नायक और महानायक में एक बड़ा फर्क होता है. नायक की कहानी में उतार चढ़ाव का एक ही फेरा होता है. वह उठता है, चोटी तक पहुंचता है और फिर ढल जाता है.

लेकिन महानायक बार बार लौटते हैं. उनका सूरज ढलने के बाद फिर उगता है. किसी को न छोड़ने वाला वक़्त भी जैसे उनके लिए अपने पाश ढीले कर देता है. छठवें ऑस्ट्रेलियन ओपन के साथ 20वां ग्रैंड स्लैम अपने नाम करने वाले रोजर फेडरर भी एक ऐसे ही महानायक हैं. इस उपलब्धि के साथ फेडरर उन खिलाड़ियों की सूची में शामिल हो गए हैं जिन्होंने 20 या इससे ज्यादा ग्रैंड स्लैम जीते हैं. इस सूची में सबसे आगे मार्गरेट कोर्ट हैं जिनके नाम ऐसे 25 खिताब हैं. फिर सेरेना विलियम्स (23) और स्टेफी ग्राफ (22) का नंबर आता है.

यानी फेडरर असाधारणता की इस पांत के पहले पुरुष हैं. और यह कारनामा उन्होंने 36 साल की उम्र में किया है . ज्यादातर खेलों के मामले में इस आंकड़े का मतलब होता है पकी उमर. लेकिन पूरे टूर्नामेंट में जिस अंदाज में फेडरर ने खिताब अपनी झोली में डाला वह बताता है कि उनके लिए वक्त की सुइयां 10-12 साल पीछे चली गई हैं.

इस स्विस जादूगर ने फाइनल में क्रोएशिया के मैरिन सिलिक को 6-2, 6-7, 6-3, 3-6, 6-1 से मात दी. वैसे उनका यह खिताब जीतना काफी हद तक तभी तय हो गया था जब आधुनिक टेनिस के द ग्रेट फोर कहे जाने वाले चार नामों में से दो- रफेल नडाल, नोवाक जोकोविच फाइनल से पहले ही निपट गए थे. तीसरे यानी एंडी मरे चोट की वजह से खेले ही नहीं.

लेकिन यह कहना अन्याय होगा कि रोजर फेडरर के नाम यह खिताब सिर्फ इस वजह से हुआ. देखा जाए तो उनका खेल अब उसी शिखर को छू रहा है जहां वह 10-12 साल पहले हुआ करता था. सनसनाती सर्विस, दनदनाते फोरहैंड और बैकहैंड, झन्नाटेदार रिटर्न और विपक्षी को असहाय कर देने वाले ड्रॉप शॉट ने रोजर फेडरर को हराना एक बार फिर बहुत मुश्किल बना दिया है. ऊपर से उन्होंने कुछ ऐसे शॉट भी ईजाद कर लिए हैं जो सिर्फ वे ही लगा सकते हैं.

और यह सब उसी अविश्वसनीय अंदाज में हुआ है जैसा कि ज्यादातर महानायकों की कहानी में होता है.

2012 में जब रोजर फेडरर ने विम्बलडन खिताब जीता था तो माना जा रहा था कि अब उनके लिए यह कारनामा दोहराना शायद ही संभव हो. इसके स्वाभाविक कारण भी थे. उस विंबलडन से पहले करीब ढाई साल तक भी फेडरर कोई ग्रैंड स्लैम खिताब नहीं जीत पाए थे. उनकी उम्र भी 30 हो चली थी. वैसे भी पीट सैंप्रास को पीछे छोड़कर वे सबसे ज्यादा ग्रैंड स्लैम जीतने वाले खिलाड़ी बन ही चुके थे और इस वजह भी बहुत से लोग मान रहे थे कि अब फेडरर के पास हासिल करने के लिए बचा ही क्या है.

इसके बाद वही होता दिखा भी जिसकी संभावना जताई जा रही थी. इस दिग्गज का खेल उतार पर आने लगा. करीब साढ़े तीन साल तक ग्रैंड स्लैम खिताबों की दुनिया उनसे चार-पांच साल छोटे नोवाक जोकोविच, रफेल नडाल और एंडी मरे के इर्द-गिर्द ही घूमती रही. इस दौरान रोजर फेडरर दो बार विबंलडन और एक बार अमेरिकी ओपन के फाइनल में पहुंचे जरूर, लेकिन ज्यादातर लोगों ने इसे दिए के बुझने से पहले की भकभकाहट माना. इसी दौरान वे पीठ और फिर घुटने की तकलीफ के चलते कई टूर्नामेंट खेल भी नहीं पाए. असाधारण फिटनेस का पर्याय माने जाने वाले इस महान खिलाड़ी के साथ यह भी पहली बार हुआ था और इसलिए भी बहुत से लोग मान चुके थे कि फेडरर के दिन अब बीत गए.

लेकिन बीते साल जनवरी से मानो सारे समीकरण सिर के बल खड़े हो गए. सारे पूर्वानुमानों को धता बताते हुए रोजर फेडरर ने रफेल नडाल को हराकर अपना पांचवां ऑस्ट्रेलियन ओपन जीत लिया. उसके बाद रिकॉर्ड आठवें विंबलडन और अब फिर से ऑस्ट्रेलियन ओपन अपने नाम कर उन्होंने खुद को टेनिस की दुनिया में एक बार फिर सबसे बड़ी चुनौती बना लिया है.

रोजर फेडरर इस सफर को जादुई बताते हैं. उनके प्रशंसकों को भी कुछ ऐसा ही लगता है. कुछ समय पहले द गार्डियन से बात करते हुए उनकी एक प्रशंसक शेनॉन शेनटैंगेलो का कहना था, ‘वे असाधारण हैं. सब कुछ जादुई ही तो है उनकी जिंदगी में. उनके जुड़वां बच्चे भी हुए तो वो भी दो बार.’