बलात्कार पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए कानून में किया गया सुधार संस्थागत खामियों का शिकार होता दिख रहा है. द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार कानून मंत्रालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन में बलात्कार संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में निर्धारित समय सीमा को अव्यावहारिक बताया गया है. सीआरपीसी की धारा-309 में यह संशोधन 2013 में किया गया था. इसके तहत ऐसे मामलों में चार्जशीट पेश होने के बाद रोजाना सुनवाई करते हुए दो महीने में ट्रायल पूरा करने का प्रावधान है.

रिपोर्ट के मुताबिक कानून मंत्रालय के अध्ययन में सामने आया है कि धारा-309 की समय-सीमा के विपरीत दो महीने में तो बलात्कार पीड़ितों का बयान ही दर्ज नहीं हो पाता. अभी बलात्कार संबंधी मामलों में पीड़ितों का बयान दर्ज होने में औसतन आठ से साढ़े आठ महीने का समय लग रहा है. कुछ मामलों में पीड़ितों का बयान दर्ज करने का काम 15 महीने से लटका है.

कानून मंत्रालय के अध्ययन में इस देरी के पीछे कई कारण बताए गए हैं. इनमें फॉरेंसिक लैब से रिपोर्ट में मिलने में देरी और अदालतों में मामलों की बढ़ती संख्या शामिल हैं. हालांकि, इसके समाधान के तौर पर ऐसे मामलों की सुनवाई से जुड़ी सभी एजेंसियों के कामकाज में सुधार को जरूरी बताया गया है. रिपोर्ट के मताबिक इसके बिना दो महीने के भीतर सुनवाई पूरा करना असंभव होगा. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सीआरपीसी में बलात्कार संबंधी कानूनों को मजबूत करने और सुनवाई का समय घटाने के लिए 2013 में किए गए संशोधन बहुत व्यावहारिक नहीं थे.