यह बीती मई और उससे कुछ पहले की बात है. भारतीय जनता पार्टी की कर्नाटक इकाई के दो बड़े नेताओं- बीएस येद्दियुरप्पा और केएस ईश्वरप्पा के बीच लगभग सड़क पर आ चुके मतभेदों की ख़बरें लगातार सुर्खियां बन रही थीं. इस दौरान पार्टी ने दोनों को खूब चेताया लेकिन वे नहीं माने. फिर छह-सात मई को मैसुरू में पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक हुई. वहां भी उद्घाटन समारोह के दौरान मंच पर दोनों नेता एक-दूसरे से मुंह फेरकर बैठे रहे. फिर किसी तरह उनके बीच सुलह-सफाई कराई गई और प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक ख़त्म होते ही ईश्वरप्पा से बयान ज़ारी कराया गया. इसमें उन्होंने कहा, ‘मैं और पूरी प्रदेश इकाई येद्दियुरप्पा के साथ है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए. हमने मैसुरू कार्यकारिणी के दौरान आपस में बात की. इस पर विचार किया कि किस तरह पार्टी संगठन को मज़बूत किया जाए. हमारे कार्यकर्ता हर विधानसभा क्षेत्र में जाएंगे. हम मिलकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे कि 2018 में पार्टी सत्ता में लौटे.’ इससे लगा जैसे दाेनों के बीच मामला वाकई सुलट गया है.

लेकिन येद्दियुरप्पा और ईश्वरप्पा के बीच खुले टकराव की ख़बरें अब भले न आ रही हों, उनके रास्ते अब भी अलग ही दिखते हैं. बल्कि दिलचस्प बात तो यह है कि इन दाेनों के बीच मतभेदों का अब कांग्रेस भी फायदा उठाते हुए नज़र आने लगी है. ख़ास तौर पर येद्दियुरप्पा को कमजोर करने की गरज़ से. बीते एक महीने के भीतर कम से कम दो ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे इस बात को वजन मिलता दिख रहा है.

1. ईश्वरप्पा के निजी सचिव के अपहरण के मामले में येद्दियुरप्पा के घर आधी रात को पुलिस का छापा

कुछ दिन पहले ही राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येद्दियुरप्पा के घर बेंगलुरू पुलिस ने धावा बोल दिया. पुलिस यहां येद्दियुरप्पा के सहयोगी एनआर संतोष को तलाशने आई थी. संतोष पर ईश्वरप्पा के सहयोगी विनय बिदारे के अपहरण की कोशिश करने का आरोप है.

अपहरण की यह कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. डेक्कन क्रॉनिकल के मुताबिक येद्दियुरप्पा के सहयोगी संतोष के एक मॉडल के साथ अंतरंग संबंध थे और वह मॉडल ईश्वरप्पा के सहयोगी विनय की भी दोस्त थी. लिहाज़ा विनय ने उसको इस बात के राज़ी कर लिया कि वह संतोष के साथ अपने अंतरंग पलों का अॉडियो-वीडियो रिकॉर्ड कर ले. उस मॉडल से ऐसा ही किया और इस रिकॉर्डिंग की सीडी और पेन ड्राइव लाकर विनय को सौंप दी.

संतोष को जब इसकी भनक लगी तो उसने भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष राजेंद्र उर्स से कहा कि वह किसी भी तरह से वह वीडियो और पेन ड्राइव विनय से हासिल कर ले. बताते हैं कि इसके लिए राजेंद्र उर्स ने एक अपराधी प्रशांत को इस काम में लगाया. उसने बीती 10 को कुछ और बदमाशों को साथ लेकर महालक्ष्मी लेआउट क्षेत्र से विनय का अपहरण करने की कोशिश की. हालांकि विनय किसी तरह उनके चंगुल से निकल भागे.

बताते हैं कि पुलिस ने 12 जुलाई को प्रशांत को ग़िरफ्तार किया और उसने थोड़ी सख्ती के बाद ही राजेंद्र उर्स और संतोष का नाम उगल दिया. विनय के अपहरण की कोशिश करने वाले अन्य शातिर अपराधी भी पुलिस की ग़िरफ्त में हैं. राजेंद्र अभी अग्रिम ज़मानत लेकर ग़िरफ्तारी से बचे हुए हैं. कहा जा रहा है कि उन्होंने पूछताछ में पुलिस को कुछ नहीं बताया है. इसके बाद भी संतोष को तलाशते हुए पुलिस येद्दियुरप्पा के घर तक पहुंच चुकी है.

2. विधानपरिषद अध्यक्ष शंकरमूर्ति को येद्दियुरप्पा बचाना नहीं चाहते थे, पर ईश्वरप्पा ने बचा लिया

कांग्रेस येद्दियुरप्पा और ईश्वरप्पा के बीच झगड़े का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है इसका एक प्रमाण इसी जून में भी मिला था. कांग्रेस के नेता वीएस उग्रप्पा और नौ अन्य सदस्यों ने मिलकर राज्य विधायिका के उच्च सदन-विधान परिषद के अध्यक्ष और भाजपा नेता डीएच शंकरमूर्ति को अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए हटाने की कोशिश की थी. हालांकि कांग्रेस की कोशिश सफल नहीं हुई और प्रस्ताव एक वोट से गिर गया.

उस वक़्त भी ख़बरें आई थीं कि शंकरमूर्ति को हटाने और बचाने की पूरी क़वायद में भी वास्तव में येद्दियुरप्पा और ईश्वरप्पा ही मुख्य भूमिका निभा रहे थे. बताते हैं कि उस वक्त शंकरमूर्ति के प्रति आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की नाख़ुशी के मद्देनज़र येद्दियुरप्पा चाहते थे कि शंकरमूर्ति को हटा दिए जाए. लेकिन ईश्वरप्पा ने अपने निकट सहयोगी वी सोमन्ना और जनता दल-सेकुलर (जद-एस) के साथ मिलकर शंकरमूर्ति को बचा लिया.

बताते हैं कि उस मौके पर भाजपा के दोनों नेताओं के बीच मतभेद की स्थिति को कांग्रेस ही नहीं जद-एस ने भी अपने नफ़ा-नुकसान के हिसाब से इस्तेमाल किया था. कांग्रेस का मक़सद दोहरा था. पहला- वह शंकरमूर्ति को हटाने में सफल रहती तो किसी तरह जद-एस और निर्दलीयों को साथ मिलाकर विधानपरिषद के अध्यक्ष का पद उसे मिल जाता. दूसरा- इसमें सफल न होने पर वह भाजपा की अंदरूनी लड़ाई को सार्वजनिक कर देती. यहां बताते चलें कि राज्य विधानपरिषद में सत्ताधारी कांग्रेस के पास बहुमत नहीं है. कुल 75 सदस्यों के सदन में कांग्रेस के 33 सदस्य हैं. उधर, भाजपा के 23, जनता दल-सेकुलर (जेडीएस) के 13 और पांच निर्दलीय सदस्य हैं. एक सीट खाली है

बहरहाल कांग्रेस चूंकि अपने पहले मक़सद में सफल नहीं हो सकी. इसलिए उसने दूसरे की तरफ रुख़ किया. जैसे ही सदन में उसका अविश्वास प्रस्ताव गिरा उसके नेता वीएस उग्रप्पा ने सरेआम आरोप लगा दिया. उन्होंने मीडिया के सामने कहा कि भाजपा के ही कुछ सदस्यों ने उन्हें उकसाया था कि वे शंकरमूर्ति के ख़िलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएं. जो कि कर्नाटक की विधायिका के 110 साल के इतिहास में इस तरह का पहला मौका था.

वहीं कहा जाता है कि जेडीएस द्वारा ईश्वरप्पा और शंकरमूर्ति को समर्थन देने का मक़सद यह था कि येद्दियुरप्पा को नीचा दिखाया जा सके और पार्टी में उनके प्रभाव के बारे में मतदाताओं, ख़ासकर उत्तर कर्नाटक के मतदाता को सोचने पर मज़बूर किया जा सके. क्योंकि यही वह इलाका है जहां येद्दियुरप्पा ताकतवर माने जाते हैं और जहां जेडीएस अपनी ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश में है. हालांकि जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने सामने यही कहा, ‘साल 2015 में भाजपा से हमारी सहमति बनी थी. इसके मुताबिक विधानसभा परिषद के अध्यक्ष भाजपा और उपाध्यक्ष जेडीएस से बने थे. हमने उसी सहमति के हिसाब से शंकरमूर्ति का समर्थन किया.’

यानी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि भाजपा के दोनों नेताओं के बीच ख़ाई पटने के आसार दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं. वहीं कांग्रेस तथा जेडीएस इस स्थिति को अपने हिसाब से भुनाने में लगे हैं. सो इस खींचतान, उठापटक का नतीज़ा आगामी चुनाव और उसके बाद भी दिलचस्प तौर पर दिखना तय समझा जा सकता है.