2011 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब 13 फीसदी आबादी की उम्र छह साल या इससे कम है. यह आंकड़ा एक ओर जहां दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत के लिए उम्मीदें पैदा करता दिखता है, वहीं इसके साथ जुड़ी एक बड़ी चुनौती भी है. चुनौती यह कि आने वाले दिनों में आबादी का यह बड़ा हिस्सा कहीं फायदा पहुंचाने की बजाय देश पर बोझ ही न बन जाए. इसकी वजह है कुपोषण और तरह-तरह की बीमारियां.

इसे ध्यान में देखते हुए ही 1975 में गर्भवती महिलाओं और छह साल तक के बच्चों के समग्र विकास के लिए एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) की शुरुआत की गई थी. इसका मकसद है बच्चों को पौष्टिक खाना देने के साथ-साथ रोगों से बचाव के लिए उनका समय-समय पर टीकाकरण. इसके अलावा योजना के तहत बच्चों को स्कूली पढ़ाई के लिए भी तैयार किया जाता है. केंद्र प्रायोजित इस योजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के कंधे पर डाली गई है.

हाल में अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्था लेवरेजिंग एग्रीकल्चरल फॉर न्यूट्रिशन इन साउथ एशिया (लान्सा) ने उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इस योजना का कार्यान्वयन और इसके नतीजे परखने की कोशिश की. संस्था ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ और छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित छह-छह गांवों का जायजा लिया और अधिकारियों, सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों और आईसीडीएस के कर्मियों से बातचीत के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की. इस रिपोर्ट से साफ होता है कि कैसे सरकार की सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय समुदाय की जागरूकता और भागीदारी किसी योजना की सफलता में अहम भूमिका निभा सकती है.

उत्तर प्रदेश

आईसीडीएस पर लान्सा की रिपोर्ट की मानें तो उत्तर प्रदेश में आईसीडीएस के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार ने इस महत्वाकांक्षी योजना का बेड़ा गर्क कर दिया है. संस्था के सर्वे में पाया गया है कि इस योजना के तहत संचालन केंद्र के रूप में गठित आंगनबाड़ियों में कर्मचारी अपनी ड्यूटी से गैरहाजिर रहते हैं. इसके अलावा बच्चों के टीकाकरण का मुख्य केंद्र होने के बावजूद यहां इससे जुड़ी कुछ ही सेवाएं उपलब्ध हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस कारण आंगनबाड़ी केंद्र आमतौर पर बंद ही मिलते हैं और कभी-कभार वे खुलते भी हैं तो बच्चे काफी कम संख्या में पहुंचते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना के तहत सरकार की ओर से बच्चों के लिए दिए जाने वाले दाल जैसे पौष्टिक आहारों को भ्रष्टाचार रूपी घुन चट कर चुके हैं. सर्वे के दौरान आंगनबाड़ी कर्मियों ने बताया कि वे आवंटित अनाजों का गोरखधंधा करके प्रत्येक महीने 1,000 से 3,500 रुपये बना लेती हैं.

लान्सा की रिपोर्ट यह भी बताती है कि आंगनबाड़ी कर्मियों को स्थानीय नेताओं का संरक्षण हासिल होने की वजह से अधिकारी इनके खिलाफ सख्त कदम नहीं उठा पा रहे. इसके अलावा स्थानीय लोगों में इस योजना को लेकर जागरूकता की कमी भी इसकी विफलता की एक बड़ी वजह के रूप में सामने आई है. अगर इस संबंध में लोगों में थोड़ी-बहुत जागरूकता है भी तो शिकायतों के लिए कोई तंत्र न होना उन्हें अपना मुंह बंद रखने पर मजबूर कर देता है.

छत्तीसगढ़

उत्तर प्रदेश के ठीक उलट छत्तीसगढ़ इस महत्वाकांक्षी योजना के ठीक से कार्यान्वयन में कहीं आगे दिखता है चाहे मामला आंगनबाड़ी केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं का हो या फिर इसकी गुणवत्ता का. रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि रायपुर जिले में आंगनबाड़ी केंद्र तय वक्त पर खुलते हैं. इसके अलावा स्थानीय संस्थाओं के साथ-साथ सरकारी विभागों में भी इस योजना को लेकर सक्रियता और जिम्मेदारी नजर आती है. रिपोर्ट के मुताबिक सूबे में आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए बच्चों के लिए अनाज या फिर बने-बनाए खाने की जिम्मेदारी स्थानीय महिलाओं के समूहों को दी गई है. इसके चलते योजना में लोगों की भागीदारी भी बढ़ी है और उनमें इसे लेकर जिम्मेदारी का भाव भी. योजना ठीक से चले, इसके लिए इस पर स्थानीय लोगों की निगाह बनी रहती है.

आईसीडीएस के संबंध में छत्तीसगढ़ का उदाहरण बताता है कि योजनाओं के कार्यान्वयन को विकेंद्रीकृत कर सामुदायिक भागीदारी के जरिए किस तरह अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकते हैं. हालांकि, गांवों में राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त लोगों के हाथ में इसकी लगाम आने से कमजोर तबके के इस योजना के लाभों से वंचित होने की आशंका भी पैदा होती है. लेकिन सरकार की प्रभावी निगरानी इसे रोक सकती है.

बेहतर नतीजे हासिल करने के रास्ते

लान्सा की रिपोर्ट में दोनों राज्यों में योजना के जमीनी हालात की जानकारी देने के साथ आने वाले वक्त में इसे और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ रास्ते भी बताए गए हैं. पहले उत्तर प्रदेश की बात करते हैं. रिपोर्ट का मानना है कि सूबे में इस योजना के तहत सबसे जरूरी बात बुनियादी सुविधाओं तक लाभार्थियों की पहुंच सुनिश्चित कराना है. इसके अलावा ग्राम पंचायतों को अधिक अधिकार देना, शिकायत केंद्रों को सक्रिय और प्रभावशाली बनाना आदि भी अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए जरूरी बताया गया है.

योगी आदित्यनाथ सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाती हुई दिख रही है. इसने अपने पहले बजट (2017-18) में चरणबद्ध तरीके से सूबे के गांवों को कुपोषण मुक्त गांव बनाने का लक्ष्य रखा है. सरकार ने राशन के वितरण व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की बात कही है. इसके अलावा कुपोषण से निपटने के लिए एक नई योजना शबरी संकल्प अभियान लाने की तैयारी की जा रही है. इसके तहत गर्भवती महिलाओं और पांच साल तक के कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पोषाहार दिया जाएगा.

दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के बारे में रिपोर्ट का कहना है कि इस योजना के जरिए अब तीन साल तक के बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित करने का काम करना चाहिए. साथ ही नए आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना के साथ इनमें फैली हुई असमानता को खत्म करने की जरूरत है. छत्तीसगढ़ सरकार ने साल 2017-18 के बजट में आईसीडीएस के लिए 16,745 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. बीते साल यह आंकड़ा 14,850 करोड़ था.

लान्सा रिपोर्ट की पुष्टि नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-4 भी करता दिखता है

लान्सा ने यह सर्वे दोनों राज्यों के सिर्फ छह-छह गांवों में किया था, इसलिए इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा सकते हैं. लेकिन नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4, 2015-16) भी इसकी काफी हद तक पुष्टि करता है. एनएफएचएस के मुताबिक छत्तीसगढ़ में बीते एक दशक के दौरान नवजात और शिशु (पांच साल से कम) मृत्यु दर में काफी कमी आई है. साल 2005-06 में वहां नवजात मृत्यु दर 71 प्रति हजार थी. 2015-16 यह आंकड़ा गिरकर 54 पर आ गया. शिशु मृत्यु दर की बात करें तो इसमें भी काफी कमी दर्ज की गई है. साल 2005-06 में 90 प्रति हजार के मुकाबले यह 2015-16 में यह घटकर 64 रह गई है.

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में भी इन मामलों में सुधार तो दिख रहा है लेकिन, इसकी गति छत्तीसगढ़ की तुलना में धीमी है. सूबे में 2015-16 में नवजात मृत्यु दर 64 प्रति हजार थी. 2005-06 में यह आंकड़ा 73 था. बीते दशक के दौरान शिशु मृत्यु दर के मामलों में भी कमी दर्ज की गई है. 2005-06 में 96 प्रति हजार की तुलना में 2015-16 में यह आंकड़ा 78 रह गया है.