केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सार्वजनिक संपत्ति की तोड़-फोड़ पर रोक लगाने वाले प्रिवेंशन ऑफ डिस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक प्रॉपर्टी (पीडीपीपी) कानून में राजनेताओं को छूट देने जा रही है. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस संबंध में संशोधित विधेयक सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है.

अख़बार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकृत सूत्रों के हवाले से बताया है कि पीडीपीपी कानून में संशोधन राज्यों से मिले सुझावों के बाद किया जा रहा है. इसके अलावा कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों ने भी इस कानून के दुरुपयोग की आशंका ज़ताई थी. उनके मुताबिक इसके ज़रिए सत्ताधारी दल विपक्ष के नेताओं को आरोपित कर सकता है. एक अधिकारी कहते हैं, ‘उन्हें (सरकार को) भी अंदाज़ा है कि वे (राजनीतिक दल) एक-दूसरे के नेताओं को जेल की सलाख़ों के पीछे पहुंचाने के लिए इस कानून को ज़रिया बना सकते हैं.’

इसीलिए अब गृह मंत्रालय इस कानून की भाषा को और स्पष्ट करने जा रहा है. इसमें अब यह उल्लेख हो सकता है कि राजनीतिक दलों के ‘नेताओं को सार्वजनिक संपत्ति की तोड़-फोड़ रोकने के लिए अपनी ओर से हर संभव प्रयास करने चाहिए.’ मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, ‘हम अब सबूतों की गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर देने की योजना बना रहे हैं. इसके तहत अब बंद-प्रदर्शन आदि की वीडियो रिकॉर्डिंग करना पुलिस के लिए ज़रूरी होगा. मौके पर तैनात पुलिस अफसर इसकी प्रति थाने और स्थानीय मजिस्ट्रेट के पास भी जमा कराएंगे. मामले की जांच करने वाले अधिकारी को यह वीडियो रिकॉर्डिंग मजिस्ट्रेट के ज़रिए ही सौंपी जाएगी.’

अधिकारियों के मुताबिक कानून में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने के अपराध को ग़ैर-जमानती बनाया जा सकता है. बशर्ते आरोपितों के ख़िलाफ पुख्तासबूत हों. बताते चलें कि केंद्र सरकार ने 2015 में पीडीपीपी कानून बनाया था. इसमें प्रावधान है कि बंद, धरना, प्रदर्शन आदि के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने की सूरत में राजनेताओं को ज़िम्मेदार माना जाएगा. साथ ही जिस पार्टी के धरना-प्रदर्शन के दौरान नुकसान होगा उसी से इसका हर्ज़ाना भी बााजार मूल्य के हिसाब से वसूल किया जाएगा.