करीब तीन दशक पहले हिंदुस्तान की दो मशहूर कारों फिएट-पद्मिनी और एंबेसेडर के राज में सेंध लगाते हुए मारुति-सुजुकी ने जिस सफ़र की शुरुआत की थी, उसका सुनहरा दौर जारी है. आलम यह है कि आज देश की सड़कों पर दौड़ती हर दूसरी यात्री गाड़ी पर मारुति-सुज़ुकी कंपनी का लोगो लगा होता है. हम नहीं, यह बात आंकड़े कहते हैं. भारतीय कार बाजार में आज कंपनी की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी है.

यूं तो मारुति लॉन्चिंग के बाद से ही सफलता के नए कीर्तिमान गढ़ती आ रही है. लेकिन यह साल कंपनी के लिए कुछ खास साबित हुआ. यूटिलिटी व्हीकल (यूवी) सेगमेंट से कुछ सालों पहले तक दूर रहने वाली मारुति अप्रैल-17 में सेगमेंट से जुड़े वाहन बनाने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनी बन गयी. इतना ही नहीं, मारुति ने अपनी इस बढ़त अब तक बरकरार रखा है. जानकारों के मुताबिक कंपनी की कॉम्पैक एसयूवी ब्रेज़ा को बाजार से मिल रही जबरदस्त प्रतिक्रिया इस बढ़त की प्रमुख वजह है. रिपोर्ट बताती हैं कि वित्त वर्ष 2016-17 में ब्रेजा सेगमेंट की किसी अन्य प्रतिद्वंदी कार से बाजार में दुगुने ग्राहकों को अपनी ओर खींचने में सफल रही.

अब तक देश की अन्य प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा को स्कॉर्पियो जैसी शानदार एसयूवी के साथ इस सेगमेंट का सरताज समझा जाता था. लेकिन ताजा आंकड़ों पर गौर करें तो साल की पहली तिमाही में ही यूवी सेगमेंट में मारुति की बिक्री पैंतालीस फीसदी बढ़त के साथ 57,125 यूनिट पहुंच गयी. जबकि इस दौरान महिंद्रा की ब्रिकी पांच प्रतिशत की कमी के साथ 53,082 यूनिट रह गयी. इस जबरदस्त परफॉर्मेंस के साथ मारुति ने यूवी सेगमेंट की कुल हिस्सेदारी के साढ़े 30 फीसदी पर अपना कब्जा जमा लिया है जबकि महिंद्रा एंड महिंद्रा सेगमेंट में 27.9 फीसदी पर ही सिमट कर रह गयी.

लेकिन मारुति ने यह बढ़त सिर्फ यूटिलिटी व्हीकल में ही हासिल नहीं की है बल्कि अपने पारपंरिक सेगमेंट जैसे स्मॉल कार, हैचबैक और सिडान में भी टॉप रैंकिंग की अपनी दावेदारी बरकरार रखी है. वित्त वर्ष मार्च 2016-17 के आंकड़े इस बात का सबूत हैं.

छोटी कारों की बात करें तो कंपनी की ऑल्टो प्रतिवर्ष 2.4 लाख यूनिट बिक्री के साथ अपने सेगमेंट में अब भी शीर्ष पर है. वहीं हैचबैक स्विफ्ट की बिक्री अपनी नजदिकी प्रतिद्वंदी कार आई-10 ग्रांड से करीब 20000 ज्यादा के साथ 1.66 लाख यूनिट पर है. वहीं प्रिमियम हैचबैक सेगमेंट में नेक्सा ब्रांड के तहत उतारी बलेनो ने ह्युंडई एलिट आई-20 जैसी प्रिमियम हैजबैक को बिक्री के मामले में पीछे छोड़ दिया है.

यदि बात कंपनी की लोकप्रिय कॉम्पैक सिडान स्विफ्ट डिज़ायर (अब डिज़ायर) की बात की जाए तो यह अकेली कार अपने सेगमेंट की दूसरी सभी गाड़ियों जैसे होंडा अमेज और ह्युंडई एक्सेंट की कुल बिक्री से कहीं ज्यादा बिकने वाली कार है. अगस्त में तो इसने बिक्री के मामले में कंपनी की सबसे लोकप्रिय कार ऑल्टो को भी पीछे छोड़ दिया. इस महीने ऑल्टो की करीब साढ़े 21 हजार यूनिट बिकीं तो डिजायर के मामले में यह आंकड़ा 30 हजार से भी ज्यादा रहा.

कंपनी की सिडान सियाज़ भी लाजबाव प्रदर्शन करते हुए अपने सेगमेंट की अगुवा होंडा सिटी को वित्त वर्ष 2016-17 में बिक्री के मामले में 6000 यूनिट पीछे छोड़ते हुए 64,448 के आंकड़े पर पहुंच गयी. मारुति के अन्य वाहनों की बात करें तो मल्टीयूटिलिटी व्हीकल अर्टिगा के साथ बतौर टैक्सी खासी पसंद की जाने वाली वैन ओमनी और ईको भी बिक्री के मामले में अपने प्रतिद्वंदियों से कहीं आगे रही हैं.

आम आदमी के लिए बनी कंपनी मारुति आज उस मुकाम पर पहुंच गयी है जब देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की तरक्की देखने के लिए इस की बिक्री के आंकड़ों का हवाला दिया जाता है. वित्त वर्ष 2015-16 के आंकड़े देखें तो मारुति ने 8.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल की थी. जबकि उस साल पूरी इंडस्ट्री के मामले में यह आंकड़ा छह प्रतिशत था. यदि मारुति को हटा दें तो यह महज 4.2 प्रतिशत तक ही रह जाता.

वित्त वर्ष 2014-15 में जहां पूरे ऑटोमोबाइल सेक्टर की विकास दर 4.2 प्रतिशत पर ही सिमट गयी थी, मारुति की गाड़ियों की बिक्री में तब भी 13.4 प्रतिशत की बढ़त देखी गयी थी. यदि मारुति की बिक्री को हटाकर यह आंकड़ा देखा जाए तो यह साल भारतीय यात्री वाहन बाजार के लिए एक नकारात्मक या नेगेटिव साल साबित होता. जानकार कहते हैं कि किसी भी इंडस्ट्री के लिए नेगेटिव साल निवेशकों के लिए बहुत खराब माना जाता है.

मारुति ही क्यों?

मारुति की इन उपलब्धियों को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि जहां इसकी प्रतिद्वंदी कंपनियों के पास यात्री वाहन सेगमेंट में एक सीमित संख्या में ही गाड़ियां मौजूद हैं. जबकि मारुति के पास तुलनात्मक रूप से वाहनों की एक लंबी श्रृंख्ला है. जानकार कहते हैं कि ऑल्टो जैसी छोटी कार से लेकर क्रॉसओवर एस-क्रॉस तक की विस्तृत रेंज के साथ मारुति अपने ग्राहकों को लुभाने में ज्यादा सफल रहती है.

इसके अलावा कंपनी की सर्विस आफ्टर सेल्स देशभर के ऑटोमोबाइल सेक्टर में सबसे बेहतरीन मानी जाती है. इसके चलते महानगरों से लेकर छोटे गांव तक के ग्राहक मारुति की गाड़ी को ही प्राथमिकता देते हैं. इन सभी खूबियों के चलते मारुति की रीसेल वैल्यू भी ज्यादा मिलती है जो इस कंपनी की गाड़ियों को लोगों की तरजीह मिलने का एक और बड़ा कारण है.

सफर आसान नहीं था

‘मैं चाहती हूं कि यह कार भारत के आम लोगों के काम आए और इस कार को लेकर उनकी कोई शिकायत नहीं रहे. मैं उम्मीद करती हूं कि राष्ट्र निर्माण में इससे हर तरह से मदद मिलेगी और भारत के लोगों को इससे सुविधा होगी ’

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह बात 14 दिसंबर 1983 को पहली मारुति 800 कार की चाबी सेना में काम करने वाले हरपाल सिंह को सौंपते हुए कही थी. मारुति कंपनी के जरिए आम आदमी की कार बनाने का ख़्वाब उनके बेटे संजय गांधी ने देखा था. लेकिन एक दुर्घटना में संजय के आकस्मिक निधन के बाद इंदिरा गांधी ने उनके सपने को साकार किया.

एक देसी कार बनाने के मकसद से संजय गांधी ने 16 नवंबर, 1970 में एक निजी कंपनी के तौर पर मारुति की स्थापना की थी. तब इसका शुरुआती नाम मारुति टेक्‍निकल सर्विसेज लिमिटेड था. उस समय इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं लिहाजा केंद्र सरकार ने इस कंपनी को कई तरह की सुविधाएं दे रखी थीं. हालांकि इसे लेकर इंदिरा गांधी पर विरोधियों ने जमकर निशाना साधा था. लेकिन 23 जून, 1980 को संजय गांधी की मृत्यु के बाद केंद्र सरकार ने मारुति का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इसका नाम बदलकर मारुति उद्योग लिमिटेड कर दिया गया.

चूंकि उस जमाने में भारत में कार बनाने को लेकर विशेषज्ञता नहीं थी. इसलिए इस कंपनी के कामकाज को गति देने के मकसद से एक वैश्‍विक साझेदार की तलाश शुरू हुई. यह पूरी जिम्मेदारी पूर्व सांसद और नेहरू परिवार के नजदिकी अरुण नेहरू को सौंपी गई. दुनिया की सभी बड़ी कार कंपनियों ने इस साझेदारी में जबरदस्त दिलचस्पी लेना शुरु किया. क्योंकि भारत के कार बाजार का उस समय तक दोहन नहीं हुआ था.

लेकिन सरकार की शर्त थी कि नई कंपनी में उसकी भागीदारी 60 फीसदी होगी और साझेदार कंपनी की 40 प्रतिशत. लेकिन ज्यादातर कंपनियां भारत में इतना निवेश करने के लिए राजी नहीं थीं. यही कारण था कि फॉक्सवैगन के साथ सरकार की बातचीत अंतिम स्तर में पहुंच कर टूट गई थी. जहां हर कंपनी के सिर्फ अधिकारी भारत सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत कर रहे थे. वहीं जापान की सुजुकी के मालिक ओसामू सुजुकी खुद इस डील में दिलचस्पी ले रहे थे. यह कंपनी 20 फीसदी की शुरुआती हिस्सेदारी के बाद इसे बढ़ाकर 40 फीसदी करने के शर्त पर भारत में काम करने को तैयार थी. तब भारत सरकार के साथ सुजुकी ने साथ दो अक्टूबर, 1982 को समझौता कर लिया.

संजय गांधी के जन्मदिन पर इस कंपनी की पहली कार मारुति 800 खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लॉन्च की. शुरुआती दिनों में इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कल-पुर्जों में से 97 फीसदी देश के बाहर से आते थे जिन्हें बाद में घटाकर पहले 93 फीसदी और फिर धीरे-धीरे न के बराबर कर दिया गया.

1984 में मारुति ने वैन ओमनी को बाजार में उतारा जिसे ग्राहकों की खासी प्रतिक्रिया मिली. इसके अगले ही साल मारुति जिप्सी गाड़ी लेकर आई. जिसे पुलिस और फौज जैसे रक्षा विभागों ने खूब उपयोग में लिया.

अब तक मारुति भारत में ही अपनी गाड़ियों की सप्लाई कर रही थी. लेकिन 1987 का साल मारुति के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ. इस साल कंपनी ने अपनी 500 कारें हंगरी भेजकर अपना पहला निर्यात किया. इस तरह मारुति ने अंतरराष्ट्रीय कार बाजार में पहली बार भारतीय निर्माण कौशल को मान्यता दिलाई.

समय के साथ मारुति ने हैचबैक जेन और सेडान एस्टीम को बाजार में उतारा जिन्हें एक बार फिर लोगों ने खूब सराहा. लेकिन 1999 में दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्युंडई भारतीय कार बाजार में अपनी हैचबैक सैंट्रो को लेकर आई. अपनी श्रेणी में सैंट्रो ने मारुति को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया. नतीजा यह हुआ कि फायदे की फसल काट रही मारुति को साल 2000 में 269 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा.

लेकिन मारुति भारतीय ग्राहकों की नब्ज़ जानती थी. जल्द ही कंपनी ने अपनी स्मॉल कार ऑल्टो को लॉन्च कर दिया. और कंपनी फायदे की पटरी पर वापस लौट आई. यह वही दौर था जब मारुति ने अपने ग्राहकों को बेहतरीन सेवा देने के लिए अपने सर्विस सेंटरों का विस्तार करना शुरु किया.

2002 में सरकार ने मारुति में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश किया और सुजुकी की हिस्सेदारी बढ़कर 54.2 फीसदी हो गई. अगले साल मारुति बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुई. 2005 में देश के बाजार में मारुति ने हैचबैक स्‍विफ्ट को उतारा जो जल्द ही सफलता का पर्याय बन गयी. बाद में सब-4 मीटर कारों पर टैक्स में कटौती की सरकार की घोषणा पर मारुति ने 2008 में सेगमेंट पर राज करने वाली स्विफ्ट डिजायर को बाजार में उतारा जो कंपनी को नयी बुलंदियों पर ले गयी.

साल 2010 में मारुति ने खुद की पहचान बनी 800 का निर्माण रोक दिया. शुरुआती दौर में मारुति ने विज्ञापन दिया था कि 800 में बैठकर हिंदुस्तान अपने घर आता है. हालांकि 800 तो बंद हो गयी. लेकिन आंकड़ों की मानें तो 75 लाख से ज्यादा भारतीय परिवारों के लिए आज भी घर आने का जरिया मारुति ही है.