मंच पर चमचमाते लिबास में पूरे इत्मीनान और भरोसे से लबरेज दिखने वाले भारतीय जादूगर आज बेचैन हैं. ये जादूगर अपने पेशे की खोती चमक से हैरान-परेशान हैं. भारतीय मनोरंजन के मंच से गायब होकर जादू की यह दुनिया टीवी के रुपहले परदे पर दिखने लगी है. लेकिन वे इस दुनिया का हिस्सा नहीं हैं. आखिर इसकी वजह क्या है?

दरअसल, इस सवाल पर भारतीय जादूगरों ने कभी गंभीरता से विचार नहीं किया. इसीलिए आज उनकी कला हाशिए पर पड़ी है. ये जादूगर बाजार की जादूगरी नहीं समझ पाए. वे इसी भ्रम में फंसे रहे कि मंच पर जो भ्रम वे पैदा करते हैं उसकी चमक कभी धुंधली नहीं पड़ सकती. वे बस हमेशा की तरह सिर्फ लेडी कटिंग, लड़की को हवा में उड़ाने, वॉटर ऑफ इंडिया या इंद्रजाल जैसे चर्चित आइटम ही अपने शो में दिखाते रहे.

उत्तर प्रदेश के जादूगर अजय दिवाकर कहते हैं कि जादूगरों ने नया कुछ करने के बजाए पुराने आइटम को ही अपना हथियार बनाए रखा. दुकानदारी चलती रहे इसके लिए उन्होंने उसकी प्रस्तुति का थोड़ा अंदाज बदल लिया, बस.

यह कुछ वैसा ही रहा जैसे कोई गायक हर मंच पर एक ही गाना दुहराए. या कोई चित्रकार मंच पर जब भी आए तो शिव, गणेश या किसी अन्य देवी-देवताओं की वही तस्वीर उकेरे जो वह वर्षों से बनाता आ रहा है और जिसे उसके दर्शक हमेशा देखते रहे हैं. आखिर ऐसे में उसके दर्शक टूटेंगे क्यों नहीं?

इसकी वजह यह रही कि भारतीय जादूगरों के सोचने-समझने का दायरा बेहद औसत रहा. याद करें भारतीय जादूगरों के सिरमौर के रूप में स्थापित जादूगर पीसी सरकार को. उन्होंने सत्य साई बाबा की पोल खोली थी. बताया था कि वे कोई जादुई व्यक्तित्व नहीं बल्कि एक औसत जादूगर हैं. पर वही पीसी सरकार अपने जादू के शो में जब संवाद बोलते तो अक्सर ब्लैक मैजिक (काला जादू) की बात करते नजर आते थे. और पीसी सरकार ही क्यों, किसी भी भारतीय जादूगर का शो देखें तो पाएंगे कि किसी न किसी आइटम को वह काला जादू बताता ही है.

सवाल उठता है कि यह काला जादू है क्या? जादूगरों से बात करें तो समझ आता है कि यह दरअसल उनके डर का प्रतीक है. वे काला जादू की बात करके अपने उसी डर को दर्शकों में बो देना चाहते हैं ताकि डरा हुआ दर्शक काले जादू के पार छुपी उनकी ट्रिक को न देख सके. किसी भी जादू की चमक दर्शकों में तभी तक बरकरार रहती है जब तक उसकी गोपनीयता बनी रहे. इसी गोपनीयता को और गहराने के लिए जादूगर अपनी कला को काला जादू जैसी संज्ञा देते हैं. वह इसे कला, ट्रिक या मनोरंजन बताने से परहेज करता है.

यह एक बड़ी वजह है कि जादू की दुनिया आज मंचों से गायब हो रही है. इस दुनिया को समझने वाले लोगों का मानना है कि अगर ऊंचाई पर पहुंचे भारतीय जादूगर जादू को कला मानकर इसे कोई संस्थागत रूप देने से गुरेज नहीं करते तो इस कला का ठीक से विकास हो सकता था.

उत्तर प्रदेश के ही एक और जादूगर हैं अंकुर. जादू की दुनिया के भारतीय मंच से गायब होने के पीछे वे भारतीय जादूगरों की सोच के साथ-साथ सरकार को भी दोषी मानते हैं. वे कहते हैं कि ऊंचे दर्जे के जादू के लिए काफी आर्थिक संसाधनों की जरूरत होती है. विदेशों में जादूगरों को सरकार से बहुत ज्यादा सहायता मिलती है पर भारत में इस कला के लिए उचित सम्मान नहीं है.

हालांकि राजस्थान के जादूगर सम्राट शंकर नहीं मानते कि यह कला मंचों से गायब हो रही है. वे बताते हैं कि 1974 से ही वे मंचों पर शो कर रहे हैं और लगातार उनके दर्शक बने हुए हैं. हां, वे टीवी पर आने वाले जादू के शो और उनमें जादू के राज बताए जाने को इस कला के लिए नुकसानदायक बताते हैं. सरकार से मदद न मिलने के बारे में वे कहते हैं कि अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी आबादी वाले देश में उंगलियों पर गिने जाने लायक ही बड़े जादूगर नहीं होते.

जादूगर सम्राट शंकर की बात को परखने के लिए जब हम इंटरनेट खंगालते हैं तो वहां जादूगरों की एक लंबी सूची मिलती है. लेकिन उनसे संपर्क करने ज्यादातर जादूगर एक ही बात कहते हैं कि उन्होंने जादू करना छोड़ दिया है.

एक दौर में रांची और उसके आसपास के इलाकों में जादूगर रुपम बनिक का खासा नाम था. अब उन्होंने इस पेशे को छोड़ दिया है और पार्टियों में केटरिंग का काम करते हैं. यह पूछने पर कि उन्होंने इस कला को छोड़ क्यों दिया, वे कहते हैं ‘नहीं छोड़ता तो आज बहुत पछताता. इस कला को जादूगरों ने तो मारा ही, सरकार की भूमिका भी कम नहीं है. आज से चौदह-पंद्रह साल पहले मैं रांची में जादू का इंस्टिट्यूट खोलना चाहता था. सरकार का ध्यान खींचने के लिए मैंने ब्लाइंड मोटरसाइकल (आंख पर पट्टी बांध कर बाइक चलाना) की योजना बनाई. ट्रैफिक पुलिस से इजाजत मांगने गया तो अधिकारियों ने जेब ढीली करने के लिए कहा. मैंने इसे नजरअंदाज कर सरकार के चक्कर काटे. तब के मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के आसपास तक भी फटकने नहीं दिया नौकरशाहों ने. अब ऐसे प्रशासनिक माहौल में जादूगर क्या करे?’

इन तमाम जादूगरों से विदेशी जादूगरों के बारे में भी बातचीत की, वहां लगातार आगे बढ़ रही इस कला की वजह पूछने पर अधिकतर जादूगर इस सवाल से कन्नी काटते नजर आए. इंग्लैंड के मशहूर जादूगर डायनमो के बारे में सवाल करने पर जादूगर शंकर कहते हैं, ‘देखो इसकी पूरी शूटिंग होती है, उसके शो में 70 प्रतिशत तो जादू के ट्रिक्स हैं पर 30 प्रतिशत उसकी टीम और कैमरे का कमाल है.’

रांची के युवा जादूगर हैं सुनीत कुमार अप्पू बड़ी बेबाकी से कहते हैं ‘जिस डायनमो की चर्चा देश-विदेश में इन दिनों हो रही है, इस देश के बड़े जादूगर उसको नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरों की कला से प्रेरित होने के बजाए उसे खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं. दरअसल यही प्रवृति जादू की कला के लिए घातक है. अगर हमारे जादूगरों ने दर्शकों तक पहुंचने की बजाए उन्हें जादू तक खींचने की अपनी जिद बरकरार रखी तो बाजार का जादू उनकी दुनिया पूरी तरह से उजाड़ देगा.’