देश के अगले राष्ट्रपति के लिए आज मतदान हो रहा है. केंद्र की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की जीत तय मानी जा रही है. विपक्ष की उम्मीदवार पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार हैं. अभी की स्थिति में उनके पास तकरीबन 34 फीसदी वोट हैं और उनके लिए राष्ट्रपति पद तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल लग रहा है.

भारत के संविधान में शीर्ष पर राष्ट्रपति पद है. संसद की जो संवैधानिक परिभाषा है उसमें लोकसभा और राज्यसभा के साथ-साथ राष्ट्रपति को भी शामिल किया गया है. कुल मिलाकर देखा जाए तो राष्ट्रपति का पद कई मामलों में नुमाइशी लगने के बावजूद बेहद अहम है.

राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच साल का होता है. संविधान के अनुच्छेद-62 के तहत कार्यकाल खत्म होने से पहले अगले राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. राष्ट्रपति चुनावों के लिए जो नियम बनाए गए हैं, उनमें यह प्रावधान है कि राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने में जब 60 दिन बचें तो उस दिन या उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव की अधिसूचना जारी करनी होगी. मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई को खत्म हो रहा है. राष्ट्रपति चुनावों की अधिसूचना बीते सात जून को चुनाव आयोग ने जारी की. संविधान के अनुच्छेद—324 के तहत राष्ट्रपति चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को दी गई है.

भारत के संविधान में राष्ट्रपति के निर्वाचन की जो व्यवस्‍था की गई है उसमें साफ तौर पर कहा गया है कि चुनाव में अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधित्व में जितना संभव हो उतनी एकरूपता होगी. इसे आसान शब्दों में समझें तो इसका मतलब यह हुआ कि हर राज्य की आबादी को आधार बनाकर जिस तरह वहां विधायकों और सांसदों का निर्वाचन क्षेत्र तय किया गया है उसी आधार पर राष्ट्रपति चुनाव में उनके वोट की कीमत यानी महत्व तय होगा.

इसलिए अलग-अलग राज्यों और विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के विधायकों की वोट की कीमत राष्ट्रपति चुनाव में अलग-अलग होती है. राज्यों में विधायकों के वोट की कीमत तय करने के लिए राज्य की कुल आबादी को हजार से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है उसे राज्य के कुल विधायकों की संख्या से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है वही संबंधित राज्य के एक विधायक के वोट की कीमत होती है.

उधर, सांसदों के वोट की कीमत तय करने का आधार यह है कि राज्यों के सभी वोटों को जोड़कर उसे संसद के दोनों सदनों के सदस्यों की संख्या से विभाजित किया जाता है. इसके बाद जो संख्या आती है वह एक सांसद के वोट की कीमत होती है. इसका मतलब यह हुआ कि अलग-अलग राज्यों से चुनकर आने के बावजूद हर सांसद के वोट की कीमत एक ही होगी.

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि राष्ट्रपति चुनाव में वही सांसद या विधायक वोट दे सकते हैं जो चुनाव जीतकर आए हों. इसे और आसानी से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि विधानसभा में एक विधायक को राज्यपाल मनोनीत करते हैं. इसी तरह से लोकसभा में दो और राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं. विधानसभा और संसद के मनोनीत सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं दे सकते. संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा के सदस्यों को तो राष्ट्रपति चुनाव में वोट देने का अधिकार है लेकिन राज्यों की विधायिका के ऊपरी सदन यानी विधान परिषद के सदस्यों को राष्ट्रपति चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है. यहां एक रोचक बात यह है कि अगर राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया शुरू होती है तो उसमें लोकसभा और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी भाग ले सकते हैं.

इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के लिए निर्वाचन अधिकारी लोकसभा के महासचिव हैं. पिछली बार यह जिम्मेदारी राज्यसभा के महासचिव के पास थी. दोनों बारी-बारी से यह जिम्मेदारी संभालते हैं. निर्वाचन अधिकारी के पास ही उम्मीदवार को नामांकन करना होता है. किसी भी उम्मीदवार की उम्मीदवारी को तभी वैध माना जाएगा जब कम से कम 50 मतदाता उसके प्रस्तावक हों और 50 अनुमोदक. एक उम्मीदवार को अधिकतम चार नामांकन पत्र दाखिल करने की अनुमति होती है. लेकिन हर नामांकन पत्र के लिए उसे अलग-अलग प्रस्तावकों और अनुमोदकों की जरूरत होती है. जमानत राशि के तौर पर उम्मीदवार को हर नामांकन के लिए 15,000 रुपये या तो निर्वाचन अधिकारी के पास या भारतीय रिजर्व बैंक में जमा कराने होते हैं.

सांसदों के लिए मतदान केंद्र संसद को बनाया जाता है और विधायकों के लिए विधानसभा को. लेकिन अगर कोई सांसद किसी वजह से संसद के मतदान केंद्र में मतदान नहीं करके किसी दूसरे राज्य की विधानसभा वाले केंद्र में मतदान करना चाहता हो तो उसे यह सुविधा उपलब्ध है. ऐसे ही विधायकों को अपने राज्य की विधानसभा के अलावा दिल्ली के संसद भवन स्थिति मतदान केंद्र में मतदान करने की सुविधा भी उपलब्ध है. लेकिन दोनों ही स्थितियों में संबंधित सांसदों और विधायकों को चुनाव आयोग को चुनाव के कम से कम 10 दिन पहले इसकी सूचना देनी होगी.

विधायकों और सांसदों के चुनाव में यह होता है कि जिसे सबसे अधिक वोट मिलते हैं उसे निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है. भले ही वे कुल पड़े मतों के आधे से कम ही क्यों न हो. लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा नहीं होता. राष्ट्रपति बनने के लिए कुल वोटों के आधे से एक अधिक वोट के कोटे को हासिल करना जरूरी होता है.

इस चुनाव में सांसदों और विधायकों को चुनाव मैदान में मौजूद सभी उम्मीदवारों को वरीयता देनी होती है. यह क्रम एक से शुरू होकर जितने उम्मीदवार हों उतने तक का होता है. मतदाता चाहे तो सभी उम्मीदवारों को वरीयता दे सकते हैं. लेकिन पहली वरीयता अनिवार्य होती है. अगर किसी मतदाता ने पहली वरीयता नहीं दी और वह दूसरी वरीयता से अपना वरीयता क्रम शुरू करता है तो उसका मत खारिज कर दिया जाता है.

दो से अधिक उम्मीदवार होने की स्‍थिति में पहले चक्र की गिनती के बाद अगर किसी उम्मीदवार को कोटा नहीं मिलता तो सबसे कम वोट पाने वाले के दूसरी वरीयता के वोटों को बाकी सभी उम्मीदवारों में बांटा जाता है और यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक किसी उम्मीदवार को कोटा नहीं हासिल हो जाए. राष्ट्रपति चुनाव में कुल वोटों की संख्या 10,98,882 है और कोटा 5,49,442 वोटों का है.

राष्ट्रपति का चुनाव ईवीएम से नहीं बल्कि बैलेट पेपर से होता है. जब राष्ट्रपति चुनाव के मतदाताओं को मत पत्र मिलता है तो उसी वक्त उन्हें चुनाव अधिकारी एक कलम भी देते हैं. वरीयता क्रम इसी कलम से भरना होता है. अगर किसी और कलम से भरा गया तो वह मत पत्र खारिज माना जाएगा. राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टियां व्हिप नहीं जारी कर सकतीं. इसका मतलब यह हुआ कि सांसद और विधायक अपने दल द्वारा समर्थित उम्मीदवार को वोट देने या नहीं देने के लिए स्वतंत्र हैं. यही वजह है कि इस बार विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार ने विधायकों और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की है.

मतों की गिनती दिल्ली में होती है. मतगणना के बाद चुनाव ​अधिकारी यह सर्टिफिकेट जारी करता है कि किस उम्मीदवार को तय कोटे भर वोट मिले हैं. ले​किन विजयी उम्मीदवार के निर्वाचन की घोषणा यह अधिकारी नहीं बल्कि चुनाव आयोग करता है. इस बार वोटों की गिनती 20 जुलाई को होगी और इसी दिन नतीजे का ऐलान भी हो जाएगा.