जून में थोक और खुदरा महंगाई, दोनों में गिरावट इस पर नजर रखने वालों और उपभोक्ताओं के लिए अच्छी खबर है. लेकिन इससे प्रधानमंत्री कार्यालय में खतरे की घंटी बज जानी चाहिए. खेती के मोर्चे पर आपातस्थिति को देखते हुए किसानों के पक्ष में फौरन नीति बनाए जाने की जरूरत है. महंगाई में आई यह गिरावट किसानों के हित की कीमत पर भी आई है. महंगाई कम होते जाना अर्थव्यवस्था के लिए वैसे भी अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि इससे यह पता चलता है कि वस्तुओं और सेवाओं की मांग में कमी आ रही है. ग्रामीण भारत वैसे ही संकट में है और उसके लिए यह स्थिति कोढ़ में खाज जैसी साबित होगी.

महंगाई में जो गिरावट आई है उसने सबसे ज्यादा किसानों के हित पर चोट की है क्योंकि खाने-पीने की चीजों के दाम में जून के दौरान 2.1 फीसदी की कमी आई है. मई में यह आंकड़ा एक फीसदी रहा था. इसका मतलब यह है कि किसान की अपनी कीमत का और भी कम दाम मिलेगा. सरकार अगर किसानों की खुदकुशी के मामलों पर लगाम लगाना चाहती है तो उसे इस स्थिति से निपटना होगा. किसान पर हर हाल में चोट पड़ रही है. अगर फसल भरपूर हो तो मांग की तुलना में उत्पादन ज्यादा होने से कीमतें गिर जाती हैं. अगर फसल कम हो तो भी उसे नुकसान होता है क्योंकि उत्पादन में आई कमी के चलते बढ़ी कीमतों को कम करने के लिए सरकार आयात का सहारा ले लेती है.

तिलहन और दलहन के आयात पर आयात शुल्क लगे, इस मांग को लेकर सरकार पर दबाव बनाने वाली कोई असरदार लॉबी नहीं है. इसलिए इन्हें उगाने वाले किसानों को उचित मूल्य मिलने के आसार शून्य हो जाते हैं. गन्ना किसानों की लॉबी इस मामले में प्रभावशाली है जिसके दबाव के चलते सरकार ने आयातित चीनी पर लगने वाले शुल्क को 40 से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया है ताकि कीमतें संतुलन में रहें. दलहन उगाने वाले किसानों के साथ किस तरह का सौतेला व्यवहार होता है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. कुछ समय पहले तक दालों की कीमत 200 रु प्रति किलो पहुंच गई थी, अब किसानों को सिर्फ 60-65 रु मिल रहे हैं. चना, उड़द, मूंग सहित सभी दालों और सब्जियों का यही हाल है.

इस पर केंद्र की चुप्पी काफी चिंताजनक है खासकर तब जब मोदी सरकार दावा कर रही है कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी. सवाल उठता है कि मौजूदा हालात में यह कैसे होगा. प्रधानमंत्री को अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में इस मुद्दे को छूना चाहिए. इससे भी अहम यह है कि सरकार एक श्वेत पत्र जारी करे और बताए कि इस समय किसान की आय कितनी है ताकि इसकी बाद में दोगुनी बढ़ोतरी के आंकड़े से तुलना हो सके. सरकार को समझने की जरूरत है कि इसकी मौजूदा नीतियां शहरी और ग्रामीण भारत के बीच की आर्थिक खाई को और चौड़ा कर रही हैं. उम्मीद है कि सरकार शहरों और उद्योगों को ज्यादा तरजीह देता यह रुख छोड़ेगी ताकि ग्रामीण भारत बचा रह सके.

महंगाई में कमी से रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों में कटौती का दबाव बन गया है. कारोबारी और बैंकिंग लॉबी इसकी मांग कर रही है. लेकिन यह समझना होगा कि उत्पादन की लागत में ब्याज दरों की महज तीन फीसदी हिस्सेदारी होती है. ज्यादा चिंता की बात निजी निवेश का न बढ़ना और बैंकों का कर्ज देने से बचना है और आत्ममंथन इस पर करने की जरूरत है. (स्रोत)