दुनिया जी-20 देशों के अभी-अभी संपन्न हुए हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन की सफलता-विफलता का लेखा-जोखा कर रही है, जबकि जर्मनी की जनता और नेता अपने घावों की मरहमपट्टी. सात से आठ जुलाई तक चले दो दिनों के इस शिखर सम्मेलन की मेज़बानी के द्वारा जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल अगर यह दिखाना चाहती थीं कि जर्मनी कितना उन्नत और उसकी जनता कितनी सुसंस्कृत है, तो उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है. पूरे जर्मनी और पड़ोसी देशों से आये प्रदर्शनकारियों ने हैम्बर्ग में हिंसा और तोड़-फोड़ का जो नंगा नाच किया, वह जितना असाधारण था उतना ही नाक कटाने वाला भी. जर्मनी ही नहीं, यूरोपीय मीडिया में भी सारे समय शिखर सम्मेलन के विषयों और वार्ताओं से अधिक प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच गृहयुद्ध-जैसी मुठभेड़ों की ही चर्चा छायी रही.

कुल मिलाकर पुलिस को एक लाख से अधिक प्रदर्शनकारियों को संभालना पड़ा. पुलिस का अनुमान है कि इनमें से कम से कम 10 हज़ार अपने आप को पूंजीवाद या फ़ासीवाद-विरोधी, वामपंथी या जनवादी भले ही कहते हों, वे तोड़-फोड़ और आगज़नी पर उतारू निरे अराजकतावादी थे. उन्होंने नारा दे रखा था ‘वेलकम टु हेल’ (नरक में आपका स्वागत है). इसी से पता चल जाता है कि उन्हें जी-20 देशों की राजनीति या अर्थनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं था. उनका उद्देश्य केवल दंगा करना और उधम मचाना था. उनकी आड़ में गुंडों-बदमाशों की भी बन आयी थी.

प्रदर्शन के नाम पर दंगा-फ़साद

प्रदर्शन के नाम पर दंगा-फ़साद शिखर सम्मेलन से एक दिन पहले ही शुरू हो गया और एक दिन बाद तक क़रीब दिन-रात चलता रहा. ‘ब्लैक ब्लॉक’ कहलाने वाले काले वस्त्रधारी नकाबपोश दंगाइयों का एक सबसे उग्र वर्ग पूरे शहर में फैल कर पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल-बम फेंकने, कारों और दुकानों को आग लागाने तथा अंधाधुंध तोड़-फोड़ और लूट-पाट करने का अगुआ बन गया. 20 देशों के शीर्ष नेताओं और उनके साथ आये प्रतिनिधिमंडलों की सुरक्षा के लिए देश के सभी 16 राज्यों से बुलाये गये 20 हज़ार पुलिसकर्मी भी कम पड़ने लगे. इसके बाद पूरे जर्मनी और पड़ोसी देश ऑस्ट्रिया से भी, एक हज़ार अतिरिक्त पुलिसबल जुटाया गया.

दंगाई प्रदर्शनकारियों को पीछे धकेलने के लिए बार-बार आंसूगैस के गोले दागने के साथ-साथ पानी की तेज़ बौछार करने वाली तोप-गाड़ियों का भी इस्तेमाल करना पड़ा. रविवार नौ जुलाई तक कुल मिलाकर 476 पुलिसकर्मी घायल हुए थे. 186 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 200 से अधिक को हिरासत में लिया गया था. घायल प्रदर्शनकारियों की संख्या भी कुछेक सौ बतायी जाती है. पहले ही दिन 60 घायल प्रदर्शनकारियों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया.

मेलानिया ट्रंप होटल में ही फंसीं

प्रदर्शनकारियों ने बाधाएं खड़ी करने के साथ-साथ कई जगहों पर सड़कें तक खोद डालीं. विदेशी नेताओं और उनके साथ के लोगों के लिए होटलों से सम्मेलन-स्थल तक पहुंचने के रास्ते कई बार बदलने पड़े. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलानिया ट्रंप एक समय अपने होटल में ही फंस गयीं. बाहर पास में ही दंगाई प्रदर्शनकारियों ने एक पुलिस स्टेशन को जलाने के लिए आग के गोले फेंके थे और सड़कों पर खड़ी कारों को आग लगा दी थी. मेलानिया ट्रंप हैम्बर्ग के ऐतिहासिक बंदरगाह को देखने जाना चाहती थीं. लेकिन स्थिति ऐसी नहीं थी कि पुलिस इसकी अनुमति दे पाती. राष्ट्रपति ट्रंप का यात्रामार्ग भी कुछेक बार बदलना पड़ा.

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प्रदर्शनकारियों का उत्पात

ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे के पति फ़िलिप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों की पत्नी ब्रिजित सहित कई दूसरे नेताओं के जीवनसाथियों को भी होटल से बाहर नहीं जाने की सलाह दी गयी. जर्मनी के वित्तमंत्री वोल्फगांग शौएब्ले को सुरक्षा संबंधी कारणों से शहर के केंद्र में अपनी एक मीटिंग रद्द कर देनी पड़ी. दंगाई प्रदर्शनकारियों ने कनाडा के प्रतिनिधिमंडल की एक कार के टायरों को छेद डाला और मंगोलियाई वाणिज्य दूतावास की खिड़कियों के कांच तोड़ डाले. कई बार वे आस-पास की इमारतों की छतों पर छिप कर वहां से पुलिस पर ईंट-पत्थर, लोहे के टुकड़े, कांच की बोतलें या पेट्रोल-बम बरसाते देखे गये. आतंकवाद का वीभत्स रूप लेती उन्मत्त हिंसा की ऐसी अति इससे पहले जर्मनी में शायद ही कभी देखी गयी थी.

सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त

प्रदर्शनकारियों पर नज़र रखने के लिए शहर के ऊपर हेलिकॉप्टर चक्कर लगाते थे. उनके शोर के कारण रातों को लोगों की नींद हराम हो जाती थी. ऐसा ही एक पुलिस हेलिकॉप्टर एक आतिशी रॉकेट का निशाना बनने से बाल-बाल बचा. एक दूसरे हेलिकॉप्टर के चालक की आंख लेज़र किरण की तेज चौंध से क्षतिग्रस्त हो गयी. प्रदर्शनकारियों ने कई मेट्रो स्टेशनों को भी क्षति पहुंचाई. इसी डर से मेट्रो ट्रेनों और नगर परिवहन की बस सेवाओं को पहले ही रोक दिया गया था. कम से कम तीन दिनों तक शहर का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त रहा.

शिखर सम्मेलन के पहले दिन की शाम चांसलर मेर्कल के निमंत्रण पर जब विदेशी नेता और उनके सहयोगी हैम्बर्ग में एल्बे नदी के पास बने संसार के सबसे आधुनिक फिलहार्मोनी हॉल में बेटोफ़न की एक सिंफ़नी का आनंद ले रहे थे, उसी समय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस की नौकाओं पर लगे लाउडस्पीकरों पर से फिलहार्मोनी की दिशा में कर्कश संगीत का शोर मचाया जा रहा था. विश्व की दो-तिहाई जनता के सर्वोच्च प्रतिनिधियों की उपस्थिति के बीच अपने देश की इस हद तक भद्द से दुखी चांसलर मेर्कल ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को तो वे समझ सकती हैं, पर ‘ऐसे प्रदर्शन, जिनसे लोगों की जान ख़तरे में पड़ जाये, स्वयं प्रदर्शनकारियों की अपनी जान भी ख़तरे में पड़ जाये... स्वीकार्य नहीं हो सकते.’

राहत की सांस

हैम्बर्ग ही नहीं, पूरे जर्मनी में राहत की सांस ली जा रही है कि जी-20 शिखर सम्मेलन, बिना किसी मौत के, जैसे-तैसे संपन्न हुआ,– यही बहुत है! अब यह सोचा जा रहा है कि क्या भविष्य में ऐसे किसी नये सम्मेलन का जोखिम उठाना उचित होगा? सुझाव दिये जा रहे हैं कि भविष्य में जर्मनी तो क्या, कहीं भी ऐसे बड़े शिखर सम्मेलन किसी बड़े शहर में नहीं, बल्कि दूर-दराज़ की किसी ऐसी जगह या समुद्र में खड़े किसी ऐसे जहाज़ पर होने चाहियें, जो वहशी प्रदर्शनकारियों की पहुंच से परे हो.

एक सुझाव यह भी है कि ऐसे सभी सम्मेलन या तो न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में हुआ करें या फिर नेतागण अपने-अपने देशों में रह कर ही वीडियो कान्फ्रेंस द्वरा बातचीत कर लिया करें. इससे धन, साधन और समय की भी भारी बचत होगी. सोचने की बात है कि ये सुझाव जर्मनी जैसे एक ऐसे संपन्न देश में दिये जा रहे हैं, जो अपने अनुशासन, सुशासन और प्रबंधन के लिए विख्यात है. ऐसा यदि भारत में होता, तो दुनिया तो खिल्ली उड़ाती ही, जर्मन भी यही कहते कि ‘राम-भरोसे’ चलने वाले भारत से और आशा ही क्या की जा सकती है!

उग्र वामपंथियों का आतंकराज

उग्र वामपंथियों के इस आतंकराज के बारे में कुछ दूसरे लोग कह रहे हैं कि जर्मनी में दक्षिणपंथी अतिवादियों के कान इस बीच कुछ ज़्यादा ही ऐंठ दिये गये हैं. इससे वमपंथी दंगाइयों को लग रहा है कि अब मैदान ख़ाली है, वे जो चाहें सो कर सकते हैं. हैम्बर्ग तो वैसे भी जर्मनी का एक ऐसा नगर-राज्य है, जहां वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाली समाजवादी ‘एसपीडी’ और पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टी की मिली-जुली सरकार है. इस सरकार के आलोचक मानते हैं कि उग्र वामपंथी उसकी नरमाई का यह अर्थ लगाने लगे हैं कि ‘जब सैंया भये कोतवाल, तो फिर डर काहे का!’ शहर का ‘रोटे फ्लोरा’ नाम का मुहल्ला उग्र वामपंथियों का ऐसा अजेय गढ़ बन गया बताया जाता है, जहां पुलिस वाले भी पांव रखने से कांपते हैं. जी-20 शिखर सम्मेलन को अस्त-व्यस्त कर देने के उद्देश्य से हुए दंगों में इस मुहल्ले के वामपंथिय़ों का निर्णायक हाथ बताया जाता है.

हर हाल में, हैम्बर्ग के जी-20 शिखर सम्मेलन से जर्मनी या दुनिया को कुछ मिला हो या न मिला हो, इतना ज़रूर हुआ है कि जर्मन वामपंथियों ने जनसाधारण के बीच अपने प्रति दुर्भावना की आग को और भी भड़का दिया है. चांसलर मेर्कल तक भी इस आग की आंच पहुंच सकती है. आलोचक कहने लगे हैं कि हैम्बर्ग में जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन द्वारा, चांसलर मेर्कल ने, 2015 में मध्यपूर्व के मुस्लिम शरणार्थियों के लिए सारे दरवाज़े खोल देने के बाद की देश के लिए दूसरी सबसे बड़ी हानिकारक भूल की है. सम्मेलन के दौरान हुई हिंसा और तोड़-फोड़ से जर्मनी के नाम को जो बट्टा लगा है, उससे उन्हें दो महीने बाद होने वाले संसदीय चुनावों में अच्छे-ख़ासे झटके लग सकते हैं.

सम्मेलन की राजनैतिक उपलब्धियां

जहां तक सम्मेलन की राजनैतिक उपलब्धियों का प्रश्न है, तो वे भी कुछ ख़ास नहीं रहीं. पहली बात, जी-7 या जी-20 जैसे शिखर सम्मेलनों में ऐसे कोई निर्णय लिये ही नहीं जाते, जो बाध्यकारी हों. वे एक-दूसरे को जानने-समझने, विचार-विमर्श करने और हो सके तो मोटे तौर पर किसी सहमति पर पहुंचने का मंच होते हैं, उदाहरण के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हैम्बर्ग में पहली बार एक-दूसरे से आमने-सामने मिले और परिचित हुए. एक घंटे के लिये नियत उनकी भेंट दो घंटे 20 मिनट तक चली. दोनों ने आपसी सहमति से तय किया कि नौ जुलाई से दक्षिण-पश्चिमी सीरिया में हथियार थम जायेंगे और उसे एक शांति-क्षेत्र बनाने के प्रयास किये जायेंगे. तब से वहां लड़ाई सचमुच थम गई है.

इसी तरह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘ब्रिक्स’ गुट के नेताओं के अतिरिक्त कई अन्य देशों के नेताओं से भी मिले. पर, वे न तो ‘ब्रिक्स’ देशों के बीच और न ही अन्य देशों के बीच आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई को वह प्राथमिकता दिलवा पाये, जो भारत चाहता है. सम्मेलन की समापन घोषणा में आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई जारी रखने का भी यद्यपि उल्लेख है, पर इस विषय में कुल मिलाकर वही बातें दुहराई गयी हैं जो पिछले जी-20 सम्मेलनों की समापन घोषणाओं में भी कही जाती रही हैं. यानी, यही कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष को और भी तेज़ किया जायेगा. आतंकवादियों के वित्तीय स्रोतों को सुखाया और उनके बारे में जानकारियों का आदान-प्रदान बढ़ाया जायेगा.

आतंकवाद की भारतीय गुहार

समस्या यह है कि भारत जब आतंकवाद की बात करता है, तो उसका मुख्य इशारा पाकिस्तान और कश्मीर की तरफ़ होता है, जबकि बाक़ी दुनिया इसे भारत और पाकिस्तान के बीच की जन्मजात पारस्परिक शत्रुता से अधिक महत्व नहीं देती. बाक़ी दुनिया को लगता है कि भारत नाहक उसे अपने द्विपक्षीय झगड़े में घसीटना चाहता है. सम्मेलन के तथाकथित ‘हैम्बर्ग ऐक्शन प्लान’ में भारत की इस बात के लिए सराहना अवश्य की गई है कि वह अपने यहां कारोबार के सरलीकरण और नए कारोबार के वित्तपोषण को बढ़ावा दे रहा है. श्रमिकों को अधिक सुरक्षा और महिलाओं को अधिक भागीदारी देते हुए श्रम बाज़ार में व्यापक सुधार ला रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नारे ‘अमेरिका पहले’ (अमेरिका फर्स्ट) के कारण जी-20 के सभी नेताओं की घिग्घी पहले ही बंधी हुई थी. सभी ने अपनी आशाओं-कामनाओं पर लगाम लगा रखी थी. मान लिया था कि ‘भागते भूत की लंगोटी ही मिल जाये,’ तब भी बहुत है. जर्मनी सहित सभी यूरोपीय देशों की दो ही मुख्य कामनाएं रह गयी थीं – 2015 में पेरिस में हुआ जलयवायु-रक्षा समझौता अमेरिका के पीछे हट जाने के बावजूद बचा रहे, और व्यापार-धंधे में ट्रंप का संरक्षणवाद इस समय के वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन) का स्थान न ले पाये.

अमेरिका अकेला पड़ा

राष्ट्रपति ट्रंप तो इन दोनों विषयों पर टस से मस नहीं हुए, पर ग़नीमत रही कि बाक़ी सभी पक्षों ने अमेरिका का अनुसरण नहीं किया. समापन घोषणा में पेरिस के जलवायु-रक्षा समझौते को ‘अप्रतिवर्ती’ (इर्रिवर्सिबल) बताया गया है. केवल तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने यह कह कर उलझन पैदा कर दी कि उनका देश इस समझौते की संसदीय पुष्टि फिलहाल नहीं करेगा. तुर्की के औद्योगिक विकास का अन्यथा डंका पीटने वाले एर्दोआन चाहते हैं कि तुर्की को विकसित नहीं, विकासशील देश माना जाये, तभी वह पेरिस समझौते की पुष्टि करेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि विकासशील देश कहलाने पर उसे संयुक्त राष्ट्र जलवायु-कोष के लिए कोई पैसा नहीं देना पड़ेगा.

जानकारों का कहना है कि दो मुख्य कारणों से इससे कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ता कि राष्ट्रपति ट्रंप जलवायु समझौते का पालन करते हैं या नहीं. पहली बात, अगले कई वर्षों तक तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन में अमेरिका में वैसे भी कोई उल्लेखनीय वास्तविक अंतर नहीं आने वाला है. कोयले की खुदाई के बदले वहां फ्रैकिंग तकनीक द्वारा भूगर्भीय चट्टानों से तेल और प्राकृतिक गैस के लगातार बढ़ते हुए उत्पादन से कार्बनडाई ऑक्साइड का उत्सर्जन अपने आप घटा है. दूसरी बात, वहां की कई राज्य सरकारें, नगरपालिकाएं और औद्योगिक शाखाएं स्वेच्छा से नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही हैं. तथ्य यह भी है कि ट्रंप प्रशासन चार वर्षों के अपने कार्यकाल के अंत तक पेरिस समझौते का सदस्य बना रहेगा. समझौते से मुक्ति उसके बाद ही मिल सकती है. तब तक अमेरिका सभी वार्ताओं में भाग लेता रह सकता है. अगले चुनाव में यदि कोई दूसरा राष्ट्रपति आया, तो वह ट्रंप के मौजूदा फैसले को पलट भी सकता है.

वैश्विक व्यापार और संरक्षणवाद

जहां तक वैश्विक व्यापार को संरक्षणवाद से मुक्त रखने का प्रश्न है, तो इस पर विशेषकर जर्मनी सबसे अधिक बल इसलिए देता है, क्योंकि वह अमेरिका की दिशा में सबसे अधिक कारें निर्यात करता है. राष्टपति ट्रंप जर्मन कारों पर दंडात्मक शुल्क लगाने की धमकी देते रहे हैं. यानी वे अपने कार-बाज़ार को संरक्षण देना चाहते हैं और जर्मनी अपने कार-उद्योग को. इसलिए हैम्बर्ग के शिखर सम्मेलन की समापन घोषणा में यह लिखे जाने पर सहमति बन गयी कि ‘पारस्परिकता के आधार पर और हर पक्ष के लिए लाभकारी होने पर’ खुले बाज़ार और मुक्त व्यापार का समर्थन किया जा सकता है.

इस तरह अंत में हर पक्ष की नाक रह गई. नेता लोग अपनी जनता से कह सकते हैं कि जी-20 शिखर सम्मेलन सफल रहा. वे यह कभी नहीं कहेंगे कि यदि पिछले वर्षों की समापन घोषणाओं को उठा कर देखा जाये, तो उन में भी मिल-मिलाकर लगभग वही बातें लिखी मिलेंगी, जो इस बार भी कही जा रही हैं. हर बड़े शिखर सम्मेलन का यही रंग-ढंग होता है, क्योंकि समापन घोषणाएं कोई बाध्यकारी संधि-समझौता नहीं, मात्र इच्छाएं-अभिलाषाएं होती हैं.

शिखर सम्मेलनों का औचित्य

ऐसे शिखर सम्मेलनों का मुख्य औचित्य यही है कि विश्व के शीर्ष नेता कुछ समय के लिए मिल-बैठते हैं. बातचीत करते हैं. यह सब भी ज़रूरी है. बिना संवाद के सहयोग की भूमिका नहीं बनती. हैम्बर्ग के शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप और पुतिन के बीच कोई संवाद यदि नहीं हुआ होता, तो दक्षिण-पश्चिम सीरिया में हथियार शांत नहीं हुये होते.

कह सकते हैं कि यही जी-20 शिखर सम्मेलन की मुख्य तात्कालिक उपलब्धि है, जिसकी किसी को अपेक्षा तक नहीं थी. इससे प्रेरित हो कर दोनों देश अपनी पारंपरिक शत्रुता को पीछे छोड़ यदि पारस्परिक सहयोग की राह पर चल पड़ें, तो इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या हो सकती है! दुर्भाग्य से अमेरिका और यूरोप में भी कुछ लोगों ने कसम खा रखी है कि उन्हें रूस को हमेशा अपना शत्रु ही मानना और उसे नीचा ही दिखाना है.