भारत, जापान और अमेरिका की नौसेनाओं के बीच बीते सोमवार से बंगाल की खाड़ी में मलाबार नौसैनिक युद्धाभ्यास शुरू हो गया. इस बार का युद्धाभ्यास अपने पिछले 20 संस्करणों की तुलना में बड़ा बताया जा रहा है. साथ ही इसे लेकर चीन ने जिस तरह की बयानबाजी की है उससे यह काफी चर्चा में आ गया है.

इस युद्धाभ्यास की शुरुआत कब हुई?

इस अभ्यास की नींव 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने रखी थी. इसके बाद 1994 में शुरू हुआ मलाबार युद्धाभ्यास 2007 तक केवल द्विपक्षीय ही रहा जिसमें भारत और अमेरिका की नौसेनाएं ही हिस्सा लिया करती थीं. इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारतीय नौसेना को अपने काम में और दक्ष बनाना और और दोनों देशों के बीच बेहतर तालमेल और विश्वास बहाली करना था. हालांकि, उस समय जब राव सरकार ने यह फैसला लिया था तो राजनीतिक हलकों में इसका विरोध भी हुआ था. इसका एक कारण अमेरिका की पाकिस्तान के साथ नजदीकियां थी. दूसरी वजह 1971 में हुए बांग्लादेश युद्ध के समय की वह घटना थी जब अमेरिका ने भारत को डराने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपनी नौसेना का विमानवाहक पोत भेज दिया था.

बहरहाल, 1994 में शुरू हुए इस ऐतिहासिक युद्धाभ्यास में साल 2015 में स्थायी सदस्य के रूप में एक और देश जापान को शामिल किया गया. हालांकि, जापान इससे पहले भी एक गैर-स्थायी सदस्य के रूप में कई अभ्यासों में भाग ले चुका था. जापान के अलावा 2007 में इस अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर ने भी गैर-स्थायी सदस्य के रूप में हिस्सा लिया था.

इस युद्धाभ्यास में क्या अलग है?

इस बार का अभ्यास इसमें शामिल तीन देशों का अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास माना जा रहा है. भारतीय नौसेना के अनुसार इस बार अभ्यास में तीनों देशों के करीब 95 लड़ाकू विमान, 16 विमानवाहक पोत और तीन से चार पनडुब्बियां हिस्सा ले रही हैं. खास बात यह है कि इस अभ्यास में इन देशों की नौसेनाओं ने अपने सबसे बड़े पोतों को भेजा है. अमेरिका का एक लाख टन वजनी विमानवाहक पोत निमित्ज इसमें हिस्सा ले रहा है. भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य और जापानी नौसेना का सबसे बड़ा 27 हजार टन वजनी हेलिकॉप्टर वाहक युद्धपोत इजुमी भी इस बार के अभ्यास में शामिल किया गया है. आईएनएस विक्रमादित्य पहली बार किसी युद्धाभ्यास में हिस्सा ले रहा है.

इस बार अमेरिकी नौसेना की ओर से मशहूर मिसाइल क्रूजर यूएसएस प्रिंस्टन (सीजी 59), लक्षित मिसाइल विध्वंसक यूएसएस होवार्ड (डीडीजी 83), यूएसएस शूप (डीडीजी 86) और यूएसएस किड (डीडीजी 100) के साथ-साथ एक पोसीडॉन पी-8 टोही विमान को भी शामिल किया गया है. इसके अलावा लॉस एंजिल्स-क्लास की अत्याधुनिक पनडुब्बी भी अभ्यास का हिस्सा है. भारतीय नौसेना की ओर से आईएनएस विक्रमादित्य के अलावा मिसाइल विध्वंसक रणवीर, स्वदेशी तकनीक वाले शिवालिक और सह्याद्रि, स्वदेशी एसएसडब्ल्यू कार्वेट कामतोटा, मिसाइल कार्वेट्स कोरा और किरपान, एक सिंधुघोष श्रेणी की पनडुब्बी और टैंकर आईएनएस ज्योति इस अभ्यास में भाग ले रहे हैं.

भारतीय नौसेना के एक बयान में बताया गया है कि अभ्यास के इस 21वें सत्र में समुद्र और समुद्र तट दोनों जगहों पर अभ्यास किया जाएगा. इसमें समूह अभियान, समुद्री गश्त और टोही कार्रवाई के साथ-साथ पनडुब्बीरोधी युद्ध का अभ्यास विशेष तौर पर किया जाएगा. इसके अलावा इस अभ्यास में चिकित्सा अभियान, खतरा न्यूनीकरण, विस्फोटक आयुध निपटान और हेलिकॉप्टर अभियान का भी अभ्यास किया जाएगा.

बड़ी तैयारी के पीछे की वजह

कई रक्षा विशेषज्ञ इस बड़ी कार्रवाई के पीछे का कारण चीन को बताते हैं. इनका मानना है कि मलाबार अभ्यास ऐसे समय में किया जा रहा है जब सिक्किम में भारत और चीन की सेनाओं के बीच तनातनी का माहौल है और साथ ही हिंद महासागर में पिछले कुछ समय से चीन अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है. इस क्षेत्र में चीनी जहाजों की बढ़ती उपस्थिति ने भारत को चिंतित कर रखा है और वह लाख चाहने के बाद भी चीन को रोकने में कामयाब नहीं हो सका है. भारतीय और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पिछले तीन सालों में कई चीनी पनडुब्बियों की इस इलाके में तैनाती की खबरें दी हैं. इसके अलावा पिछले एक साल के भीतर चीन की श्रीलंका से बढ़ी नजदीकियों ने भारत की चिंताओं को और ज्यादा बढ़ा दिया है.

उधर, अमेरिका और चीन के बीच भी दक्षिण चीन सागर को लेकर लगातार तनातनी बनी हुई है. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप चीन पर धाक ज़माने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते. जानकार कहते हैं कि इन वजहों के चलते भारत और अमेरिका दोनों के लिए इस बार के अभ्यास का एक उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करना और इस क्षेत्र को लेकर चीन पर मानसिक दवाब बनाना भी है. इन लोगों की मानें तो इसी वजह से भारत और अमेरिका इस बार के युद्धाभ्यास में ज्यादा ताकत लगा रहे हैं.

चीन की ऊटपटांग बयानबाजी की वजह से इस बार का अभ्यास चर्चा में

जैसे-जैसे इस बार के युद्धाभ्यास की तारीख करीब आती गई चीन की ओर से इसे लेकर बयानबाजी भी तेज होती गई. साथ ही इस अभ्यास के करीब दो महीने पहले से ही इस क्षेत्र में चीनी नौसेना की हलचल तेज हो गई. करीब एक दर्जन से ज्यादा चीनी युद्धपोतों, पनडुब्बियों, विध्वंसक और खोजी जहाजों को इस क्षेत्र में देखा जा चुका है.

चीन के सरकारी मीडिया ने इस अभ्यास को चीन के लिए बड़ी चिंता का कारण बताते हुए लिखा, ‘भारत, अमेरिका और जापान ने बंगाल की खाड़ी में अपना 10 दिन का मलाबार नौसैनिक अभ्यास शुरू कर दिया है, जो हिंद महासागर में इनका अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास है. इसके अलावा नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भारत ने अमेरिका के साथ 365 मिलियन डॉलर के सैन्य परिवहन विमान और समुद्री निगरानी ड्रोन के लिए दो अरब डॉलर के सौदे किए हैं. भारत-अमेरिका का चीन के इतने करीब आकर युद्धाभ्यास और ये सौदे चीन के लिए बड़ी सुरक्षा चिंताएं पैदा करने वाले हैं क्योंकि व्यापार और तेल के आयात के लिहाज से ही देखें तो हिंद महासागर चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.’

चीनी मीडिया के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने मलाबार अभ्यास से दो दिन पहले एक बयान जारी किया. इस बयान में कहा गया है कि इस अभ्यास पर निगाह रखने के लिए चीन ने एक खुफिया जानकारी इकट्ठा करने वाला अत्याधुनिक हाईविंग एयरक्राफ्ट हिंद महासागर में रवाना किया है. इसमें उसने यह भी कहा है, ‘हमें सामान्य द्विपक्षीय संबंधों और इससे जुड़े देशों के बीच सहयोग (युद्ध अभ्यास) पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि इस तरह का युद्ध अभ्यास किसी भी तीसरे देश के खिलाफ कार्रवाई करने के उद्देश्य से नहीं किया जा रहा है. साथ ही उम्मीद है कि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने के पक्ष में होगा.’

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि भारत, अमेरिका और जापान से चीन के जिस तरह के रिश्ते हैं उन्हें देखते हुए इन देशों द्वारा उसके इतने करीब आकर अभ्यास करने से चीन पर मानसिक दवाब बनना जायज है. लेकिन, इस सबके बावजूद इसे लेकर चीन ने कभी इतनी ज्यादा बयानबाजी नहीं की. दरअसल, वह जानता है कि उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस अभ्यास से कोई खतरा नहीं है. साथ ही व्यापार और आयात-निर्यात के लिहाज से भी यह कभी उसके लिए रुकावट नहीं बना. इस सब के बावजूद इस बार के अभ्यास को लेकर चीन ने एक अलग तरह का रुख अपना रखा है. वह इस अभ्यास को लेकर जितनी ज्यादा चिंता जता रहा है और जिस तरह की बयानबाजी कर रहा है वह समझ से परे है. जानकार कहते हैं कि इस बार का मलाबार नौसैनिक युद्ध अभ्यास अगर ज्यादा चर्चा में है तो उसकी सिर्फ एक ही वजह है और वह है चीन की ऊटपटांग बयानबाजी.