नेल्सन मंडेला की आपबीती ‘लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम’ में टाइम मैगज़ीन के एडिटर रिचर्ड स्टेंगल ने मंडेला से जुड़ा एक किस्सा कुछ यूं बयान किया है :

एक बार मैं और मदीबा (दक्षिण अफ़्रीका के लोग प्यार से मंडेला को मदीबा कहते थे. स्थानीय जुबान में मदीबा का मतलब होता है – पिता ) नताल जा रहे थे. यह छह सीट वाला हवाई जहाज था. मदीबा जहाज में बैठे और अखबार पढ़ने लग गए. उन्हें अखबार पढ़ना बहुत अज़ीज़ था. वे हर छोटी से छोटी खबर भी पढ़ते थे. जहाज ऊपर उड़ रहा था. तभी उन्होंने देखा कि जहाज के पंखे पर लगे प्रोपेलर ने काम करना बंद दिया है.

मदीबा ने मुझसे कहा कि मुझे यह सूचना पायलट को देनी चाहिए. ऐसा कहते वक़्त उनकी आवाज़ हमेशा की तरह संयत थी. मैं बहुत डर गया था. प्रोपेलर बंद होने का मतलब था कि जहाज क्रेश हो सकता है. मैं उठा और पायलट को बताने के लिए केबिन की तरफ भागा.

जब वापस आया तो देखा मदीबा अखबार पढ़ रहे थे. उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि पायलट को मालूम चल गया है और वो आपातकाल लैंडिंग के लिए नज़दीक के एअरपोर्ट से संपर्क करने की कोशिश कर रहा है. मदीबा यह सुनकर फिर अखबार पढ़ने लग गए.

मौत का डर मेरे चहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था. वहीं मदीबा बेख़बर होकर, जैसे कुछ हुआ ही न हो, अख़बार पढ़े जा रहे थे.

जहाज को सकुशल उतार लिया गया था. उतरने के बाद मैंने हिम्मत करके मदीबा से पूछा, ‘क्या उन्हें डर नहीं लगा था.’ मदीबा का जवाब था, ‘डर! मैं अन्दर ही अन्दर कांप रहा था, रिचर्ड. पर अगर ज़ाहिर कर देता तो तुम, पायलट और दूसरे सब लोग घबरा जाते.’

रिचर्ड आगे कहते हैं, ‘तब मुझे समझ आया कि साहस क्या होता है.’ अपने डर को चेहरे पर ना आने देना ही साहस है. अगर लोग आपको आदर्श मानते हैं तो आपका आचरण ही देखा जाता है. मदीबा यह बात हमेशा याद रखते थे.

बहुत लाज़मी है कि मंडेला में यह गुण जन्मजात हो और बहुत संभव है कि यह उन्होंने अपने गुरु महात्मा गांधी से सीखा हो. गांधी में भी गज़ब का साहस था. याद कीजिये रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ का वह दृश्य जहां वे दक्षिण अफ्रीका में एक पत्रकार के साथ बात करते हुए चले जा रहे हैं और आगे एक गली के नुक्कड़ पर कुछ श्वेत लड़के उन्हें रोकने के लिए खड़े हैं. गोरा पत्रकार गांधी से रास्ता बदलने का आग्रह करता हैं. गांधी आग्रह ठुकरा देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. पत्रकार डर जाता है, पर गांधी पूरा आत्मविश्वास और साहस जाहिर करते हुए उन लड़कों की आखों में आंखें डालकर खड़े हो जाते हैं. गांधी की आंखों में हिंसा नहीं है, बस निश्चयात्मक आग्रह है कि भाई जो सच है उसे अपनाओ. यही सत्याग्रह होता है.

यही निश्चयात्मक आग्रह मंडेला की ज़िन्दगी में भी रहा जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद ख़त्म करने का बीड़ा उठाया. ‘द स्ट्रगल इज़ माय लाइफ’ उनके लेखों और भाषणों का संकलन है. यहां इसी शीर्षक से छपे एक लेख में वे कहते हैं, ‘दुनिया की कोई भी ताक़त दबे-कुचले हुए लोगों के उस आन्दोलन को मिटा नहीं सकती जिसमें उन्होंने जनता विरोधी सत्ता को उखाड़ फेंकने का संकल्प किया हो.’ इसी लेख में वे आगे कहते हैं कि जब कोई सरकार निहत्थे लोगों के शांतिपूर्ण आन्दोलन को दबाने के लिए अपनी पूरी ताक़त झोंक दे तो यह मान लेना चाहिए कि सरकार को उस आन्दोलन की ताक़त समझ में आ गयी है.

हालांकि यह भी सच है कि मंडेला ने अपने शांतिपूर्ण आन्दोलन के साथ-साथ एक हिंसक क्रांति का भी आह्वान किया था. 1961 में उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की सशस्त्र शाखा ‘उम्खोंतो वे सिजवे’ का गठन किया था और वे इसके कमांडर इन चीफ थे. मंडेला कुछ हद तक साम्यवाद के दर्शन से भी जुड़े रहे और क्यूबा के आन्दोलन ने भी उन्हें प्रभावित किया था, लेकिन उनके लिए सबसे ताकतवर प्रेरणा गांधीवाद से निकला दर्शन ही था.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ साउथ अफ्रीका के प्रोफेसर केके विरमानी अपनी क़िताब ‘नेल्सन मंडेला और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद’ में लिखते हैं, ‘मंडेला ने अफ्रीकी देश अल्जीरिया में जाकर सैन्य प्रशिक्षण लिया था और वे इस पर गर्व भी महसूस करते थे. पर यह भी मानते थे कि अफ्रीकन नेशनल पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा रंगभेदी सरकार के खिलाफ़ पूरी तरह से हथियार उठाने में कई साल लग जाएंगे.’ 1962 में इसी संघर्ष की वजह से नेल्सन मंडेला को आजीवन कारवास की सज़ा सुनाई गई थी. वे लगभग 27 साल जेल में रहे और उन्हें फ़रवरी 1990 में रिहा किया गया था.

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के आधार पर ट्रेन से बाहर फेंके जाने की घटना गांधी के जीवन में निर्णायक मोड़ मानी जाती है. उनके सत्याग्रह आंदोलन की बुनियाद में इस घटना की भी अहम भूमिका रही होगी. नेल्सन मंडेला ने भी ‘द स्ट्रगल इज माइ लाइफ’ में अपने साथ हुई ऐसी ही दो घटनाओं का जिक्र किया है. जाहिर तौर पर यही वे घटनाएं होंगी जो उनके लिए रंगभेद के खिलाफ लड़ाई की सबसे मजबूत प्रेरणा बनीं.

इनमें से पहला किस्सा यूं है कि जब वकालत करने के बाद मंडेला वित्किन-सिदेलसकी-एडिलमैन कंपनी में बतौर वकील भर्ती हुए तो वहां एक श्वेत टाइपिस्ट ने कहा कि उनकी कंपनी रंगभेद में यकीन नहीं करती और जब कोई बैरा (अश्वेत व्यक्ति) चाय लेकर आता है तो ख़ुद ही जाकर उससे चाय लेनी होती है. इसके बाद टाइपिस्ट का कहना था - हमने दो नए कप मंगवाए हैं, एक तुम्हारे लिए और दूसरा तुम्हारे अफ़्रीकी अश्वेत साथी गोर राडिक के लिए.

दूसरा किस्सा भी इसी कंपनी के साथ जुड़ा हुआ है. कंपनी की एक श्वेत टाइपिस्ट जब भी खाली होती थी जाकर मंडेला से कुछ काम मांग लेती थी. एक बार वे उसे टाइपिंग में कुछ डिक्टेशन दे रहे थे कि एक अंग्रेज़ क्लाइंट दफ्तर में आया. उस अंग्रेज़ को देखकर टाइपिस्ट झेंप गयी और तुरंत मंडेला से बोली, ‘नेल्सन ये लो पैसे और मेरे लिए दूकान से शैम्पू लेकर आ जाओ.’

इन घटनाओं ने मंडेला को अहसास करवा दिया था कि अश्वेत लोगों के प्रति दुराग्रह की जड़ें दक्षिण अफ्रीकी समाज में बहुत गहरी हैं. और शायद इन वाकयों से उन्हें वैसी ही गहरी चोट भी लगी होगी.

मंडेला की पहली राजनैतिक पारी सिर्फ अठारह वर्ष की है. 1944 में उन्होंने अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस की सदस्यता ली थी, 1952 में वे इसकी ट्रांसवाल शाखा के अध्यक्ष और फिर राष्टीय उपाध्यक्ष चुने गए. 1953 में पहली बार वे जेल गए थे. फिर अपने आंदोलनों की वजह से उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला और 1956 में उन्हें पांच साल की सज़ा सुनाई गयी. पांच अगस्त, 1962 को देशव्यापी हड़ताल और राजद्रोह के जुर्म में उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया और फिर वे 27 साल तक जेल में रहे.

जेल के दौरान ही मंडेला विश्वभर में लोकप्रिय हो गए थे और पूरे अफ्रीका महाद्वीप में रंग-भेद के खिलाफ़ लड़ने वाले सबसे बड़े नेता बन गए थे. विरमानी लिखते हैं कि मंडेला कर्म-प्रधान थे. उनके साहस, धैर्य, जनता से जुड़ाव और त्याग की भावना ने उन्हें अफ्रीका ही नहीं बल्कि विश्वभर के अश्वेत और हाशिये पर मौजूद लोगों का नेता बना दिया था.