हमारी दुनिया और समय लगातार ख़बरों से घिरे रहते हैं, कुछ इस हद तक कि जो ख़बर नहीं है या नहीं बन सकता उसके बारे में हम सोचते हैं कि वह है ही नहीं याकि उसका होना बेकार और अकारथ है. ख़बर सच है या झूठ, इसकी भी हमें ख़ास परवाह नहीं होती जबकि झूठ ख़बरों की बहुतायत में है. अगर हमारे समय में झूठ बहुत फैल पा रहे हैं तो इसका एक बड़ा कारण उनका ख़बरों में बने रहना है. ख़बर सिर्फ़ सच्चाई का तथाकथित बखान भर नहीं करती, वह उसे बदल भी सकती है. ख़बरें दंगे करा सकती हैं, अपराध के प्रति झुकाव और उत्साह उपजा सकती हैं, छवियां बना या बिगाड़ सकती हैं. ख़बरें सच्चाई को छुपा सकती हैं और सीधे-सादे सच को अप्रासंगिक बना सकती हैं. ख़बरों की दुनिया के अपने सरोकार हैं: राजनीति, अपराध, धर्म, खेल, फ़िल्म, फ़ैशन, बाज़ार. ख़बरों के परिसर में उनमें लगातार घालमेल भी होता रहता है: धर्म को हिंसक खेल, राजनीति को बेशरम अपराध, अपराध को आकर्षक गतिविधि आदि ख़बरें ही बनाती रहती हैं. ख़बरें ऐसा माहौल पैदा करती हैं कि जो ख़बर के अहाते या दायरे में नहीं है, वह लगभग है ही नहीं.


पिछली शताब्दी में जब ख़बरों के आतंक का आरंभिक दौर था तब आधुनिकता के बड़े पश्चिमी स्‍थपति एज़रा पाउंड ने यह दावा किया था कि कविता ऐसी ख़बर है जो ख़बर बनी रहती है. उनका इशारा उन ख़बरों से था जो एक दिन बाद ही बासी पड़ जाती हैं और लोग उन्हें भुला देते हैं. कविता इससे उलट ख़बर है: वह भी सच्चाई का बखान करती है पर ऐसा जो बासी नहीं पड़ता और सदियों तक ताज़ा बना रहता है जैसा कि विपुल साक्ष्य से ज़ाहिर होता है. चूंकि ख़बर हमारे समय का एक लगभग केंद्रीय रूपक है, यह सोचा जा सकता है कि साहित्य भी अपनी तरह से ख़बर होता है. आम तौर पर जो सच्चाई प्रचलित ख़बरों में कभी जगह नहीं पाती, मनुष्य आत्मा के उजाले और अंधेरे में धंसी सच्चाइयां; उसकी अपने समय से पार जा सकने की आकांक्षा; यह सहज मानवीय कल्पना कि सच्चाई के बरक़्स वैकल्पिक सच्चाई संभव है आदि वे पहलू हैं जो साहित्य ही रिपोर्ट करता है, अख़बार या टीवी चैनल नहीं. साहित्य को एक तरह का नैतिक औचित्य इस बात से मिलता है कि अपने पर संदेह भी करता है: उसका झूठ सच को झुठलाने की कोशिश नहीं होता बल्कि सच को उसकी पूरी सूक्ष्मता और निर्ममता में खोजने के जोखिम का नतीजा होता है. वह अक्सर हमें ऐसी ख़बर देता है अपने ही बारे में, जो हमें विचलित करनेवाली होती है, हमें वेध्‍य बनाती है और जिसे हम बारहा अपने से ही छुपाते हैं.

मुक्तिबोध शती के दौरान यह याद दिलाना असमीचीन नहीं है कि आज से 53 वर्ष पहले उनकी मृत्यु के कुछ महीने बाद मैंने मुक्तिबोध की कविता को ‘भयानक ख़बर की कविता’ कहा था. उस कविता की भयानकता आज तक बनी हुई है और कई बार लगता है कि वह आज पहले की तुलना में अधिक सच और क्रूर हो गयी है. लेखकों को आत्मा के जासूस भी कहा गया है: वे आत्मा की ओर से और खुद उसकी जासूसी करनेवाले लोग होते हैं- वे उसे उजागर करते हैं जो सच्चाई की ऊपरी सतह के नीचे दबी-छुपी सच्चाई होती है.

तो साहित्य इसी अर्थ में एक तरह का ख़बरनामा है कि उसमें प्रचलित ख़बरों से ज़ाहिर हो रही प्रचलित और सीमित सच्चाई के बरक़्स वह सच्चाई उजागर होती है जो समान्तर चलती रहती है और जिसे हम आदततन अनदेखा-अनसुना करते हैं. सारे हंगामों, खून-ख़राबे के बावजूद बची हुई मानवता और सद्भावना की ख़बर; सारी दमकती सुन्दरता के पीछे छुपी क्रूरता और विद्रूपता की ख़बर; सब कुछ ध्वस्त होते जाने के बग़ल में बचे-खुचे की ख़बर; चकाचौंध से छिपा दिये गये आत्मा के अंधेरों की ख़बर; घोर नाउम्मीदी के दौर में बची कहीं-न-कहीं पल-बढ़ रही उम्मीद की ख़बर साहित्य ही हमें देता है. ग़ालिब ने कहा था कि ‘हम वहां हैं, जहां से हमको भी/कुछ हमारी ख़बर नहीं आती.’ यह पहचान पाना सुखद और मानवीय है कि ‘हमारी ख़बर’ सच्चे ईमानदार और बेबाक रूप में कहीं और के बजाय साहित्य में ही अक्सर मिलती है.

दुहराने का उत्साह

भले हम कितना ही उससे बरकना (दूर रहना) चाहें और वह हमें कितना ही त्रस्त करता हो, सच तो यह है कि हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में सैकड़ों चीज़ें, उक्तियां, प्रतिक्रियाएं दुहराते रहते हैं. झूठ, बेइमानी, मक्कारी, षड्यन्त्र आदि भी दुहराये जाते हैं, कई बार आदतन, अकसर ढिठाई और अतर्कित आत्मविश्वास से. कई बार कुछ नया सोचने-करने के जोखिम से बचने के लिए. हर दिन अख़बारों में सैकड़ों दुहराव नज़र आते हैं: सार्वजनिक हिंसा की घटनाओं में, राजनैतिक आरोपों-प्रत्योरोपों में, सामाजिक विकृतियों में, हिंसा और अपराधों में. कई बार तो यह भ्रम होने लगता है कि जैसे हमारे बीच अब कुछ भी नया नहीं घटता, सब कुछ पहले को दुहराता रहता है.

कई बार दुहराव एक शिल्पगत युक्ति भी होती है- कविता और संगीत में स्पष्ट देखा जा सकता है. पर ऐसे कलात्मक दुहरावों में, फिर भी, कुछ नई बात पैदा होती रहती है. वे कई बार किसी बिम्ब, छवि या अनुभव को रेखांकित करने के लिए किए जाते हैं. पर हम आम तौर पर निजी और सामाजिक जीवन में जो दुहराव करते हैं वे उनमें बद्धमूल हो रही रूढ़ियों के कारण होते हैं. पहले ऊब और दुहराव में विलोम का सम्बन्ध था: हमें दुहराव से ऊब होती थी, जब-तब चिढ़ भी. अब लगता है कि हमें दुहराव रास आने लगा है: खान-पान, व्यवहार, अभिव्यक्ति, मनोरंजन और आस्वाद में, आपसी बातचीत में लगातार बिना संकोच या हिचक के हम दुहराते रहते हैं और कोई ऊब या चिढ़ इस दुहराव से हमें नहीं होती.

अपने को दुहराना शायद जीवित रहने की एक युक्ति भी है: हम उसी पर भरोसा कर सकते हैं जिसे हम आज़मा चुके हैं. बहुत सारा नया हम पर दूसरे थोपते रहते हैं और हम मुदित मन उनका अनुकरण बहुत उत्साह से करते रहते हैं. शायद ईश्वर ही है जो अपने को नहीं दुहराता: हमारी परंपरा में उसके दशावतार बिलकुल अलग-अलग रूप में रहे हैं. यह भी लगता है कि जब हमारी सहस्राब्दियों से चली आ रही बहुलता को दबाने-नष्ट करने के बहुत संगठित प्रयत्न हो रहे हैं तब दुहराव भी एक हथियार है जिसका प्रयोग करना कारगर है: बार-बार दुहराये जाने से झूठ सच लगने लगते हैं. भयावह विस्मृति और परंपराओं के विखंडन और दुर्व्याख्याओं के इस समय में दुहराव हमारी मौलिकता को भी नष्ट कर देगा यह स्पष्ट है.

धीरे-धीरे

धीरे-धीरे विषाद और दुख की अवधि बीत गयी. उनकी जिजीविषा; अन्त तक कला के प्रति उनकी अथक-अदम्य निष्ठा; उनका कला के लिए जीना, जीने के लिए कलाकर्म; उनकी अपार अचूक उदारता; उनकी भद्रता और सरलता, उनकी आध्यात्मिक बेचैनी और उनमें रस-बस गयी गहरी शान्ति, उनका गहराता हुआ मौन आदि याद आते गये और हममें से कई जो उनके नज़दीक थे उनके चाहे काम में फिर उत्साह से जुट गये. चित्रकार सैयद हैदर रज़ा के दुखद देहावसान को इस माह 23 जुलाई को एक वर्ष हो जायेगा. वे नहीं होकर भी हैं: अब उनका न होना उनके होने में मिल गया है. वे स्मृति नहीं हैं: वे उपस्थिति हैं. वे मंडला में एक कब्र में दफ़न नहीं, अपने घर में हैं. पहले जीवन उनका घर था, कला उनका घर थी: अब मृत्यु उनका घर है, कला उनका घर है. सिर्फ़ थोड़ा सा पता बदल गया है: घर नहीं बदला. रज़ा की कला ही उनका घर है: उसका एक दरवाज़ा जीवन में खुलता था, अब मृत्यु में खुला है. दोनों दरवाज़े अलग-बग़ल हैं- दोनों की सांकलें खुली हैं. बिंदु है जो जीवन-मरण के पार और परे जगमगाता है जैसे श्याम सूर्य हो.

उनके द्वारा स्थापित और अब उनकी स्मृति में कुछ करने को स्वतंत्र (क्योंकि अपने जीवन भर वे रज़ा फाउंडेशन को अपने बारे में कुछ भी नहीं करने देते थे) रज़ा फाउंडेशन अगले सप्ताह मंडला में मध्यप्रदेश के कलाविद्यालयों के युवा छात्र-कलाकारों का, जिनमें मंडला के भी कलाकार शामिल हैं, एक कलाशिविर रज़ा की प्रिय-वरेण्य नर्मदाजी के किनारे कर रहा है. पहली पुण्यतिथि पर आयोजित इन गतिविधियों को एक वार्षिक समारोह देने की कोशिश है. 23 जुलाई को सुबह नर्मदा-तट पर कलापिनी कोमकली का निर्गुण-गायन होगा. कलापिनी का गायन रज़ासाहब को बहुत पसन्द था और दशकों पहले भारत भवन के कारण और वहीं इन दो महानों की भेंट हुई थी: कलापिनी के गुरुपिता कुमार गन्धर्व और रज़ा साहब की. भावस्तर पर दोनों को मिलानेवाली नदी नर्मदा ही है. रज़ा के प्रिय कवियों में कबीर थे जिनके पदों को कुमार जी ने अनूठा और बहुत ही अनोखा संगीत-विन्यास दिया.

नर्मदा से कुछ दूर आठ-नौ मिट्टी के घरों में बसे एक वनग्राम में जन्मा एक महान् चित्रकार अपनी लम्बी दुर्घर्ष इहलीला समाप्त कर अब उसी नर्मदा से घिरे मंडला में एक कब्र में सोया है: उसकी कला का निर्मल उजाला कहां-कहां फैला है, फैला रहेगा यह अन्दाज़ा लगाना कठिन है क्योंकि उसका विस्तार बहुत है, सारे संसार में. हम जैसे लोग तो इस संसार को रज़ा-उजाले में आजीवन देखते रहेंगे.