चुनाव आयोग दोषी जनप्रतिनिधियों के चुनाव लड़ने पर आजीवन पाबंदी लगाने के मामले में अपने पहले के रुख से पलट गया है. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा कि वह इस मामले में कोई राय व्यक्त नहीं कर सकता, क्योंकि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र का मामला है. इससे पहले अप्रैल में चुनाव आयोग दोषी जनप्रतिनिधियों पर आजीवन प्रतिबंध का समर्थन कर चुका है. सुप्रीम कोर्ट भाजपा नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय की एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है. इसमें उन्होंने दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन पाबंदी की मांग की है.

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक चुनाव आयोग के बदले रुख पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है. जस्टिस रंजन गोगोई और रंजीत सिन्हा की बेंच ने कहा है, ‘यह मामला चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है. लेकिन अगर आप स्वतंत्र होना नहीं चाहते और विधायिका से बंधे रहना चाहते हैं तब क्या कहा जाए.’ इस पर चुनाव आयोग के वकील ने कहा, ‘आयोग अपनी पुरानी राय से पीछे नहीं हट रहा है. हमारा मानना है कि विवादित राजनेताओं पर पाबंदी लगाना विधायिका का काम है और इस पर हमारी कोई राय नहीं है.’ इसके बाद शीर्ष अदालत ने कहा, ‘इस मुद्दे पर आप मौन नहीं रह सकते, हां या न कुछ जरूर कहें. अगर आप विधायिका के आगे विवश हैं तो हमें बताएं.’

केंद्र सरकार भी दोषी सांसदों और विधायकों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का विरोध कर चुकी है. अप्रैल में अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को कोई आदेश नहीं देना चाहिए, क्योंकि इस मामले में संसद बेहतर फैसला कर सकती है. मौजूदा जनप्रतिनिधि कानून के तहत न्यूनतम दो साल तक सजा पाने वाले जनप्रतिनिधि अगले छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते. इस मामले की अगली सुनवाई 19 जुलाई को होगी.