हाल ही में नोएडा की महागुन सोसाइटी में एक मेड के साथ हिंसा के विरोध में उसके परिवार वालों और पड़ोसियों द्वारा सोसाइटी में बड़े स्तर पर हिंसा का मामला सामने आया था. मेड के पति का आरोप है कि उसकी पत्नी को चोरी के आरोप में पीटा गया और फिर बंधक बना लिया गया. वहीं दूसरी तरफ सोसाइटी के उस परिवार का कहना है कि मेड ने 10 हजार रुपये चुराये थे और जब उसकी शिकायत की बात चली तो वह डर के मारे कहीं जाकर छिप गई. चूंकि अभी तक जांच में कोई बात साफ नहीं हो पायी है, इसलिए मानकर चला जाए कि इन दोनों पक्षों की बात अपनी-अपनी जगह सच हो सकती है. इस घटना का एक और पक्ष सामने आ रहा है कि वह मेड बंगाली है. संभव है कि वह बांग्लादेश की भी हो.

मेड का चोरी करना या फिर मालिकों द्वारा मेड के साथ हिंसा, ये दोनों बातें भारतीय समाज में मेड और मालिकों के रिश्ते का एक बड़ा लेकिन आम सच हैं. एक तरफ मेड्स द्वारा चोरी की घटनाएं होती रहती हैं तो मालिकों द्वारा मेड्स के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण की घटनाएं भी आम हैं. लेकिन अक्सर होती रहने वाली इस तरह की घटना इस बार अगर इतनी बड़ी हो गई तो इसके पीछे मेड्स के आस-पड़ोस वाले उन सैकड़ों लोगों का हाथ है जिन्होंने मिलकर महागुन अर्पाटमेंट में काफी हिंसा, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की.

इस घटना को लेकर दो तरह के प्रतिक्रियायें सामने आ रही हैं. एक तरफ मेड के साथ होते बर्ताव के सिलसिले में मानवाधिकारों का सवाल उठ रहा है. उठना भी चाहिए क्योंकि आज मेड्स के ऊपर कम दाम में ज्यादा काम करने का बहुत दबाव है और उनका शोषण भी आम बात है. एक तरह से वे उस व्यवस्था की पीड़ित हैं जो उन्हें उनके इलाकों में आजीविका के विकल्प नहीं दे पाती और इस तरह महानगरों में ला पटकती है. दूसरी तरफ इस घटना को सरकार के बांग्लादेशियों के घर वापसी अभियान से भी जोड़ने की कवायदें भी शुरू हो चुकी हैं.

सबसे पहले तो इस केस में जिस तरह की खबरें आईं उनसे एक वर्ग में मुस्लिमों और बांग्लादेशियों के तुष्टीकरण जैसी धारणा बनी घटना की जांच पूरी हुए बिना ही ज्यादातर खबरों में यही बात थी कि मालकिन ने चोरी के इल्जाम में मेड के साथ मार-पिटाई की और उसे बंधक बनाया गया. यह बात कुछ ऐसी ही है जैसे किसी कार के नीचे कोई साइकिल वाला आ जाए, तो गलती हमेशा कार वाले की ही मानी जाती है. यहां साइकिल वाले को सड़क पर हर तरह की व्यावहारिक निरंकुशता दिखाने का अधिकार सा होता है.

महागुन सोसाइटी में हुई हिंसा पर अलग-अलग माध्यमों में आई प्रतिक्रियाएं
महागुन सोसाइटी में हुई हिंसा पर अलग-अलग माध्यमों में आई प्रतिक्रियाएं

घरों में काम करने वाली मेड्स सबसे ज्यादा झारखंड, बिहार, ओड़िशा,असम आदि राज्यों से होती हैं. जाहिर तौर पर उन जगहों की मेड्स के साथ भी इस तरह की घटनाएं आये दिन होती हैं. लेकिन इन जगहों के लोगों ने विरोध में पलटकर सैकड़ों की संख्या में इकट्ठे होकर ऐसी तोड़फोड़ और पत्थरबाजी कभी भी नहीं की. इस बात से हम यह निष्कर्ष कतई नहीं निकाल सकते कि चोरी के इल्जाम और मेड के साथ हिंसा की यह घटना (यदि सच यही है तो) बाकी घटनाओं से अलग या ज्यादा बर्बर थी, या बाकी घटनाएं इस स्तर की अमानवीय नहीं होतीं जिस स्तर की यह घटना थी, या फिर बाकी जगहों के लोग अपनी महिलाओं के प्रति उतने संवेदनशील नहीं होते जितने कि ये लोग हैं.

असल में गौर से देखा जाए तो इस घटना के इतना ज्यादा खबरों में बने रहने का कारण भीड़ का बंगलादेशी होना बाद में है. पहला कारण है कि उस भीड़ ने संगठित होकर हिंसा की. इन लोगों ने अपना परिचय खुद कुछ इस अंदाज में दिया कि हम एक स्थान विशेष से हैं, और पंगा लेने पर हम जो कर सकते हैं अभी सिर्फ उसका ट्रेलर दे रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि हमारे सिस्टम में गरीब तबके को न्याय पाने के लिए ज्यादा जद्दोजहद करनी पड़ती है. लेकिन एक किस्म की हिंसा से निपटने के लिए दूसरी तरह की हिंसा की शरण में जाने से समाज में सिर्फ अराजकता ही पनपती है.

इस मामले में उस स्थान विशेष के लोगों ने संगठित रूप से हमला करके हिंसा के बदले हिंसा का साफ संकेत दिया है. यह करके उस खास जगह के लोगों ने सिर्फ एक महागुन अपार्टमेंट में ही नहीं, बल्कि जहां तक यह खबर पहुंची है,उन सब जगहों में अपने खिलाफ माहौल तैयार कर लिया है जिसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की है. अब इस बात की आशंका बहुत बढ़ गई है कि किसी भी सोसाइटी के लोग मुस्लिमों या फिर उस खास जगह के लोगों को डर के कारण अपने यहां काम पर नहीं रखेंगे.

निःसंदेह मालिकों को किसी भी समुदाय की मेड्स के साथ किसी भी किस्म की बदसलूकी का कोई भी हक नहीं है. ठीक इसी तरह किसी भी खास समुदाय या जगह के लोगों को बिना पूरी बात जाने हिंसक होने का अधिकार नहीं है. परस्पर भरोसे, सम्मान और सहयोग के बिना न तो मालिकों का काम चलने वाला है, न ही घरों में काम करने वाली मेड्स का. दोनों ही पक्षों की एक-दूसरे पर लगभग पूरी निर्भरता है. एक के अभाव में दूसरे की स्थिति लगभग दयनीय सी है.

महागुन सोसाइटी के लोगों ने अब अपने परिसर में मेड्स की एंट्री पर बैन लगा दिया है. कुछ दिन पहले ही सोसाइटी के सामने बनी उन झुग्गियों को भी अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत हटा दिया गया जहां ये मेड्स रहती थीं. ऐसे में हिंसक होने वाले उन लोगों को क्या यह अहसास है कि उन्होंने अपनी जगह के लोगों को लेकर समाज में एक विरोधी रुख बनाने में खुद ही सबसे बड़ी भूमिका निभा दी है ? क्या उन्हें अंदाजा है कि उनके इस हिंसक व्यवहार ने न सिर्फ महागुन के बगल में बसी झोंपड़ियों ,बल्कि दूसरी जगहों में भी बसे अपने पूरे समुदाय के लोगों की रोजी-रोटी के विकल्पों पर भी कितने बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं?