कानून और सामाजिक न्याय का संबंध दो तरह से स्थापित होता है. जब हाशिए पर पड़ा तबका बराबरी की मांग करता है और इसके चलते कोई सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन खड़ा होता है तो इसके लिए कानून बनते हैं. लेकिन कभी-कभी समाज के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए पहले कानून बनाए जाते हैं और फिर ये प्रगतिशील सामाजिक बदलाव की बुनियाद बनते हैं.

पिछले हफ्ते नोएडा में उच्च-मध्य वर्ग की बसाहट वाली महागुन सोसायटी के लोगों और यहां घरेलू सहायकों के तौर पर काम करने वाले तकरीबन 100 कामगारों के बीच हुआ टकराव राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है. यह घटना एक बार फिर इन कामगारों के लिए उस कानून की जरूरत याद दिलाती है जो इनके लिए कुछ बुनियादी अधिकार सुनिश्चित कर सके.

यह टकराव तब शुरू हुआ जब यहां एक अपार्टमेंट में घरेलू काम करने वालीं जोहरा बीबी ने आरोप लगाया कि उनके मालिकों ने उन पर चोरी का इल्जाम लगाकर मारपीट की और फिर उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया. इसके बाद पड़ोस की झुग्गी, जहां पर जोहरा की तरह और भी घरेलू कामगार रहते हैं, के लोग उन्हें ढूंढ़ने सोसायटी में आए और यहां तैनात गार्ड्स से उनकी झड़प हुई. आखिरकार यहां पुलिस पहुंच गई जिसने जोहरा को सोसायटी के बेसमेंट से ढूंढ़कर निकाला. इस मामले में दोनों पक्षों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है. सोसायटी ने सभी कामगारों के वहां प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है.

ये घरेलू कामगार देश के दूर-दराज के हिस्सों से आकर यहां रह रहे हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि ये सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे निचले तबके से आते हैं. इन लोगों के लिए समाज में तरह-तरह के दुराग्रह होते हैं और इस घटना के बाद इसकी झलक सोशल मीडिया पर भी दिखी. आम लोगों के साथ-साथ सोसायटी के लोगों ने भी ‘माल्दा-इन-नोएडा’ हैशटैग के साथ दावा किया कि ये कामगार अवैध बांग्लादेशी हैं.

इन कामगारों के शोषण की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि ये जहां काम करते हैं वह कोई फैक्टरी नहीं बल्कि एक घर होता है और इस निजी स्पेस में उनके मालिक की मर्जी ही सबकुछ होती है. यहां कामगार और नियोक्ता के बीच संबंधों को तय करने वाली कोई रेखा नहीं होती. यहां ज्यादातर संबंध पेशेवर होने के बजाय सामंती रूप से नौकर और मालिक वाले ही होते है.

फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई कानून नहीं है जो घरेलू कामगारों के लिए नियम-कायदे तय करता हो. हालांकि महाराष्ट्र और केरल में घरेलू कामगार कल्याण बोर्ड जरूर हैं और इसके साथ ही तमिलनाडु और कर्नाटक में सभी आम श्रमिकों के लिए जो कानून है उसके तहत घरेलू कामगार भी शामिल होते हैं. वैसे केंद्र के पास घरेलू कामगार कल्याण बिल (2016) का मसौदा तैयार है. इसमें न्यूनतम मजदूरी, काम करने के घंटे और नौकरी से निकालने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं. साथ ही जैसा महागुन सोसायटी में हुआ वैसे अपराध या विवाद से जुड़ी स्थितियों से निपटने के लिए भी प्रावधान हैं.

एक अनुमान के मुताबिक देश में घरेलू कामगारों की संख्या तकरीबन 40 लाख से एक करोड़ के बीच है. और किसी भी सभ्य समाज और आधुनिक अर्थव्यवस्था में इतनी बड़ी आबादी को कानूनी सुरक्षा से बाहर नहीं रखा जा सकता. (स्रोत)