सत्तर के दशक में कच्चा तेल उत्पादन में आई क्रांति के बाद से पूरी दुनिया में सऊदी अरब सहित तमाम खाड़ी देशों की पहचान ‘ऊर्जा केंद्र’ के रूप में बनी हुई है. यही वजह है कि बीते पांच दशकों में किसी भी देश ने इस इलाके का महत्व कम करके नहीं आंका. दुनिया की मौजूदा महाशक्ति अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं रहा. वैसे भी वह दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता और इसके परंपरागत भंडार के मामले में काफी ‘गरीब’ रहा है. 2015 तक वहां केवल 35 अरब बैरल ही कच्चा तेल था, जो दुनिया के कुल प्रमाणित भंडार (1,700 अरब बैरल) का लगभग दो फीसदी है.

अमेरिका में हर साल सात अरब बैरल के आसपास तेल की खपत होती है. इस गति से उसका यह भंडार महज पांच साल में खत्म हो सकता है. हालांकि उसके अप्रमाणित भंडार की मात्रा करीब 200 अरब बैरल है, लेकिन खुद अमेरिका आधिकारिक आंकड़ों में इसकी गणना नहीं करता. ऐसे में खाड़ी देशों पर पकड़ ढीली कर देने से उसकी ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ने की पूरी आशंका है. यही वजह है कि उसने सारे हथकंडे अपनाकर भी इस इलाके पर अपना प्रभाव बनाए रखा है. हालांकि बीते एक दशक में इस मोर्चे पर हालात काफी बदल गए हैं. इस बदलाव की वजह अमेरिका में शेल ऑयल और गैस के बड़े भंडारों का पता लगना रही है.

शेल ऑयल और गैस

शेल ऑयल गैर-परंपरागत कच्चा तेल है. इसे ‘केरोजिन’ नामक जैविक पदार्थ वाली चट्टानों को गर्म करके निकाला जाता है. लेकिन अब तक इसकी तकनीक काफी जटिल और महंगी होती थी क्योंकि इन चट्टानों में तेल की मात्रा कम होती है. इसी के चलते शेल ऑयल को ‘लाइट टाइट आॅयल’ भी कहा जाता है. वहीं शेल ऑयल वाली चट्टानों के आसपास पाई जाने वाली गैस को शेल गैस कहते हैं.

दूसरी ओर, परंपरागत कच्चे तेल की चट्टानों में तेल की मात्रा काफी अधिक होती है. इसलिए इसे जमीन की ड्रिलिंग करके आसानी से निकाल लिया जाता है. अब तक इसे ही कच्चे तेल के रूप में जाना जाता रहा है. ज्यादा तेल वाली चट्टानों में पाए जाने की वजह से इसे बीते कुछ सालों से ‘टाइट आॅयल’ भी कहा जाने लगा है. खाड़ी के तमाम देशों समेत लैटिन अमेरिका का वेनेजुएला और उत्तरी अमेरिका का कनाडा कच्चे तेल के इसी परंपरागत प्रकार में सबसे आगे खड़ा है.

बीसवीं सदी तक शेल ऑयल और गैस निकालने की तकनीक काफी मुश्किल और महंगी थी. इसके चलते उस समय तक इसके उत्पादन में शायद ही किसी की दिलचस्पी थी. लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत से इसकी तकनीक में काफी सुधार हुआ. मौजूदा समय में नई तकनीक से अमेरिका के ज्यादातर इलाकों में एक बैरल शेल ऑयल की उत्पादन लागत 40 डॉलर के आसपास आ रही है. इससे अपनी तेल जरूरतों का लगभग एक चौथाई आयात करने वाले अमेरिका की बांछें खिल गई हैं. जून 2016 में नॉर्वे की संस्था ‘रिस्ताद इनर्जी’ ने तीन साल की मेहनत के बाद तैयार किए गए अपने एक सर्वेक्षण में बताया कि अमेरिका में पूरी दुनिया का 80 फीसदी शेल ऑयल का भंडार है.

रिस्ताद इनर्जी की इस रिपोर्ट में बताया गया कि पूरी दुनिया में प्रमाणित (90 फीसदी संभावना), अप्रमाणित (50 फीसदी संभावना) और संभाव्य (10 फीसदी संभावना) भंडारों में 6,000 अरब बैरल शेल ऑयल हो सकता है. अब यदि तीनों प्रकार के भंडार में तेल की संभावनाओंं का औसत लिया जाए तो यह 50 फीसदी होगा. यानी अभी तक की खोजों के आधार पर पूरी दुनिया में 3,000 अरब बैरल तक शेल ऑयल निकाला जा सकता है. यदि इस रिपोर्ट को आधार मानें तो अभी तक अमेरिका में 2,400 अरब बैरल तक शेल ऑयल निकाले जाने की क्षमता है. यह अब तक पूरी दुनिया के प्रमाणित कच्चे तेल के कुल भंडार (1,700 अरब बैरल) से भी ज्यादा है. इन आंकड़ों से ही समझा जा सकता है कि शेल ऑयल निकालने की तकनीक विकसित हो जाने से ऊर्जा सुरक्षा के मामले में अमेरिका कितना सुरक्षित और निश्चिंत हो गया है!

फिर भी अमेरिका तेल का सबसे बड़ा आयातक क्यों है?

कच्चे तेल के लिहाज से न सही, शेल ऑयल के हिसाब से देखें तो अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. इसके बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है. अमेरिकी सरकार के एनर्जी इनफॉरमेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) के अनुसार उसने 2016 में रोज करीब एक करोड़ बैरल (औसतन) कच्चे तेल का आयात किया. दूसरी ओर वहां पिछले साल तेल की मांग 1.94 करोड़ बैरल रोजाना रही, जबकि उसका घरेलू उत्पादन केवल 89 लाख बैरल रहा.

इस विसंगति के कई कारण हैं. पहला यही कि कच्चे तेल की सीमित मात्रा होने के चलते अमेरिका नए विकल्पों की खोज होने तक इसे बचाकर रखना चाहता था. इस रणनीति पर वह दशकों से अमल कर रहा है. हालांकि अब शेल ऑयल का विकल्प उसके पास आ गया है, लेकिन इसके पूर्ण विकास में अभी समय लगेगा. ऐसे में उसने 2008 के अंत से रोजाना उत्पादन को धीरे-धीरे ही सही बढ़ाना शुरू कर दिया है. उसका लक्ष्य है कि 2018 में तेल का औसत उत्पादन बढ़ाकर एक करोड़ बैरल रोजाना तक ले जाया जाए. यदि ऐसा हुआ तो 1970 के बाद यह अमेरिका का सबसे अधिक तेल उत्पादन होगा.

दूसरा कारण यह कि शेल ऑयल की तकनीक अभी नई है और इसमें लगातार सुधार की गुंजाइश है. इसका इस्तेमाल कर नए कुएं खोदने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की जरूरत है. दो-तीन साल पहले तक इसकी तकनीक महंगी थी. 2014-15 में जब कच्चे तेल की कीमतें गिरने लगीं तब यह तकनीक लाभकारी नहीं रह गई जिससे इसमें निवेश की गति रूक-सी गई. फिर जब इसमें और सुधार आया तो इससे उत्पादन लागत 40 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई. इसके बाद इसमें निवेश फिर से होने लगा. पिछले साल अमेरिका में 42 लाख बैरल रोजाना के हिसाब से शेल ऑयल का उत्पादन हुआ था. उसके शेल ऑयल के विशाल भंडार को देखते हुए इस आंकड़े को कम ही कहा जाएगा. अमेरिकी सरकार का मानना है कि तमाम उपायों के बावजूद 2030 के बाद ही वह तेल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो पाएगा. वह यह भी मानता है कि यह आत्मनिर्भरता शेल ऑयल के चलते ही आ पाएगी.

तीसरा कारण, यह है कि अमेरिका में दुनिया की सबसे ज्यादा रिफाइनरियां हैं. उसकी 141 रिफाइनरियों की कुल शोधन क्षमता 1.86 करोड़ बैरल है. इसके लिए वह दुनिया के 70 देशों से कच्चा तेल मंगाता है. अमेरिका का तेल शोधन से तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का रोजाना का निर्यात करीब 52 लाख बैरल का है. वह इन उत्पादों का निर्यात दुनिया के 101 देशों को करता है. कारोबार, राजस्व और रोजगार के लिहाज से इसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था में निर्णायक योगदान है. इसलिए भी अमेरिका तेल आयात में नंबर एक है.