इन दिनों यह चर्चा आम है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिमों के तुष्टिकरण में लगी हैं. इसके लिए उन्हें निशाने पर भी लिया जा रहा है. कुछ मायनों में उनकी यह आलोचना सही भी लगती है. लेकिन इसके बारे में पूरी तरह किसी राय पर पहुंचने से पहले ममता बनर्जी के राजनीति के दो अलग-अलग पहलुओं को समझना ज़्यादा बेहतर होगा. उनकी राजनीति का एक पहलू अगर मुस्लिम तुष्टिकरण से जुड़ता है तो इस समुदाय के सशक्तिकरण के नज़दीक भी पहुंचता है. और कहने की ज़रूरत नहीं है कि तुष्टिकरण और सशक्तिकरण में फर्क होता है.
मसलन इमामों को हर महीने मिलने वाले पारिश्रमिक में बढ़ोत्तरी के फैसले को निश्चित रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण के तहत रखा जा सकता है. लेकिन मुस्लिम छात्रों को छात्रवृत्ति देना या इस समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करना सशक्तिकरण की कोशिशों के तहत आता है. साल 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट में भी ऐसे सकारात्मक कदमों की सिफारिश की गई थी. यहां बताते चलें कि उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम सबसे ग़रीब हैं. ऐसे में उनके लिए इस तरह के उपायों की अहमियत ज़्यादा हो जाती है.
बंगाल में फैली ताज़ा हिंसा के बाद यह भी कहा जा रहा है कि वहां सरकार के समर्थन से कट्टरपंथी मुस्लिमों का हौसला बढ़ा हुआ है. ऐसे में मुस्लिम तुष्टिकरण और सशक्तिकरण के बीच फर्क करना और ज़्यादा प्रासंगिक हो जाता है. इस फर्क को बेहतर ढंग से समझने के लिए अभी हाल में ही प्रकाशित एक रिपोर्ट के कुछ निष्कर्षाें पर ग़ौर किया जा सकता है. इस रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘लिविंग रियलिटी ऑफ मुस्लिम्स इन वेस्ट बंगाल.’ इले सोशल नेटवर्क फॉर असिस्टेंस टु पीपुल, गाइडेंस गिल्ड और अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के प्रतीची ट्रस्ट ने तैयार किया है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल के 80 फीसदी मुस्लिम परिवार हर महीने 5,000 रुपए या उससे भी कुछ कम की आमदनी पर गुजारा कर रहे हैं. यानी ग़रीबी रेखा से थोड़ा सा ही ऊपर. यही नहीं इनमें भी करीब 38 फीसद ऐसे हैं जिनकी महीने की आय 2,500 रुपए से भी कम है. यहां के मुस्लिमों में साक्षरता का प्रतिशत 68.3 फीसदी है. यह राज्य की साक्षरता दर से चार प्रतिशत कम है. राज्य में मुस्लिमों की आबादी 27 फीसदी है. लेकिन सार्वजनिक सेवा क्षेत्र में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ 1.55 फीसद ही है. ऐसे ही स्कूल शिक्षण के क्षेत्र में उनकी सिर्फ 1.55 प्रतिशत भागीदारी है.
हालांकि कृषि के क्षेत्र में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व अच्छा कहा जा सकता है. यह 47 प्रतिशत के करीब है. साल 2011 में सत्ता संभालने के बाद ममता सरकार ने मुस्लिमों की दशा पर ध्यान दिया. उन्होंने मुस्लिम समुदाय के बच्चों को छात्रवृत्तियां बांटीं. मुस्लिम अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान- अलियाह यूनिवर्सिटी को पर्याप्त वित्तीय मदद मुहैया कराई. मुस्लिमों को ओबीसी की सूची में शामिल किया. एक विश्वविद्यालय का नामकरण बंगाल के जाने-माने कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम के नाम पर किया. उनके काम से संबंधित शोधकार्य भी शुरू कराया. सबसे बड़ी बात, सरकार मुस्लिमों के बीच यह अहसास मज़बूत करने में सफल रही कि वे भी सरकारी विकास योजनाओं के लक्ष्य में हो सकते हैं, राज्य के विकास में साझीदार हो सकते हैं.
लेकिन यह मुश्किल वक़्त
ऐसे में बंगाल में ज़ारी मौज़ूदा हिंसा को संदर्भों के साथ जोड़ने की ज़रूरत है. बंगाल में जब वाम दलों के शासन का आख़िरी दौर था उसी वक़्त (2006 में) सच्चर समिति की रिपोर्ट पेश की गई. उस वक़्त राज्य के मुस्लिम अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से खिन्न थे. शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी नौकरी, पीने के पानी और बिजली की उपलब्धता के मामले में वे काफी पीछे थे. लेकिन उन्होंने अपने लिए नौकरी या ये तमाम सुविधाएं मांगने के लिए धरना-प्रदर्शन नहीं किए. बल्कि उनकी खिन्नता दंगों की शक्ल में बाहर निकली क्योंकि बंगाल के तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने उन्हें यही दिशा दी थी.
उदाहरण के लिए 2007 में कोलकाता में ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम के बैनर के तहत किए प्रदर्शन के दौरान भारी तोड़-फोड़ हुई. और ये प्रदर्शनकारी मांग क्या कर रहे थे? बांग्लादेश मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन को राज्य से बाहर किया जाए. इसी मामले में आगे चलकर ख़ुलासा हुआ कि ये प्रदर्शन, बवाल और तोड़-फोड़ माइनॉरिटी फोरम के अध्यक्ष और कांग्रेस नेता इदरीस अली के कहने पर कराई गई थी. जब यह ख़ुलासा हुआ तो इदरीस ने इसमें अपना हाथ स्वीकार भी किया. बल्कि उनका तो यह तक कहना था, ‘मुझे इस आंदोलन से जुड़ने पर फख्र है.’ हालांकि बाद में कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया.
अली का यह इकलौता उदाहरण बताता है कि बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण और सशक्तिकरण के बीच की महीन रेखा किस हद तक घुल-मिल गई है. मुख्यधारा की क़रीब-क़रीब सभी पार्टियों ने अब तक मुस्लिमों का अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल ही किया है. इदरीस अली का ही फिर उदाहरण सामने है जिनके बारे में बताया जाता है कि वे अब तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. ऐसे में तृणमूल पर अगर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे हैं तो वे पूरी तरह निराधार भी नहीं कहे जा सकते.
ज़ाहिर है कोई भी आम मुस्लिम जब अली जैसे नेताओं को देखेगा कि उनके ख़ुलेआम हिंसा में शामिल होने और उसे स्वीकार करने के बाद भी उनका बाल तक बांका नहीं हुआ तो उसका हौसला तो बढ़ेगा ही. वे हिंसा के ज़रिए अपनी निराशा को व्यक्त करने का तरीका सबसे ज्यादा प्रभावी मानेंगे. जो कि वे ऐसे-वैसे मुद्दों पर कर भी रहे हैं. उदाहरण के लिए 2015 में बिहार से पूना जा रहे किसी मदरसे के छात्रों को जब पुलिस ने सियालदह स्टेशन पर पकड़ लिया तो बंगाल के मुस्लिमों के एक समूह ने सड़कों पर जाम लगा दिया. इसी तरह 2016 में कालीचक, मालदा में जब हिंदू महासभा के नेता अखिलेश तिवारी ने पैगंबर पर कोई टिप्पणी कर दी तो मुस्लिम हिंसक हो गए.
ताजा मामला उत्तर-24 परगना जिले के बदूरिया का है जहां मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ एक पुलिस थाने पर कब्जा कर लिया बल्कि हिंदुओं के घर और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी नुकसान पहुंचाया. और इस हिंसा के पीछे वज़ह क्या थी? फेसबुक पर किसी ने पैगंबर मोहम्मद का आपत्तिजनक तस्वीर पोस्ट कर दी थी. यहां ग़ौर करने की बात एक और है. वह यह कि हिंसा के सभी मामलों के पीछे दलील समान है, ‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची.’
वेसे इसमें कोई दोराय नहीं है कि कुछ हिंदू संगठन भी भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के मक़सद से बंगाल में धार्मिक उन्माद भड़का रहे हैं. लेकिन इसी के साथ यह भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इन तत्वों की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि वे कितने प्रभावी तरीके से मुस्लिम तुष्टिकरण और सशक्तिकरण के फर्क को मिटा सकते हैं. राज्य के मुस्लिमों को यही तथ्य समझने की ज़रूरत है. ख़ास तौर पर ग़ुमराह हो चुके मुस्लिम नेताओं को. वे इसे समझ जाएं तो शायद अपनी रणनीति पर भी फिर विचार कर सकते हैं.
(लेखक कैफे डिसेंसस के संस्थापक संपादक हैं.)
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