पीयूष द्विवेदी सत्याग्रह के नियमित पाठक हैं और नोएडा में रहते हैं.


मेरा परिवार आज से करीब पंद्रह साल पहले गांव से शहर आया था. तब भी इस शहर यानी दिल्ली से सटे नोएडा का तेजी से विस्तार हो रहा था. हम लोग इस विस्तार का नतीजा भी थे और हिस्सा भी. हालांकि मुझे शहर के एक कमरे के जीवन में बिलकुल भी मजा नहीं आ रहा था क्योंकि हम तो गांव के खुले वातावरण के आदी थे. लेकिन कहते हैं न कि समय के पास हर उलझन की एक सुलझन होती है तो मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. समय के साथ आस-पड़ोस में रहने वाले तमाम हमउम्र बच्चों से मेरी दोस्ती होती गई, जिससे पहले बोझिल लगने वाला दिन अब छोटे से छोटा लगने लगा. कुछ ही अरसा बीता होगा कि बिल्डिंग में हम कुछ बच्चों का एक उत्पाती समूह बन गया और यह समूह तरह-तरह की शैतानियों के चलते मोहल्ले में जल्दी ही कुख्यात भी हो गया.

उन दिनों बच्चों को रिझाने के लिए बाजार में एक नया कॉन्सेप्ट आया था - ‘पर्ची खोलो, ईनाम पाओ.’ यानी एक रुपये की दो पर्ची खोलो, जो नंबर आए उस नंबर का ईनाम पाओ. इनाम में एक से बढ़कर एक खिलौने रखे होते थे, मगर पर्ची खोलने पर अक्सर सीटी, गुब्बारे या डमी करेंसी जैसी छोटी-मोटी चीजें ही निकलती थीं.

बाजार से प्रेरणा लेते हुए हमारे समूह के एक-दो लड़कों को भी एक पर्ची-ईनाम वाली दूकान खोलने का आइडिया आया. काफी सोच-विचार के बाद आखिरकार सभी लड़के दूकान खोलने के प्रस्ताव पर सहमत हो गए. इसके क्रियान्वयन पर काम भी होने लगा, जिसमें सबसे पहली और सबसे बड़ी बाधा थी - घर के बड़ों से अनुमति लेना. यह बहुत कठिन था लेकिन जब समूह के हर सदस्य ने पूरे जोर से घरवालों पर ‘हठास्त्र’ और ‘रोदनास्त्र’ जैसे दिव्य आयुधों का प्रयोग किया तो उन्हें अनुमति देनी ही पड़ी. बेशक इसमें शर्तें लागू का टैग भी लगा हुआ था.

अनुमति के बाद दूकान के लिए ठिये पर विचार हुआ और फिर मेरे घर के बाहर का बरामदा इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया गया. इसके लिए बाकायदा मेरे घरवालों से अनुमति भी ली गई थी. अब तय हुआ कि सभी साझेदार अपने-अपने खिलौनों में से कुछ खिलौने लाएंगे जिन्हें ईनाम के रूप में नंबर डालकर दूकान में रखा जाएगा. यहां पर यह बताना जरूरी है कि खिलौने लाने वालों को यह आश्वासन पहले ही देना पड़ा था कि कुछ भी हो जाए लेकिन उनके बड़े और कीमती खिलौने अंततः उन्हीं के पास आएंगे. यानी पर्ची में किसी हालत में नहीं निकलेंगे. हां, छोटे-मोटे खिलौनों के विषय में कोई गारंटी नहीं दी गई.

अब दूकान को लगातार चलाते रहने के लिए जरूरी था कि कुछ ऐसी चीजें उसमें रखी जाएं जो न सिर्फ हमारे ग्राहकों यानी हमारे जैसे बच्चों को आकर्षित करें, बल्कि हमें सहजता से उपलब्ध भी हो जाएं. इस समस्या का समाधान भी जल्दी-ही खोज लिया गया.

उन दिनों लड़कियों में थिप्पूड़ (एक विशेष आकार का पत्थर) के प्रति एक अलग ही आकर्षण था. यह उनके इत्ती-बित्ती या टीबी जैसे विभिन्न खेलों के लिए ज़रूरी था. आलम यह था कि इन खेलों को पसंद करने वाली हर लड़की अपने पास सुंदर से सुंदर थिप्पूड़ रखना चाहती थी. हालांकि इन खेलों के प्रेमी कुछेक लड़के भी थे, पर लड़कियों में इसका अधिक आकर्षण था. तो इस तरह हमने लड़कियों के थिप्पूड़ प्रेम को भुनाने का विचार बनाया और अपनी दूकान में भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के बहुतेरे थिप्पूड़ भरकर उन पर नंबर डाल दिए.

हमारे एक साथी को कहीं से थोक में कई सारे थिप्पूड़ मिल गए थे. अब थिप्पूड़ एक ऐसी चीज थी जो लड़कियों को किसी और दुकान पर नहीं मिल सकती थी तो हमारी दुकान की तरफ उनका झुकाव स्वाभाविक रूप से हुआ, मतलब कि हमारा तीर एकदम निशाने पर लगा. दनादन पर्चियां खोली जाने लगीं और निकलना क्या था, बस थिप्पूड़. संदेह न हो इसलिए बीच-बीच में एकाध छोटे-मोटे खिलौने भी कहीं से निकाल दिए जाते.

एक बार तो एक लड़की को संदेह हो ही गया और वो हठ कर बैठी कि वो देखना चाहती है कि हमने बड़े खिलौनों की पर्चियां बनाई हैं कि नहीं. बड़ी आफत थी, पर उसे विश्वास तो दिलाना था, वरना साख ख़राब हो जाती. खैर! उसे एक-एक कर सारी पर्चियां खोलकर दिखाई गईं. जाते हुए वो संतुष्ट भी हुई क्योंकि एक लड़के ने धीरे से बड़े खिलौनों की पर्चियां बनाकर बाकी पर्चियों में मिला दी थीं. इस तरह छोटी-मोटी मुश्किलातों को झेलते हुए हमारी दूकान चलती रही.

दुकान चलते-चलते चार-पांच दिन बीत गए. इस दौरान लगभग पचास रुपये की कमाई हुई थी. इस कमाई ने हमारा उत्साह इतना बढ़ा दिया कि हम शेखचिल्ली हो गए. सोचने लगे कि अभी पचास हुए हैं, फिर सौ भी होंगे, फिर हजार और इस तरह तो जल्दी-ही हम एक बहुत बड़ी दूकान भी खोल लेंगे. इन कल्पनाओं को पूरा करने के लिए पहले ही कदम से दूकान का विस्तार जरूरी था और विस्तार लिए यह जरूरी था कि उसमें सामान भरा जाए.

यह सोचकर सब लोगों ने वे पचास रुपये अपने ही एक साथी को दे दिए. यह वही लड़का था जो हमारे लिए थिप्पूड़ का प्रबंध करता था. हमने उससे कहा कि वह बाजार से कुछ सस्ते खिलौने, टॉफियां, बिस्कुट आदि दूकान के लिए ले आए. वह पैसे लेकर चला गया और ऐसा गया कि सीधे शाम को प्रकट हुआ. मैंने सामान के बारे में पूछा तो मेरे हाथ में बिस्कुट का एक पैकेट थमाते हुए बोला, ‘सामान तो ना मिला... भूख लग गई थी तो पैसे खा गया. ले तू भी खा.’ हम लोगों को उस पर बड़ गुस्सा आया. हम सबने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई गई और गुस्से में दूकान से निकाल दिया. लेकिन इससे पैसे तो आने नहीं थे.

फिर इसके बाद कई कारणों से दूकान ठप सी हो गई. पहला कारण तो यही था कि उस लड़के को निकाल देने के कारण दूकान की जान-शान थिप्पूड़ आने बंद हो गए और फिर पचास रुपये की रकम खोने का झटका हम सब को लगा था. हम में से कोई भी आगे ऐसा धोखा और नुकसान खाना नहीं चाह रहा था.

तो फिर बाद के दिनों में जो थोड़ी-बहुत कमाई थी, उसे आपस में बांटकर हमने दूकान को बंद करने का निर्णय ले लिया. इस तरह बड़ी दूकान की हमारी आकांक्षाएं थोड़े-बहुत मलाल के साथ ही समाप्त हो गईं. आज इस दुकान कथा को याद करने पर मजा तो आता है, लेकिन मैं ये भी सोचता हूं कि वो हमारी व्यापारिक चतुराई थी या बाजार से मिली ठगी की समझ कि हमने अपनी दूकान बंद कर दी थी. खैर, जो भी रहा हो मगर उस छोटी-सी और आज के हिसाब से नकली-सी दुकान ने हममें दुनिया की थोड़ी समझ पैदा कर दी थी.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)