हममें से हर किसी ने यह जरूर महसूस किया होगा कि जब हम अपने दोनों हाथों से कोई काम कर रहे होते हैं तो ठीक उसी वक्त नाक पर खुजली होती है. ऐसा क्यों होता है? इस सवाल के जवाब में अक्सर मर्फीज लॉ या मर्फी के नियम का जिक्र आता है, तो कुछ लोग इसे मनोविज्ञान से जुड़ा मानते हैं. वहीं एक तबका ऐसा भी है जिसे यह वहम लगता है. चलिए, सिर-पैर के सवाल में इस बार दिमागी खुजली मिटाने के लिए नाक पर खुजली होने के पीछे की वजह पता करते हैं.

सबसे पहले मर्फीज लॉ की बात करते हैं. यह नियम नाक पर खुजली होने को वैज्ञानिक कारणों से नहीं बल्कि व्यवहारिक अनुभवों से समझाता है. असल में मर्फी का नियम उन छोटी-छोटी घटनाओं के होने को परिभाषित करता है जो हमारे साथ रोजमर्रा के जीवन में घटती हैं. इनसे हमारा कोई खास नुकसान नहीं होता फिर भी हम इनका होना पसंद नहीं करते क्योंकि ये खीज पैदा करती हैं.

इस नियम के अनुसार अगर किन्हीं परिस्थितियों में कोई चीज या कोई काम बिगड़ने की संभावना है तो वह जरूर बिगड़ेगा यानी वही होगा जो उस पल आप नहीं होने देना चाहते. उदाहरण के लिए – अगर ब्रेड जमीन पर गिरेगी तो उसका वही हिस्सा जमीन की तरफ होगा जिधर बटर लगा होगा या बॉटल की कैप हाथ से छूटने के बाद घर के किसी ऐसे कोने में जाकर ठहरेगी जहां से उसे निकालना बड़ी मशक्कत का काम हो. मर्फी के नियम के अनुसार एक साथ दोनों हाथ व्यस्त होने पर आपके सामने अनिवार्य रूप से कोई काम आएगा जरूर, चाहे वह नाक पर खुजली करने का ही क्यों न हो!

मर्फीज लॉ की हवा-हवाई संकल्पना से इतर भोपाल में होमियोपैथी मेडिसिन एंड सर्जरी की पढ़ाई कर रहीं आस्था पाठक एक रोचक प्रयोग का जिक्र करती हैं. आस्था बताती हैं कि होमियोपैथी में इलाज करते हुए डॉक्टर मरीजों के मनोविज्ञान का अध्ययन करने पर जोर देते हैं. इस क्रम में उन्होंने चार-पांच साल की उम्र के बच्चों के साथ किए जा रहे एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग के दौरान पाया कि उन्हें हाथ बांधने पर नाक पर खुजली महसूस नहीं होती. हालांकि वयस्कों का अनुभव इसका ठीक उल्टा रहा.

महाराष्ट्र के अकोला में प्रैक्टिस करने वाले फिजीशियन रवि राउत भी ऐसा ही कुछ मानते हैं. ऊपर बताए गए प्रयोग का जिक्र करने पर वे कहते हैं कि अगर इन बच्चों को यह जानकारी होती कि नाक पर खुजली जैसा कुछ होता है तो उन्हें भी खुजली जरूर महसूस होती. इसके साथ ही राउत इसका संबंध इंसान की उस प्रवृत्ति से भी जोड़ते हैं जिसमें वह हर वो काम करने की इच्छा करता है जिसके लिए उसे मना किया जाता है. दरअसल दोनों हाथ व्यस्त या गंदे होने की स्थिति में दिमाग को यह संदेश जाता है कि वह अब कोई और काम नहीं कर सकता. ऐसे में दिमाग इस स्थिति का तोड़ ढूंढ़ने लगता है. भले इसकी आजमाइश केवल नाक खुजलाकर ही क्यों न हो.

मनोविज्ञान के कुछ जानकार इसे बॉडी फोकस्ड रिपीटेटिव बिहेवियर – बीएफआरबी से भी जोड़कर देखते हैं. बीएफआरबी उस इंसानी व्यवहार को कहते हैं जिसके तहत लोगों में नाक-कान खुजलाने, बालों पर हाथ फिराने या नाखून चबाने की आदत होती है. बीएफआरबी बहुत ज्यादा होने की स्थिति इसे डिसॉर्डर कहा जाता है, वहीं दूसरी तरफ थोड़ा-बहुत होने की स्थिति में यह बॉडी मेमोरी का जरूरी हिस्सा माना जाता है. बॉडी मेमोरी यानी शरीर की याद्दाश्त. हमारे सवाल के संबंध में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि आपके हाथों को भी नाक या चेहरे को छूने की आदत होती है, तो वहीं चेहरे को हाथों से छुए जाने की आदत होती है. यानी यह प्रक्रिया शरीर की याद्दाश्त का हिस्सा होती है. हाथ बंधे या व्यस्त होने पर इंसान शरीर की आदत के अनुसार व्यवहार नहीं कर पाता और नाक पर एक तरह ही सिहरन या खुजली महसूस होती रहती है.