नशीली दवाओं या ड्रग्स के विरोध का अंतर्राष्ट्रीय दिवस कब होता है? यह शायद हम में से बहुत कम लोगों को पता होगा. लेकिन अरुणाचल प्रदेश के तिराप जिले में बहुत कम लोग होंगे जिन्हें यह पता न हो. दरअसल अब इस जिले में हर साल 26 जून (नशीली दवाओं के विरोध का अंतर्राष्ट्रीय दिवस) इतने जोर-शोर से मनाया जाता है कि किसी भी व्यक्ति के लिए इसकी अनदेखी करना मुश्किल है. इस दिन तिराप में कई कार्यक्रम होते हैं जिनकी तैयारियां काफी पहले शुरू हो जाती हैं. इनकी अगुवाई असम राइफल्स करता है. जिले में बड़े पैमाने पर रैलियां निकाली जाती है. युवाओं व बच्चों के कार्यक्रम होते हैं और कई प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं. इस पूरे आयोजन का एक ही मकसद है. लोगों को नशे, खासकर अफीम के नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना.
पिछले साल सेटेलाइट इमेज से पता चला था कि अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती आठ जिलों में बड़े पैमाने पर अफीम की फसल लहलहा रही है

अभी तक पंजाब के बारे में माना जाता है यहां ड्रग्स की लत के चलते युवाओं की एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो चुकी है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पिछले दो साल के दौरान ड्रग्स के इस्तेमाल और कारोबार से जुड़े कानून के तहत पूरे देश में जितने मामले दर्ज हुए, तकरीबन आधे पंजाब से ही हैं. राज्य में पाकिस्तान की सीमा की तरफ पड़ने वाले जिलों - बठिंडा, मोगा, अमृतसर और तरनतारन - में यह समस्या खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि अफीम की अवैध खेती के चलते कुछ सालों के बाद पूर्वोत्तर का सबसे शांत राज्य अरुणाचल प्रदेश इससे भी बड़ी श्रेणी में आ सकता है. इसकी वजह यह है कि यह अवैध अफीम का बहुत बड़ा उत्पादक भी है.

नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के हालिया आंकड़ों के अनुसार 2014-15 के दौरान पूरे देश में 2,530 एकड़ में अफीम की अवैध फसल नष्ट की गई है. लेकिन इसमें से 1067 एकड़ फसल अकेले अरुणाचल प्रदेश की थी. इसका मतलब है कि अफीम की अवैध खेती का 40 फीसदी हिस्सा अकेले अरुणाचल प्रदेश में उगाया जा रहा था. यह आंकड़ा हाल ही उजागर हुआ है और इसके बाद से सुरक्षा एजेंसियों से लेकर सामाजिक संगठन तक सकते में हैं.

अरुणाचल प्रदेश में अफीम की अवैध खेती और लोगों के बीच बढ़ती नशे की लत पर विशेषज्ञ कुछ सालों से लगातार चेतावनी दे रहे हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ नार्कोटिक्स स्टडी एंड एनालिसिस (इंसा) ने 2010 में पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के अंजा और लोहित जिले में एक व्यापक सर्वे किया था. इंसा ने पाया था कि यहां सैकड़ों एकड़ में अफीम की अवैध खेती हो रही है. यही नहीं इन जिलों की एक बड़ी आबादी नशे की गिरफ्त में थी. इंसा के पूर्व अध्यक्ष रोमेश भट्टाचारजी एक मीडिया रिपोर्ट में कहते हैं, ‘सिर्फ इन दो जिलों में उस समय 16,441 हेक्टेयर पर अफीम की खेती हो रही थी. यह प्रदेश अफीम में गुम होता जा रहा है.’ भट्टाचारजी देश के नार्कोटिक्स कमिश्नर भी रह चुके हैं.

सुरक्षा एजेंसियां इसलिए चिंतित हैं कि अरुणाचल प्रदेश दुनियाभर में ड्रग्स के कारोबार के लिए कुख्यात ‘गोल्डन ट्राइंगल’- म्यांमार, लाओ (लाओ पीडीआर), और थाइलैंड के नजदीक पड़ता है

 अरुणाचल प्रदेश में हो रही अफीम की खेती पर सरकार पहली बार तब चौकन्नी हुई जब पिछले साल सेटेलाइट इमेज से पता चला कि प्रदेश के सीमावर्ती आठ जिलों में बड़े पैमाने पर अफीम की फसल लहलहा रही है. ये तस्वीरें एनसीबी के अनुरोध पर सिकंदराबाद में स्थित इसरो के सहयोगी संगठन एडवान्स्ड डेटा रिसर्च इंस्टिट्यूट (एड्रिन) ने उपलब्ध करवाई थीं. इसके बाद गृहमंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश और असम सरकार को इस समस्या से निपटने के निर्देश जारी किए. हालांकि एनसीबी के ताजा आंकड़े अरुणाचल प्रदेश में अफीम की अवैध खेती की जो तस्वीर पेश कर रहे हैं उसके मुताबिक प्रदेश का शासन-प्रशासन इस मोर्चे पर प्रभावी कार्रवाई करने में सफल नहीं हो पाया है. एनसीबी के मुताबिक प्रदेश में लोहित और अंजा जिले के साथ ही तिराप, चेंगलांग, लोंगडिंग और अपर सियांग में बड़े पैमाने पर अफीम की अवैध खेती हो रही है.

एनसीबी की राय है कि अवैध अफीम से जुड़े ये आंकड़े इस गैरकानूनी गतिविधि का एक छोटा सा हिस्साभर है. इन आंकड़ों में अरुणाचल प्रदेश के दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र शामिल नहीं हैं. एनसीबी के अधिकारी बताते हैं कि दूरदराज के क्षेत्रों में जब उनकी टीम सर्वे करने पहुंची तो उन पर हमले किए गए. एक अधिकारी कहते हैं, ‘सुरक्षा चिंताओं के चलते ग्रामीण क्षेत्रों से हमें बिना निरीक्षण के ही लौटना पड़ा.’ वे साथ में यह भी जानकारी देते हैं कि नागा विद्रोहियों के गुट अरुणाचल प्रदेश में अफीम की खेती को संरक्षण दे रहे हैं और सरकारी टीमों पर हमले के पीछे भी यही हैं.

पूर्वोत्तर के इस सबसे शांत राज्य में हो रही अफीम की अवैध खेती ने सुरक्षा एजेंसियों को भी चिंता में डाल दिया है. दरअसल अरुणाचल प्रदेश दुनियाभर में ड्रग्स के कारोबार के लिए कुख्यात ‘गोल्डन ट्राइंगल’- म्यांमार, लाओ (लाओ पीडीआर), और थाइलैंड के नजदीक पड़ता है. इसलिए स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक प्रदेश में अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया की गतिविधियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं.

नागा विद्रोहियों के गुट अरुणाचल प्रदेश में अफीम की खेती को संरक्षण दे रहे हैं. अफीम की खेती का सर्वे करने वाली सरकारी टीमों पर वे हमले भी कर चुके हैं

 ड्रग्स के कारोबार से जुड़ा एक बड़ा ही सामान्य तथ्य है कि अफीम जहां पैदा होती है, उसके नजदीक ही किसी जगह पर उससे हेरोइन व अन्य घातक ड्रग्स बनाए जाते हैं और फिर उनको दुनिया के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता है. एनसीबी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि भारत में हेरोइन या दूसरी ड्रग्स बनाने का काम लगभग न के बराबर है. इसका मतलब हुआ कि यदि अरुणाचल में अफीम इतने बड़े स्तर पर उगाई जा रही है तो निश्चित रूप से वह म्यांमार की उन इकाइयों में जा रही होगी जहां अफीम से हेरोइन व दूसरे ड्रग्स का निर्माण किया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग एंड क्राइम (यूएनओडीसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक गोल्डन ट्राइंगल के अंतर्गत आने वाले म्यांमार और लाओ अफीम के बड़े उत्पादक हैं और इन देशों में इसकी खेती लगातार बढ़ रही है. रिपोर्ट बताती है कि 2013 में दोनों देशों में तकरीबन 61 हजार हेक्टेयर में अफीम की फसल लगाई गई थी. यह रकबा पिछले साल बढ़कर लगभग 64 हजार हेक्टेयर हो गया. यूएनओडीसी का अनुमान है कि पिछले साल यहां अफीम से 76 टन हेरोइन का निर्माण भी किया गया था.

अफगानिस्तान हो या अफ्रीका, नशे के कारोबार से जुड़ा एक और सर्वमान्य तथ्य है कि आतंकवादी संगठन इस कारोबार के सबसे बड़े संरक्षक होते हैं. यही उनकी आय का सबसे बड़ा स्रोत होता है. पिछले दिनों ही नागालैंड के सबसे ताकतवर विद्रोही गुट एनएससीएन (के) ने भारत सरकार के साथ संघर्ष विराम तोड़ा है. इसके नेता एसएस खापलांग म्यांमार में भारतीय सीमा से सटे इलाकों में अपना स्वायत्त शासन चलाते हैं. मीडिया में आई खबरों की मानें तो यह विद्रोही संगठन पूर्वोत्तर के बाकी सरकार विरोधी संगठनों के लिए भी सबसे बड़ा मददगार बना हुआ है. जैसा कि एनसीबी के अधिकारियों का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश में हो रही अफीम की अवैध खेती को धन के लिए नागा विद्रोही संरक्षण दे रहे हैं. और इस धन का इस्तेमाल दूसरे विद्रोही संगठनों को मदद करने और उनसे संबंध बनाने में कर रहे हैं. ऐसे में ड्रग्स का कारोबार रोके बिना उत्तर-पूर्व के राज्यों में विद्रोही गतिविधियों को रोक पाना काफी मुश्किल साबित हो सकता है.

'युवाओं को अब अफीम में मजा नहीं आता. उन्हें और तगड़ा नशा चाहिए. ड्रग्स के लिए कुख्यात आठ जिलों को तो छोड़ ही दीजिए अब पूरे अरुणाचल में यह महामारी पैर पसार रही है’

 खतरा सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का नहीं है. यहां लोगों में अफीम की लत का यह आलम है कि प्रदेश के आठों अफीम उत्पादक जिलों में अब नशा मुक्ति शिविर आए दिन आयोजित किए जाते हैं. हालांकि सरकार के पास इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि अरुणाचल प्रदेश में कुल कितने ड्रग के लती हैं लेकिन जिस स्तर पर यहां नशा-मुक्ति कार्यक्रम चलाया जाता है उसे देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है यह प्रदेश की एक बड़ी समस्या है.

तिराप जिले के सूचना अधिकारी देन्हांग बोसाई अपने एक आलेख में बताते हैं, ‘अभी तक ड्रग्स की समस्या से अछूते रहे हमारे प्रदेश में कई युवाओं को अब अफीम में मजा नहीं आता. उन्हें और तगड़ा नशा चाहिए. ड्रग्स के लिए कुख्यात आठ जिलों को तो छोड़ ही दीजिए अब पूरे अरुणाचल में यह महामारी पैर पसार रही है.’

कुछ यही बात रोमेश भट्टाचारजी भी कहते हैं, ‘प्रदेश के वर्तमान हालात आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए तो खतरा हैं ही, यहां के समाज के लिए भी एक अभिशाप बन सकते हैं. दुर्भाग्य से इन्हें सुधारने के लिए कुछ नहीं हो रहा है. यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले सालों में स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाएंगी.’

भारत में अरुणाचल प्रदेश की सबसे ज्यादा चर्चा चीन के संदर्भ में होती है. चीन के हिसाब से यह उसका हिस्सा है. लेकिन उत्तर-पूर्व का यह सबसे शांत प्रदेश अफीम की अवैध खेती और ड्रग्स के चंगुल में जिस तरह फंसता जा रहा है वह इस प्रदेश के लिए ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर-पूर्वी भारत और उससे बाहर भी एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है.