साल के अंत तक गुजरात में विधानसभा चुनाव होने तय हैं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इस बार 150 से ज्यादा सीटें जिताकर प्रधानमंत्री मोदी को तोहफा देने की बात कह रहे हैं. सूत्रों की मानें तो राज्यसभा में अहमद पटेल की जीत के बाद शाह ने मिशन-150 को निजी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है. लिहाजा भाजपा प्रदेश संगठन इस मुहिम में जी-जान से जुट गया है. वहीं दबी आवाज में सही लेकिन कुछ राजनैतिक हलकों में इस चुनाव में भाजपा के हाथ से गुजरात फिसलने की भी संभावनाएं जताई जा रही हैं. बहरहाल, गुजरात में ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो वक्त ही बताएगा. लेकिन यह तय माना जा रहा है कि इस विधानसभा चुनाव का असर गुजरात के पड़ोसी राजस्थान तक भी जाएगा.

असल में गुजरात विधानसभा चुनाव से कई राजनैतिक दिग्गजों का भविष्य जुड़ा हुआ है. राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसी फेहरिस्त में शामिल एक प्रमुख नाम हैं. कांग्रेस आलाकमान ने गुजरात में अपने प्रभारी गुरुदास कामत से इस्तीफा लेकर यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गहलोत को सौंपी है. पार्टी के इस फैसले को राजनैतिक जानकार दो अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं. पिछले कई महीनों से भाजपा का सूर्य मध्यान्ह में है. पार्टी उन राज्यों में भी सरकार बनाने में सफल रही है जहां अब तक ऐसा सोचना भी उसके लिए दूर की कौड़ी था. ऐसे में गुजरात जैसे राज्य में सेंध लगा पाना कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल माना जा रहा है जहां भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है और पिछले 15 सालों से सत्ता पर काबिज़ है. जानकारों का एक वर्ग कहता है कि अशोक गहलोत को वहां की जिम्मेदारी सौंपकर पार्टी ने उन्हें डूबते जहाज पर बिठा दिया है.

वहीं इस बारे में दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि पार्टी हाईकमान को जादू में दिलचस्पी रखने वाले गहलोत की बाजीगरी पर अब भी विश्वास है. जानकार कहते हैं कि गुजरात में भाजपा को पटेल आंदोलन और उना कांड के अलावा पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी के बाद छोटे व्यापारियों में नाराजगी जैसी घटनाओं का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. उनके मुताबिक गुजरात में कांग्रेस भले ही चुनाव न जीत पाए. लेकिन यदि प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य में पार्टी औसत से ऊपर प्रदर्शन करने में भी सफल रही तो संगठन में अशोक गहलोत का कद बढ़ना लगभग तय है. अहमद पटेल की जीत को इसकी बानगी के तौर पर देखा जा रहा है.

गुजरात चुनाव से राजस्थान कांग्रेस के तार

गुजरात चुनावों के तकरीबन एक साल बाद यानी अगले साल के आखिर तक राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. प्रदेश की राजनीति पर नजर रखने वाले लोग बताते हैं कि अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में भी कांग्रेस भाजपा के खिलाफ एकजुट होने के बजाय अंतर्कलह में उलझी है. एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक पिछले तीन साल से प्रदेश कांग्रेस दो प्रमुख धड़ों में बंटी हुई है जिनमें से एक की अगुवाई पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट कर रहे हैं और दूसरे की गहलोत खुद.

जानकारों के मुताबिक सचिन पायलट युवा चेहरे और ऊर्जावान व्यक्तित्व के साथ प्रदेश में कांग्रेस के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. वहीं अशोक गहलोत राजस्थान में दो बार मुख्यमंत्री रहने के साथ प्रदेश संगठन के पुराने दिग्गज हैं जिन्होंने कांग्रेस में रहकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर पार्टी के मौजूदा उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक तीन पीढ़ियों का दौर देखा है.

गुजरात के इतर हालिया राजनैतिक घटनाओं पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश चुनावों में दोनों ही नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गयी थी. जहां पायलट चुनाव प्रचार में लगे थे वहीं गहलोत के पास सीट बंटवारे की रणनीति बनाने का काम था. लेकिन टिकट स्क्रीनिंग के तुरंत बाद गहलोत पार्टी प्रचार के लिए पंजाब चले गए. जहां उत्तरप्रदेश में भाजपा की आंधी के आगे कांग्रेस-सपा गठबंधन ताश के महल की तरह ढह गया वहीं पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में सफल रही. इस जीत को राजनैतिक जानकारों ने पार्टी के मनोबल के लिए बहुत अहम माना.

हालांकि कांग्रेस की पंजाब फतह के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे. लेकिन सिर्फ राजस्थान के नजरिए से देखें तो इस जीत के बाद अशोक गहलोत का कद सचिन पायलट से ऊपर माना गया. गहलोत समर्थक इस बात की पुष्टि के लिए हाल में एक अखबार में छपी दो सर्वे रिपोर्टों का हवाला देते हैं. इनके मुताबिक राजस्थान में औसतन 70 प्रतिशत कांग्रेस कार्यकर्ता अशोक गहलोत को ही अपना मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं. पिछले महिने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद अशोक गहलोत ने भी इस बात का इशारा देते हुए कहा था कि चाहे उन्हें कहीं की भी जिम्मेदारी सौंपी जाए लेकिन उनका पूरा ध्यान अब भी राजस्थान पर ही बना हुआ है.

अशोक गहलोत के राजनैतिक इतिहास को जानने वाले लोग उन्हें आखिरी समय में गेम चेंजर के तौर पर देखते हैं. साथ ही सूत्र यह भी बताते हैं कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व अपनी उन नीतियों में बदलाव करने का मन बना चुका है जिनके मुताबिक पार्टी कुछ राज्यों में नए चेहरों के सहारे अपनी नैया पार लगाने की सोच रही थी. बताया जा रहा है कि अब पार्टी का प्रमुख लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा चुनाव जीतना रह गया है, फिर भले ही उसके लिए कोई पुराना नाम ही आगे क्यों न बढ़ाना पड़े.

नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस से जुड़े एक नेता कहते हैं, ‘निसंदेह सचिन पायलट प्रदेश में पार्टी को मजबूती देने के साथ वोटर को खींचने में सफल रहेंगे. लेकिन अभी मुख्यमंत्री पद के लिए उन्हें थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है.’ इसके अलावा गहलोत समर्थक ये तर्क भी देते हैं कि वे हमेशा पार्टी प्रदेशाध्यक्षों पर हावी रहे हैं. चाहे वे डॉ चंद्रभान हों या उनके प्रबल विरोधी सीपी जोशी, गेंद हमेशा गहलोत के ही पाले में रही.

दूसरी तरफ गुजरात में अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस का आम कार्यकर्ता जबरदस्त आत्मविश्वास से लबरेज है. ऐसे में यदि गुजरात चुनाव में कांग्रेस अपेक्षित प्रदर्शन के आस-पास पहुंचने में सफल रहती है तो जानकार यह मान कर चल रहे हैं कि राजस्थान के अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस एक बार फिर अशोक गहलोत के ही नेतृत्व में मैदान में उतर सकती है. इस बारे में पार्टी से जुड़े एक सक्रिय कार्यकर्ता का कहना है, ‘यदि ऐसा हो पाया तो अभी तक असमंजस में चल रहे कांग्रेस कार्यकर्ता और यहां तक कि पार्टी शीर्ष नेतृत्व के सामने भी स्थिति काफी स्पष्ट हो जाएगे. इससे आगे की रणनीति तय करते समय पार्टी को निश्चित ही फायदा मिलेगा पंजाब चुनाव जीतने के पीछे पार्टी द्वारा मुख्यमंत्री पद का दावेदार समय रहते घोषित किया जाना एक बड़ा कारण था.’

लेकिन अशोक गहलोत की डगर इतनी आसान भी नहीं. जानकार कहते हैं कि एक छोटे अंतराल में सचिन पायलट राजस्थान में कांग्रेस का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं और जनमानस में पैठ बनाने में सफल रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद पर गहलोत समर्थकों के दावे के विरोध में पायलट को चाहने वाले कार्यकर्ता इस बात का हवाला देते हैं कि गहलोत सरकार की नाकामियां ही थीं, जो उनके कार्यकाल के तुरंत बाद हुए (2013 में) विधानसभा चुनावों में पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. इन चुनावों में पार्टी पहली बार 199 में से महज 21 सीटों पर सिमट गयी थी. इसके अलावा 2003 विधानसभा चुनावों में भी गहलोत की ही सरपरस्ती में मिली इसी तरह की एक और हार का जिक्र भी किया जाता रहा है.

राजस्थान में सचिन पायलट को अपना नेता मानने वाले कांग्रेसियों का कहना है कि उन्होंने पार्टी को तब संभाला था जब प्रदेश में आम कार्यकर्ता का मनोबल पूरी तरह से टूट चुका था. उनके मुताबिक पायलट ने पार्टी में नयी जान फूंकी और फिर से खड़ा किया. उसी का नतीजा था कि पिछले साल हुए निकाय उपचुनावों में कांग्रेस भाजपा पर बढ़त पाने में सफल रही.

ऐसे में राजनीतिकारों का कहना है कि यदि गुजरात में कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक रहे या फिर बिल्कुल बुरा, तो दोनों ही स्थितियों में आलाकमान को यह निर्णय लेने में आसानी रहेगी कि राजस्थान के विधानसभा चुनाव में किसे आगे किया जाए. लेकिन यदि ऐसा न हो पाया तो निश्चित ही पार्टी का अंतर्द्वंद सुलझने की बजाय उलझने वाला है.