प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ से आकाशवाणी को बीते दो वर्षों में करीब 10 करोड़ रुपये की कमाई हुई है. बीते हफ्ते केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने लोकसभा में बताया कि इस कार्यक्रम के दौरान प्रसारित विज्ञापनों से ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) को 2015-16 में 4.78 करोड़ रुपये की आमदनी हुई जबकि 2016-17 में यह आंकड़ा 5.19 करोड़ रहा.

तीन अक्टूबर, 2014 को इस कार्यक्रम के जरिए देश की जनता से सीधे रूबरू होते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘मुझे इसका संतोष होगा कि मैं अपने मन की बात आप तक पहुंचाने में सफल रहा.’ कार्यक्रम के आखिर में उन्होंने यह भी कहा, ‘रेडियो ऐसा माध्यम है जिसके जरिए मैं गरीब से गरीब के घर तक पहुंच जाऊंगा क्योंकि मेरी और मेरे देश की ताकत गरीब की झोपड़ी में है.’

इस कार्यक्रम के ढाई साल बाद अब जब केंद्रीय मंत्री राठौड़ ने इससे होने वाली कमाई की जानकारी दी है तो इसे कार्यक्रम की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है. जानकारों के मुताबिक यह एक पंथ दो काज जैसा है. एक ओर तो प्रधानमंत्री मोदी अपने मन की बातों को जनता तक सीधे पहुंचा रहे हैं, दूसरी ओर इससे कमाई भी हो रही है.

लेकिन क्या यह पूरा सच है?

इस सवाल के जवाब का अंदाजा सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा ही दी गई एक जानकारी से लगता है. अगस्त, 2015 में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई एक जानकारी के जवाब में मंत्रालय ने बताया था कि कार्यक्रम के विज्ञापनों पर 29 जुलाई, 2015 तक कुल 8,54,74,783 रुपये खर्च किए गए. यानी कार्यक्रम के शुरुआती 10 महीनों के दौरान बीते दो वर्षों में इसके द्वारा की गई कमाई के आसपास रकम सरकार इस पर खर्च कर चुकी थी.

इसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन, जानकारों के मुताबिक अलग-अलग संचार माध्यमों पर जारी ‘मन की बात’ के विज्ञापनों को देखते हुए माना जा सकता है कि मामला अब तक आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया वाली श्रेणी में पहुंच गया होगा. यानी जितनी कमाई कार्यक्रम के दौरान प्रसारित विज्ञापनों से नहीं हुई, उससे अधिक रकम इसके विज्ञापनों पर ही खर्च कर दी गई है.

विज्ञापनों के अलावा बात करें तो ‘मन की बात’ को लेकर विपक्षी पार्टियां आरोप लगाती रही हैं कि प्रधानमंत्री इस कार्यक्रम का इस्तेमाल राजनीतिक फायदों के लिए कर रहे हैं. इस साल फरवरी-मार्च में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इस कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की थी. पार्टी ने आशंका जताई थी कि इसके जरिए मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की जा सकती है. हालांकि, बाद में आयोग ने चुनाव आचार संहिता का पालन करने के निर्देश के साथ यह कार्यक्रम प्रसारित करने की मंजूरी दे दी थी. इसके अलावा कई आलोचकों का यह भी मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी गंभीर और प्रासंगिक मुद्दों की जगह केवल सुविधाजनक मुद्दों पर ही अपनी मन की बात करते हैं. कई इसे मोनोलॉग यानी एकालाप भी कहते हैं.

मई, 2017 में इस कार्यक्रम पर आधारित किताब ‘मन की बात :रेडियो पर एक सामाजिक क्रांति’ लॉन्च करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आलोचकों को जवाब देने की कोशिश की थी. उनका कहना था कि इस कार्यक्रम के जरिए वे प्रत्येक परिवार के एक सदस्य बन गए हैं. इसी आयोजन में मौजूद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन का कहना था कि यह प्रधानमंत्री का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम है. सरकारी दावों में भी लगातार कहा जाता रहा है कि इस कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री सभी देशवासियों से सीधे संवाद करते हैं.

जानकार सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाते हैं. विज्ञापन के क्षेत्र में एक जानी-मानी शख्सियत अविजित दत्त का कहना है, ‘इस कार्यक्रम को कितने लोग सुनते हैं, इसपर सवाल है..कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.’ कार्यक्रम की लोकप्रियता और इसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने पर वे कहते हैं, ‘अगर यह कार्यक्रम इतना सफल है तो इसके विज्ञापन की जरुरत ही नहीं है. इस कार्यक्रम के लिए विज्ञापन पर खर्च क्यों बढ़ रहा है? इसकी वजह है कि इसकी लोकप्रियता कम होती जा रही है. हां, शुरू-शुरू में लोग सुन रहे थे. इसके बाद नोटबंदी के समय भी लोग कार्यक्रम यह जानने के लिए सुन रहे थे कि प्रधानमंत्री आगे क्या बताने जा रहे हैं.’ अविजित दत्त के मुताबिक यह कार्यक्रम पब्लिसिटी के लिए है और सरकार को इसकी जरूरत इसलिए है ताकि वह बताती जाए कि हम कितना कुछ कर रहे हैं.

‘मन की बात’ के अलावा प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर जारी अन्य विज्ञापनों की बात करें तो इसके लिए भी सरकार जनता की जेब से काफी पैसे खर्च कर रही है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक की गई जानकारी के मुताबिक जून, 2014 से अगस्त 2016 के बीच केंद्र सरकार प्रधानमंत्री मोदी के विज्ञापनों पर 1100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी थी. और यह आंकड़ा भी सिर्फ टेलिविजन और इंटरनेट जैसे दूसरे ई-संचार माध्यमों का है. इसमें बड़ी संख्या में अखबारों, होर्डिंग्स, पोस्टरों, बुकलेटों और कैलेंडरों पर खर्च की गई रकम शामिल नहीं है. बीते महीने मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री मोदी अपने विज्ञापनों पर अब तक 2,000 करोड़ रुपये तक खर्च कर चुके हैं.