हाल के दिनों में भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले काफी ऊंची छलांग लगाई है. बीते हफ्ते पिछले साल उसी सप्ताह के मुकाबले रुपये में 4.18 प्रतिशत की मजबूती आई है. सात जुलाई 2016 को एक डॉलर 67.49 रुपये का था जो अब घटकर 64.61 रुपये पर आ गया है. जनवरी 2017 से लेकर अब तक रुपये में 4.36 प्रतिशत की मजबूती आ चुकी है.

भारतीय रुपये का मज़बूत होना इस हफ्ते भी जारी है तो उसके पीछे कई कारण हैं. इन्हें सिलसिलेवार तरीक़े से समझने की कोशिश करते हैं.

बढ़ता सकल घरेलू उत्पाद और कम होता वित्तीय घाटा

भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले कुछ साल से लगातार बढ़ रहा है. 2013 में इसमें वृद्धि की दर 5.5 फीसदी रही थी जो मार्च 2017 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में 7.1 फीसदी रही. विश्व बैंक के मुताबिक आने वाले दो वर्षों में इसके 7.2 और 7.7 रहने की संभावना है. वहीं वित्तीय घाटे के लिए 2013 और 2017 का आंकड़ा क्रमश: 4.9 और 3.2 फीसदी रहा. इन आंकड़ों से देश की अर्थव्यवस्था का चेहरा एकदम साफ़ हो जाता है. जहां सकल घरेलू उत्पाद साल दर साल बढ़ रहा है, वहीं वित्तीय घाटा कम हो रहा है. इन दोनों में जितना ज्यादा अंतर होगा, अर्थव्यवस्था उतनी ही मजबूत होगी.

पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने चालू वित्तीय घाटे को कम करने की जो पहल की थी वह अब रंग लाने लगी है. सरकारें अब इस पर कड़ी नज़र रख रही हैं. हालांकि केंद्र सरकार तो इस पैमाने पर खरी नज़र आती है लेकिन राज्य सरकारें भटक रही हैं. इसीलिए कुछ दिन पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि किसानों की कर्ज माफी राज्य सरकारें अपने बजट से करें और इसमें केंद्र कोई सहायता नहीं देगा.

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छलांग

पिछले तीन वर्षों में सरकार ने एफ़डीआई के लगभग 87 नियमों में सकारात्मक बदलाव किये हैं जिससे 21 नए क्षेत्रों में विदेशी निवेश बढ़ा है. आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2016 में देश में विदेशी निवेश बढ़कर तीन लाख 88 हज़ार करोड़ रु हो गया है जो कि पिछले वर्ष के मुकाबले आठ प्रतिशत ज्यादा है. सरकार का इस वर्ष का लक्ष्य इसमें कम से कम दो प्रतिशत की बढ़ोतरी का है. मोदी सरकार ने रेल, प्रतिरक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र भी विदेशी निवेश के लिए खोलकर अर्थव्यस्वस्था और नौकरियों को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया है. खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में भी 100 फीसदी एफ़डीआई की मंज़ूरी इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है.

घटती मुद्रास्फीति

बीते कुछ वर्षों में मुद्रास्फीति की दर में भी कमी देखी गयी है. पिछले तीन सालों में यह 10.2 से घटकर 4.5 फीसदी पर आ गयी है. सरकार इस पैमाने पर भी लक्ष्य के करीब ही नज़र आ रही है. मुद्रास्फीति की दर अगर कम होती है तो इसका मतलब है कि रुपये की वस्तु खरीदने की ताकत बढ़ गयी है. दूसरे शब्दों में मंहगाई कम हुई है.

सरकारी प्रतिभूति की गिरती दरें

ब्लूमबर्ग द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी बांड्स या प्रतिभूति की दरें गिरकर 6.474 फीसदी पर आ गयी हैं. यह आंकड़ा पहले 6.532 फीसदी था. इसको आप ऐसे समझें कि सरकार निवेश के लिए अपनी प्रतिभूतियां जारी करती है जिसे संस्थागत निवेशक एक निश्चित दर पर खरीदते हैं. अगर अर्थव्यवस्था का माहौल ठीक न हो तो इसका मतलब है कि उस देश में निवेश में कुछ ख़तरे हो सकते हैं. इस वजह से प्रतिभूतियों की दरें ऊंची हो जाती हैं. वहीं अगर देश में स्थायित्व है और अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश बढ़ रहा है तो इसका मतलब यह हुआ कि वहां निवेश सुरक्षित है. लिहाज़ा दर कम हो जाती है. सरकारी बांड और रुपये की चाल एक-दूसरे के विपरीत होती है. इस समय प्रतिभूतियों की दरें घट रहीं हैं और रुपया डॉलर के मुकाबले मज़बूत होता जा रहा है.

घटता रेपो रेट

रेपो रेट यानी वह ब्याज दर जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को पैसा उधार देता है. बैंकों को अपने रोज के काम लिए अक्सर बड़ी रकम की जरूरत होती है. तब बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेने का विकल्प अपनाते हैं जिसकी मियाद एक दिन की होती है. इस कर्ज पर रिजर्व बैंक जो ब्याज वसूलता है उसे ही रेपो रेट कहते हैं. रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है और तब ही बैंक ब्याज दरों में भी कमी करते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा कर्ज आगे दिया जा सके. जैसे हाल में होम लोन की ब्याज दरें लगातार घटी हैं. रिजर्व बैंक जब भी रेपो रेट में कमी करता है रुपये में मजबूती दर्ज की जाती है.

ऐसा नहीं है कि रुपये का डॉलर के मुकाबले मज़बूत होना सिर्फ फायदेमंद ही है. इसके कुछ नुकसान भी हैं. मज़बूत रुपये से निर्यात घट सकता है और आयात बढ़ सकता है. निर्यात और आयात की कमाई का अंतर ही देश की तरक्की निर्धारित करने में बड़ा कारक होता है.

पर जानकारों की मानें तो अभी फिलहाल इसकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि देश का सबसे बड़ा खर्च तेल के आयात में होता है. बीते कुछ समय के दौरान इसकी कीमतें कम होती जा रही हैं इसलिए यह खर्च घटने लगा है. जानकारों के मुताबिक़ वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अभी और भी घटेंगी.

इन सब कारकों का एक असर यह भी है कि सेंसेक्स नयी ऊंचाइयों को छू रहा है. आज रुपया फिर डॉलर के मुकाबले सात पैसे मज़बूत हुआ है और सेंसेक्स और निफ्टी उछल कर 31800 और 9800 पार कर गए हैं. अच्छा मानसून सोने पर सुहागा साबित होगा!

पाकिस्तान की गिरती हुई अर्थव्यस्वस्था

उधर पांच जुलाई, 2017 को पाकिस्तानी रुपया पिछले नौ साल के इतिहास में डॉलर के मुकाबले लगभग तीन प्रतिशत टूटकर 108.1 पर आ गिरा. अगले दिन पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने हस्तक्षेप करके इसे संभाला और दिन ख़त्म होते-होते ये 105 रुपये प्रति डॉलर पर आकर बंद हुआ.

पाकिस्तान में हालात कुछ उलट हैं. उसने निर्यात बढ़ाने के लिए अपने रुपये की कीमत को गिराया है. पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि उसे निर्यात बढ़ाना होगा जिससे उसके सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी आ सके. 2006 में पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद 2005 के मुकाबले 5.5 फीसदी की दर से बढ़ा था. फिर यह दर साल दर साल गिरती चली गयी और एक समय ऐसा भी आया जब 2009 में यह मात्र 0.8 फीसदी ही थी. हाल के कुछ वर्षों में भी हालत कुछ खास बेहतर नहीं हुए हैं. हालांकि अब यह दर लगभग पांच फीसदी के आसपास है पर जानकार मानते हैं कि बढती जनसंख्या के हिसाब से यह काफी कम है.

आंकड़ों के हिसाब से पाकिस्तान बमुश्किल 20 देशों को निर्यात करता है और उसमें भी चावल और आम जैसे कुछ खाद्य पदार्थ ही शामिल हैं. उसका निर्यात का दायरा अभी बहुत सीमित है. मुश्किल हालात की वजह से वहां पर्यटन भी कुछ कम ही हो रहा है. उधर, अमेरिका भी उससे अब हाथ खींचता जा रहा है जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक है.

उधर, भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को ‘डाइवरसिफाय’ किया है. यानी नए क्षेत्रों में पहल की है. भारत अब इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और गाड़ियां भी निर्यात कर रहा है जो पहले आयत की वस्तुएं होती थीं. भारत की ताकत में इज़ाफा उसके मानव संसाधनों के चलते भी हो रहा है जो इन नए क्षेत्रों में काम करने के लिए हर लिहाज से काबिल है. हाल ही में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसके मुताबिक़ 2025 तक भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती देखी जायेगी और यह लगभग 7.7 फीसदी की दर से आगे बढ़ेगी.

कुल मिलाकर यह अजीब इत्तेफाक ही कहा जाएगा एक दुसरे के धुर विरोधी और हमेशा उलटी दिशा में चलने वाले दोनों मुल्कों की मुद्रा भी अब अब एक-दूसरे के विपरीत चल रही है.