राष्ट्रपति चुनाव को विपक्ष के लिए एकजुटता दिखाने के एक अवसर के तौर पर देखा जा रहा था. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. बल्कि देश के सबसे बड़े पद का यह चुनाव विपक्ष के बिखराव का प्रतीक बनकर रह गया. इससे लोगों में यह संदेश भी गया कि अगले लोकसभा चुनाव में दो साल से भी कम का वक्त बचने के बावजूद अब तक विपक्ष एक मंच पर आ पाने में नाकाम रहा है.

यहीं से विपक्ष के लिए उस चुनौती का आभास होता है जिसकी ओर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इशारा किया था. जिस दिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए थे, उस दिन अब्दुल्ला ने कहा था कि विपक्ष को 2019 की नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी करनी चाहिए. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष के बिखर जाने के बाद अब यही बात किसी और वजह से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कह रहे हैं.

नीतीश द्वारा भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन दिए जाने पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने उन्हें भला-बुरा कहा. इस पर नीतीश का जवाब आया कि अगर कांग्रेस को इसी अंदाज में विपक्ष को एकजुट करना है तो फिर 2019 भूल जाना चाहिए. कहा जा रहा है कि नीतीश इस बात से आहत हैं कि जब विपक्षी दलों की बैठकों में तय हुआ था कि उम्मीदवार कोई गैर कांग्रेसी व्यक्ति होगा तो फिर कांग्रेस इससे पीछे क्यों हटी.

रामनाथ कोविंद को समर्थन तो उन्होंने काफी बाद में दिया, लेकिन उसके पहले ही राष्ट्रपति पद के विपक्षी उम्मीदवार को लेकर नीतीश कुमार और कांग्रेस में अंतर दिखने लगा था

राष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार देने की पहल नीतीश कुमार ने ही की थी. कई शुरुआती बैठकों में वे शामिल भी रहे. उनकी सलाह यह थी कि किसी गैर कांग्रेसी व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए. गोपाल कृष्ण गांधी का नाम इसी प्रक्रिया के तहत आया था. विपक्ष में कांग्रेस के दूसरे सहयोगी दल भी यही चाह रहे थे. गैर राजनीतिक व्यक्ति होने से किसी भी दल के लिए यह दावा कर पाना संभव नहीं होता कि वे उनके उम्मीदवार हैं.

नीतीश की ही पार्टी के एक नेता बताते हैं कि कांग्रेस इसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थी. वह घुमा-फिराकर अपनी ही पार्टी के किसी नेता को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की बात ला रही थी. यही वजह थी कि नीतीश कुमार ने इस प्रक्रिया से दूरी बनाना शुरू किया. रामनाथ कोविंद को समर्थन तो उन्होंने काफी बाद में दिया, लेकिन उसके पहले ही राष्ट्रपति पद के विपक्षी उम्मीदवार को लेकर नीतीश कुमार और कांग्रेस में अंतर दिखने लगा था.

इस नेता का यह भी कहना था कि विपक्ष के बिखराव के लिए कांग्रेस के साथ दूसरे सहयोगी दल भी जिम्मेदार हैं. उन्होंने कहा, ‘जब यह बात तय हो गई थी कि कोई गैर कांग्रेसी ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार होगा तो फिर जिस बैठक में ​मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया गया तो उसमें दूसरे दलों ने विरोध क्यों नहीं किया?’ इस नेता का कहना था कि नीतीश ऐसे किसी गठबंधन में शामिल नहीं होंगे जिसमें उनकी बात सुनी ही नहीं जाई और एक ही पार्टी अपनी बात थोपे.

दरअसल, नीतीश कुमार ने भी दूसरे शब्दों में यही कहने की कोशिश की है कि अभी जिस तरह की राजनीतिक स्थिति है, उसमें कांग्रेस को सहयोगी दलों के साथ बराबरी का बर्ताव करते हुए उन पर अपना रुख थोपने से बचना चाहिए. अब तक ऐसे किसी गठबंधन में यही दिखा है कि राष्ट्रीय दल अपनी बात क्षेत्रीय दलों पर थोपता आया है. लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अब परिस्थिति अलग है. जिस जदयू नेता का जिक्र पहले किया गया है, वे कहते हैं, ‘विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की भारतीय जनता पार्टी बनना चाह रही है. यह न तो हमें मंजूर है और न ही किसी दूसरे विपक्षी दल को. हमारे नेता ने साफ कर दिया है कि हम पिछलग्गू बनकर किसी के साथ नहीं काम करेंगे.’

सच्चाई यह है कि अब तक विपक्ष एक एजेंडा तक नहीं बना पाया है. कोई भी मुद्दा आता है तो उस पर क्या स्टैंड लेना है, यह पता ही नहीं चलता. जीएसटी सबसे ताजा उदाहरण है  

इसी सोच को दिखाते हुए जीएसटी पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस से अलग लाइन ली. जानकारों के मुताबिक यह भी कांग्रेस पर दबाव बनाने की एक राजनीति है. कांग्रेस ने जीएसटी पर संसद के विशेष सत्र का बहिष्कार किया, लेकिन नीतीश की जदयू, पवार की राकांपा और मुलायम की सपा ने इसमें हिस्सा लिया. माना जा रहा है कि ये क्षत्रप कांग्रेस को उस स्थिति में लाने की कोशिश कर रहे हैं जहां विपक्षी गठबंधन में उसकी भूमिका बड़े भाई वाली नहीं बल्कि बराबरी वाली रहे और जहां निर्णय सामूहिक तौर पर लिए जाएं.

जो भी राजनीति की समझ रखते हैं, वे कहते हैं कि सामूहिक निर्णय और स्पष्ट एजेंडे से ही बात बनेगी. सच्चाई यह है कि अब तक विपक्ष एक एजेंडा तक नहीं बना पाया है. कोई भी मुद्दा आता है तो उस पर क्या स्टैंड लेना है, यह पता ही नहीं चलता. जीएसटी सबसे ताजा उदाहरण है. विपक्ष के कुछ दल विरोध कर रहे हैं तो कुछ समर्थन. ऐसा ही नोटबंदी के मसले पर हुआ था.

जानकारों के मुताबिक ऐसे में नीतीश कुमार ठीक ही कह रहे हैं कि विपक्ष प्रतिक्रियावादी होकर आगे की लड़ाई नहीं लड़ सकता बल्कि उसे लोगों के सामने एक वैकल्पिक एजेंडा सेट करना होगा. लेकिन ऐसा करने के लिए अंतर्विरोधों से भरे विपक्ष में बराबरी का भाव विकसित करना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके बगैर सामूहिक निर्णय और स्पष्ट एजेंडा तैयार नहीं हो सकता. ऐसे में दो साल से भी कम की दूरी पर खड़े अगले आम चुनावों के लिहाज से कम से कम अभी तो विपक्ष की चुनौती बहुत बिखरी हुई दिख रही है.