीय मूल्यों से भरी शिक्षा, सामाजिक प्रबोधन, आर्थिक अवसरों और राजनीतिक परिपक्वता को जितना अधिक हासिल किया है, वहां भीड़-हिंसा की प्रवृत्ति कम देखी जाती है. हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा उनके लिए भी एक आध्यात्मिक चुनौती बनी ही हुई है. राज्य-व्यवस्थाओं द्वारा संगठित हिंसा के रूप में युद्ध अभी भी इन समाजों ने जारी ही रखा हुआ है.

समकालीन चिंतकों और दार्शनिकों को आज ऐसा महसूस हो रहा है कि मानव समाज के तौर पर हम मनुष्यों में क्रोध बढ़ रहा है. एक ने तो इसे ‘क्रोध का युग’ करार दिया है. हालांकि आंकड़ापरक दृष्टि से इसे समझने-समझाने की कोशिश नाकाफ़ी ही होगी. मानव इतिहास हमेशा ही युद्धों से रक्तरंजित इतिहास रहा है. यह एक अंतर्विरोधों से भरी धारणा है कि ज्यों-ज्यों हम आज की परिभाषा वाले ‘सभ्य’ और ‘वैज्ञानिक’ हो रहे हैं, त्यों-त्यों हम अपने व्यवहार में अहिंसक हो रहे हैं. इसलिए भीड़ के बर्बर और ‘असभ्य’ होने की बात तो की जाती है, लेकिन महाविनाशकारी हथियारों की होड़, मजबूरों के विस्थापन और सेनाओं के बीच युद्धों को ‘असभ्य’ नहीं माना जाता.

लोभ, वासना, क्रोध, हिंसा, अहंकार और ईर्ष्या जैसे तत्व हम मनुष्यों के जीवन में हमेशा से मौजूद रहे हैं. बल्कि दुनियाभर में आध्यात्म विज्ञान के चिंतन के केंद्र में यही रहा है कि हम कैसे इन दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पाएं. इसलिए रामीन जहांबेगलू जैसे अहिंसा के समकालीन दार्शनिकों ने पाया है कि हिंसा चाहे भीड़ की हो या किसी चरमपंथी संगठन की या फिर सेनाओं के माध्यम से राष्ट्रों की, यह कहीं न कहीं एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समस्या भी है, जिसके निदान के लिए हमें गांधी और टैगोर जैसों की बात गौर से सुनने-समझने की जरूरत होगी. उनके विचार से न तो ‘आक्रामक सेकुलरवाद’ इससे निपटने में सक्षम है, और न प्रतिक्रियावादी नास्तिकता ही.

बल्कि संगठित धर्मपंथों के नाम पर परस्परद्वेषी संप्रदायों में बंटकर मानवजाति आज जहां पर खड़ी है, उसमें उसका प्रबोधन चरणशः ही हो सकता है. सर्वधर्मसद्भाव, सकारात्मक सेकुलरवाद, उदार आस्तिकता और उदार नास्तिकता के साथ-साथ सर्वसमावेशी आध्यात्म और अहिंसा का विज्ञान ही इसमें हमारी मदद कर सकता है. निस्संदेह मानव समाज आज एक होने की ओर बढ़ रहा है. पुरानी रुढ़ियां टूट रही हैं. लेकिन हज़ारों वर्षों के कुसंस्कार जाते-जाते ही जाएंगे इसलिए भीड़ को देखने-समझने का एक तटस्थ, मानवीय और वास्तविक वैज्ञानिक नज़रिया भी हमें विकसित करना होगा. संभवतः तभी हम उसके दूरगामी प्रबोधन के उपक्रम का सक्रिय हिस्सा बन पाएंगे.