पहलाज निहलानी के नेतृत्व में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) फिल्मों में काट-छांट के मामले में उस सीमा तक पहुंच गया है जहां पहले कभी नहीं गया था. बीते कुछ समय में कथित तौर पर भद्दे दृश्यों या शब्दों पर तो सेंसर बोर्ड आपत्ति जताता ही रहा है, लेकिन अब उसे उन शब्दावलियों या वाक्यांशों पर भी आपत्ति हो गई है जो रोजमर्रा के जीवन में प्रचलित हैं. सेंसर बोर्ड ने डॉ अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंटरी – द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन के निर्माता से इसमें शामिल ‘हिंदू भारत’ ‘गुजरात’ और ‘गाय’ जैसे शब्द हटाने को कहा है.

सेंसर बोर्ड का गठन इसलिए किया गया था कि रचनात्मकता या मनोरंजन के नाम पर किसी ओछी या घटिया सामग्री से दर्शकों को बचाया जा सके. लेकिन इसके ताजा रुख से लग रहा है कि यह भारत के अग्रणी बुद्धिजीवियों के विचारों को जनता तक नहीं पहुंचने देना चाहता.

‘गुजरात’ या ‘गाय’ जैसे शब्दों पर सेंसर बोर्ड की आपत्तियां किसी तानाशाही मिजाज के देश की याद दिलाती हैं. कहने-सुनने में यह मामला हास्यास्पद जरूर लगता है, लेकिन है नहीं. दरअसल यह मानने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए को सेंसर बोर्ड को सरकार का पूरा समर्थन हासिल है. केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ही बोर्ड के सदस्यों और अध्यक्ष का चयन करता है. अध्यक्ष के पद पर पहलाज निहलानी की नियुक्ति तो खासी विवादित भी रही थी. अध्यक्ष बनते ही निहलानी ने प्रधानमंत्री की खूब तारीफ की थी. उनकी सत्ताधारी पार्टी भाजपा से करीबी कोई छिपी हुई बात नहीं थी और इसीलिए तत्कालीन बोर्ड सदस्यों ने उनके अध्यक्ष बनते ही सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया था.

‘गुजरात’ किसी जगह का ऐसा पहला नाम नहीं है जिस पर बोर्ड ने आपत्ति जताई हो. इससे पहले निहलानी शब्दों की पूरी सूची जारी कर चुके हैं जो फिल्मों में प्रयोग नहीं किए जा सकते. इनमें ‘बॉम्बे’ भी शामिल है. यह एक किस्म की बेतुकी सूची थी और इसके लीक हो जाने के बाद सेंसर बोर्ड को काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी. निहलानी की देख-रेख में ही बोर्ड ने ‘उड़ता पंजाब’ के निर्माताओं को इसमें से पंजाब शब्द का संदर्भ हटाने का निर्देश दिया था.

डॉ अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंटरी में कांट-छांट उस प्रवृत्ति की ओर इशारा है जिसके तहत विचारों और अभिव्यक्तियों से इतनी छेड़छाड़ की जाती है जिससे वे अपना असली अर्थ और मकसद खो देते हैं. वर्तमान सरकार अपने आलोचकों के प्रति असहिष्णु रही है. समय-समय पर इसकी प्रतिक्रियाएं भी आती रही हैं, जैसे कि 2015 में कई रचनाकारों ने विरोध स्वरूप ‘अवॉर्ड वापसी’ जैसी मुहिम चलाकर सरकारी सम्मान वापस लौटाए थे.

इस सरकार ने एक ऐसे माहौल को प्रोत्साहित किया है जो सिर्फ उसके अनुकूल अभिव्यक्तियों का समर्थन करता है. वहीं दूसरी तरफ वैकल्पिक विचारों के साथ अगर यहां कोई कांट-छांट होती है, इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. लेखकों और फिल्मकारों को निशाना बनाने की कोशिश आखिरकार लोकतंत्र को ही नुकसान पहुंचाती है.

सेंसर बोर्ड का काम शब्दों या दृश्यों पर पाबंदी लगाना नहीं है बल्कि फिल्मों को प्रमाणपत्र देना है, लेकिन बीते समय में खुद निहलानी सेंसरशिप लागू करने वाली एक अस्वस्थ परंपरा को आगे बढ़ाते देखे गए हैं. यह प्रवृत्ति सिनेमा में रचनात्मकता का दम घोंटने वाली साबित हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ इससे फिल्मों में समाज की सोच और अनुभव दिखाने की गुंजाइश भी सीमित हो सकती है.

इस मौके पर निहलानी और उनका बोर्ड चाहे तो ‘द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ डॉक्यूमेंटरी नहीं, बल्कि अमर्त्य सेन की किताब से ही एक सबक सीख सकता है. इसमें डॉ सेन एक जगह लिखते हैं कि जब दूसरे लोग असहमति जताते हैं तो हमें इस पर नाराज होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जो वे सही समझ रहे हैं वह हमारी नजरों में गलत हो सकता है, और जो हम सही मान रहे हैं वह उनके हिसाब से गलत हो सकता है. (स्रोत)