दिल्ली की बवाना विधानसभा सीट पर 23 अगस्त को होने वाले उपचुनाव के लिए भाजपा और आप ने प्रचार की रफ्तार बढ़ा दी है. भाजपा खासकर पूर्वांचल वोट बैंक को साधने में जुटी दिख रही है. पार्टी को लगता है कि अगर वह पूर्वांचल के वोटरों को अपने खेमे में रख सकी तो उसकी जीत पक्की है. कुछ दिन पहले दिल्ली भाजपा कार्यालय में आयोजित पूर्वांचल मोर्चा के सम्मेलन में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी का कहना था, ‘दिल्ली के निर्माण में यहां रहने वाले लाखों पूर्वांचलवासी अपना खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद किसी भी पार्टी ने इनके हित की बात नहीं सोची. दिल्ली के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी पार्टी का अध्यक्ष पूर्वांचल का रहने वाला बना है.’

ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब दिल्ली भाजपा में पूर्वांचल से संबंध रखने वाले पार्टी नेता अक्सर हाशिये पर रहते थे. पार्टी की राजनीति में सबसे अधिक दखल दिल्ली से सटे इलाकों से आने वाले या दिल्ली के परंपरागत नेताओं का ही रहता था. लेकिन यह स्थिति अब बदलती दिख रही है. लोकप्रिय भोजपुरी गायक और अभिनेता मनोज तिवारी को दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद दिल्ली भाजपा में पूर्वांचल की स्थिति मजबूत होती जा रही है. उनके पहले तक दिल्ली प्रदेश की टीम में भाजपा के पास कोई बड़ा नाम ऐसा नहीं था जिसका संबंध पूर्वांचल से हो.

भाजपा में पूर्वांचल को अहमियत दिलाने की कोशिश 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले शुरू हुई. यह वही दौर था जब दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने एक नया आयाम जोड़ना शुरू किया था  

भाजपा में पूर्वांचल को अहमियत दिलाने की कोशिश 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ समय पहले शुरू हुई. यह वही दौर था जब दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने एक नया आयाम जोड़ना शुरू किया था. 15 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की शीला दीक्षित को चुनौती देने की कवायद के तहत पार्टी के कुछ नेताओं ने यह रणनीति बनानी शुरू की कि पूर्वांचल के लोगों को अच्छी संख्या में टिकट दिया जाए. इसकी पहल सबसे पहले पार्टी के एक राज्यसभा सांसद ने की जो बिहार से चुनकर संसद के ऊपरी सदन में आए हैं. वे अपनी बात रखने के लिए उस अनुमान को आधार बना रहे थे जिससे यह बात सामने आ रही थी कि दिल्ली में तकरीबन 37 फीसदी लोग पूर्वांचल के हैं. लेकिन उस चुनाव में भाजपा ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. नतीजे आए तो भाजपा की सीटें सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटों से कुछ कम रह गई थईं.

इसके बाद जब 2014 के लोकसभा चुनाव हो रहे थे तो उस वक्त भी पार्टी के अंदर कई लोगों ने यह आवाज उठाई कि पूर्वांचल को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. क्योंकि तब तक यह साफ हो गया था कि दिल्ली के इस वोट बैंक को लुभाने के लिए आम आदमी पार्टी हरसंभव कोशिशें कर रही है. पूर्वांचल के मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के मकसद से मनोज तिवारी को पार्टी में लाया गया. ये वही मनोज तिवारी थे जो 2009 का लोकसभा समाजवादी पार्टी के टिकट पर योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लड़े थे. मनोज तिवारी को भाजपा में लाने में बिहार के उस राज्यसभा सांसद की अहम भूमिका रही जिसका जिक्र पहले किया गया है.

मनोज तिवारी की इच्छा बिहार की बक्सर सीट से चुनाव लड़ने की थी. लेकिन पार्टी ने उन्हें उत्तरी दिल्ली से चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया. भाजपा के रणनीतिकारों ने इस सीट को इसलिए भी चुना कि इस सीट से बनारस के रहने वाले और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे आनंद कुमार आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार थे. जब उत्तरी दिल्ली से मनोज तिवारी की उम्मीदवारी तय हुई तो उस वक्त तिवारी खुद अपने संसदीय क्षेत्र से परिचित नहीं थे. उन्होंने खुद एक बार माना कि उम्मीदवारी तय होने के बाद रात में वे अपने कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली के उस हिस्से में गए. मनोज तिवारी यह सीट जीत गए.

लेकिन तब तक और कुछ समय बाद तक भी भाजपा के अंदर अपनी दिल्ली की राजनीति को पूर्वांचल केंद्रित करने को लेकर अनिच्छा का भाव बना रहा. यही वजह थी कि हर्षवर्धन का प्रयोग असफल रहने के बाद दिल्ली में किरण बेदी का प्रयोग किया गया. लेकिन यह भी सफल नहीं रहा और पार्टी ने यह मान लिया कि दिल्ली की राजनीति उनके बस की नहीं है. सांगठनिक स्तर पर प्रदेश अध्यक्ष के तौर विजेंद्र गुप्ता और सतीश उपाध्याय का प्रयोग भी पार्टी के लिए उपयोगी नहीं रहा.

इस पृष्ठभूमि में पूर्वांचल प्रदेश भाजपा की राजनीति में मुख्यधारा में आया है. 2015 के प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान मनोज तिवारी से नाराज हो जाने वाले पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तिवारी के हाथ में ही प्रदेश भाजपा की बागडोर सौंपने का निर्णय लिया. इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि लंबे समय तक प्रदेश भाजपा की राजनीति में हाशिये पर रहा पूर्वांचल अब केंद्र में है. इसके बाद इस साल हुए नगर निगम चुनावों में पूर्वांचल के लोगों को अच्छी-खासी संख्या में टिकट दिए गए. इनमें से कई उम्मीदवार जीतकर आए.

आज के कुछ साल पहले तक पार्टी की दिल्ली की राजनीति में कोई यह सोच तक नहीं सकता था कि पूर्वांचल से आने वाला पार्टी का कोई नेता दिल्ली के पारंपरिक पार्टी नेता को इस तरह से चुनौती देगा   

हालांकि, निगम चुनावों में भाजपा की जीत कोई नई बात नहीं थी. प्रदेश में भले ही कांग्रेस की सरकार रही हो लेकिन निगम में लंबे समय से भाजपा काबिज है. इस नाते यह जीत उतनी बड़ी नहीं थी. इसके बावजूद इस जीत ने पार्टी के अंदर मनोज तिवारी की स्थिति को मजबूत करने का काम किया. इस जीत के बाद वे इस स्थिति में आ गए कि प्रदेश की राजनीति में कोई उनके खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता.

विजय गोयल दिल्ली भाजपा के बहुत पुराने और वरिष्ठ नेता हैं. हालांकि, अभी राज्यसभा में वे राजस्थान की नुमाइंदगी करते हैं लेकिन दिल्ली की राजनीति में उनकी दिलचस्पी हमेशा से रही है. बतौर केंद्रीय मंत्री भी वे दिल्ली की राजनीति में दिलचस्पी लेते रहे हैं. निगम चुनावों में जीत के बाद उन्होंने पार्टी के नए पार्षदों के स्वागत के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया. मनोज तिवारी इस कार्यक्रम में नहीं गए और इस वजह से पार्टी के अधिकांश पार्षदों ने इस कार्यक्रम में नहीं शामिल होने में ही भलाई समझी. पार्टी के एक नेता बताते हैं कि गोयल की नजर खुद दिल्ली की राजनीति पर रही है और ऐसे में वे तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से खुश नहीं थे. इनका दावा है कि पार्टी नेताओं से अनौपचारिक बातचीत में विजय गोयल मनोज तिवारी के खिलाफ बोलते हैं और ये बातें तिवारी तक भी पहुंच रही हैं. ऐसे में नए प्रदेश अध्यक्ष ने तय कर लिया है कि वे गोयल के दबाव में नहीं आएंगे.

विजय गोयल दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली के स्थानीय छात्रों के लिए आरक्षण की मांग लंबे समय से करते आए हैं. पार्टी के एक और सांसद प्रवेश वर्मा भी आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं. अब तक पार्टी का कोई बड़ा नेता न तो गोयल की इस मांग का समर्थन करता था और न ही इसका विरोध. लेकिन पहली बार मनोज तिवारी ने बतौर दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष गोयल की इस मांग का विरोध किया. तिवारी ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और क्षेत्र के आधार पर यहां आरक्षण देने से संस्थान का मूल स्वरूप नहीं बना रह पाएगा इसलिए यहां आरक्षण की मांग करना गलत है.

मनोज तिवारी के इस विरोध को भी दो तरह से देखा जा रहा है. आरक्षण से बिहार और उत्तर प्रदेश यानी पूर्वांचल के ही छात्रों के सबसे अधिक नुकसान की आशंका है. इस नाते एक तो यह कहा जा रहा है कि तिवारी पूर्वांचल के हैं, इसलिए विरोध कर रहे हैं. दूसरी वजह राजनीतिक है. दरअसल, भाजपा प्रदेश में अगला चुनाव पूर्वांचल के मतदाताओं को ही केंद्र में रखकर लड़ने की योजना पर काम कर रही है. इस नाते तिवारी को लग रहा है कि अगर आरक्षण की बात आगे बढ़ी तो इससे उनकी इस योजना के क्रियान्वयन में दिक्कत होगी और फिर से प्रदेश में दिल्ली के पारंपरिक नेताओं का दखल बढ़ जाएगा.

आज के कुछ साल पहले तक पार्टी की दिल्ली की राजनीति में कोई यह सोच तक नहीं सकता था कि पूर्वांचल से आने वाला पार्टी का कोई नेता दिल्ली के पारंपरिक पार्टी नेता को इस तरह से चुनौती देगा. लेकिन ये दोनों मामले बता रहे हैं कि दिल्ली प्रदेश भाजपा के अंदर अब स्थितियां बदल गई हैं.